# रविकान्त राऊत > यहाँ हर कहानी एक सफ़र है, हर किरदार एक सच्चाई ## Posts - [उलझनें घटना से नहीं, अर्थ से जन्म लेती हैं](https://ravikantraut.in/%e0%a4%89%e0%a4%b2%e0%a4%9d%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%98%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%b8-2/): किसी घटना की चोट हमें इसलिए नहीं लगती कि वह घटित हुई; चोट तो उस अर्थ से लगती है जिसे हम उस घटना पर आरोपित कर देते हैं। घटना बाहरी होती है—पर उसकी पीड़ा हमारे द्वारा रची गई व्याख्या से जन्म लेती है।” मान लीजिए रास्ते पर चलते समय किसी ने पीछे से आपको ज़ोर से धक्का दे दिया। एक ही घटना — लेकिन अर्थ बदलते ही अनुभव बदल जाता है: अगर आप सोच लें — “यह आदमी मुझे अपमानित करना चाहता है।” तुरंत गुस्सा, चोट, अपमान की भावना जाग जाएगी। धक्का छोटा था… पर अर्थ बड़ा बना दिया गया। अगर आप… - [नदी, नाव और भाषा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be/): मनोविज्ञान, भाषा और दर्शन का एक खूबसूरत संगम है। आइये इसे एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं। वाराणसी के एक पुराने मोहल्ले में राजीव नाम का एक युवा दर्जी रहता था। पिता की छोटी सी दुकान थी—और उम्मीदें बड़ी। पर एक साल ऐसा आया कि बाजार बदल गया, ग्राहक घट गए, और उधारी बढ़ गई। एक शाम, दुकान का शटर गिराते हुए वह अपनी पत्नी से बोला, “सब खत्म हो गया। मेरी किस्मत फूटी है… मैं नाकाम हूँ।” शब्द भारी थे। इतने भारी कि उनका वजन उसके कंधों से नहीं, उसके दिल से उठ ही नहीं पा… - [अनाम ख़त](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%a4/): अलमारी के हर ख़ाने पर करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं अब यादों को तलाशने में वक़्त ज़ाया नहीं होता आज एक ख़त अचानक निकल आया पुराने सामानों में ‘कोरा’ ही भेज दिया था कभी किसी ने पहचानी सी खुशबू किसी नाम की चुगली कर रही है अब समझ नहीं आ रहा सहेजूं इसे या पुर्जा-पुर्जा कर उड़ा दूं उसे रुसवा होने से बचाने के लिये   इस कविता को सुनने के लिये क्लिक करें - [सही वक़्त के इंतज़ार में](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%95%e0%a4%bc%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/): कितने सालों के 365 दिन मैं जिसके लिये खिलती रही हर रात जिसके लिये महकती रही करीब रह कर भी निष्ठुर बना रहा वो किसी कांटे की तरह “सही वक़्त के इंतज़ार में” “सही-वक़्त”..?? कब तक कोई इंतेज़ार कर सकता है भला एक दिन तो किसी ने जुदा करना ही था , मेरी अपनी शाख से मुझे सही वक़्त के इंतेज़ार में वक़्त निकल गया और मैं निरापद सजा दी गयी किसी और की कांटे-रहित डाल में किसी “गैर” के गुलदान में उसका अरमान बनाकर - [ब्लैक स्वान: अनिश्चितता के युग में असंभव का सत्य](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%88%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/): दुनिया अक्सर उन घटनाओं से हिल जाती है जिनकी कल्पना किसी ने नहीं की होती। सब कुछ सामान्य लगता है, और तभी एक अज्ञात विस्फोट, न किसी गणित में, न किसी योजना में दर्ज, सब बदल देता है। यही है ब्लैक स्वान, नसीम निकोलस तालेब की उस गूढ़ अवधारणा का नाम, जिसने मानव सभ्यता के आत्मविश्वास पर सबसे गहरा प्रश्नचिह्न लगाया। तालेब के अनुसार, ब्लैक स्वान ऐसी घटना है जो तीन गुणों से पहचानी जाती है। वह अत्यंत दुर्लभ होती है, घटने पर उसका प्रभाव विनाशकारी या निर्णायक होता है, और घटने के बाद लोग उसे तर्कसंगत ठहराने की कोशिश करते… - [सुमित्रा की नींद](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%a6/): उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था। रात के ग्यारह बजे सुमित्रा सोई नहीं है, रसोई में है। कल के लिए आटा गूँध रही है, दाल भिगो रही है, बच्चे का टिफ़िन सोच रही है कल क्या दूँ जो खाए भी और फेंके भी नहीं। यह सवाल दुनिया की किसी परीक्षा में नहीं आता, पर सुमित्रा रोज़ हल करती है, बिना किसी मार्क की आशा के। रात के बारह बजे पति महेश जी सो गए। नींद आते ही उन्होंने करवट ली, पूरी रजाई अपनी… - [पुरुष की कमर और आयोडेक्स का बैर](https://ravikantraut.in/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8/): हम भारतीय पुरुष की कमर हैं। हमें “हाय” कहना नहीं आता। सुबह सात बजे सिलेंडर ख़त्म हुआ। रमेश उठा, तीन मंज़िल उतरा, सिलेंडर वाले से माथापच्ची की, पुराना सिलेंडर कंधे पर लादा, तीन मंज़िल चढ़ा, रसोई में रखा, जोड़ा लगाया, गैस चालू की। कमर को पता भी नहीं चला। नौ बजे छत पर गया, टंकी देखी भरी है या नहीं, मोटर चालू की, वापस गया। आधे घंटे बाद फिर गया ये देखने कहीं ओवरफ्लो न हो जाए। तीन बार चढ़ा तीन बार उतरा। कमर चुपचाप रही। ग्यारह बजे स्कूटर पंचर। रमेश ने धक्का लगाया, गर्मी में, तीन किलोमीटर। पसीना, गाली, फिर पसीना।… - [दरारों में ठहरी स्त्री](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a0%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80/): प्रेम—यह शब्द हमारे बीच कभी नहीं आया। इसे कहना ऐसा होता जैसे किसी बहुत नाजुक काँच पर हथौड़ा मार देना। सच तो यह था कि उसके सामने बैठते ही मेरे भीतर का भूगोल बदलने लगता था। ठीक वैसे, जैसे किसी पुराने, धूल भरे कमरे में अचानक ताज़ी हवा का झोंका आ जाए और हर चीज़ अपनी जगह से ज़रा-सा हिलकर एक नई तरतीब में आ जाए। वह उन पुरुषों में से नहीं था जो कमरे में दाखिल होते ही अपने व्यक्तित्व का शोर मचाते हैं। उसका आना ऐसा था जैसे शाम का धुंधलका उतरता है, बेआवाज़, लेकिन हर चीज़ को अपनी… - [6-प्रतीक्षा का मुखौटा](https://ravikantraut.in/6-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): उस दिन मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था। ट्रेन पैंतीस मिनट लेट थी। बोर्ड पर लिखा था — “प्रतीक्षा करें।” जैसे यह कोई सूचना नहीं, बल्कि जीवन का एकमात्र निर्देश हो। मेरे बगल में एक बूढ़ी औरत बैठी थी जो एक पीली साड़ी पहने हुए थी और उसके हाथ में एक पुरानी घड़ी थी जो बंद पड़ी थी। वह घड़ी देखती रहती थी। बार-बार। जैसे समय उसके लिए चल भी रहा हो और रुका भी हो — दोनों एक साथ। मैंने सोचा — क्या वह किसी का इंतज़ार कर रही है, या इंतज़ार करना ही उसका अस्तित्व बन चुका है?… - [5-क्षमा या शायद मुक्ति का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81/): लंच के लिए हमने वही जगह चुनी जहाँ कभी हम अक्सर आया करते थे। पर अब यह जगह भी बदल चुकी थी — या शायद हम बदल चुके थे। दीवारों का रंग वही था, लेकिन जो चीज़ें दीवारों के बीच घटती हैं, वे कभी वैसी नहीं रहतीं। मैं पहले पहुँच गया था। उस कोने वाली मेज़ पर बैठा जहाँ खिड़की से धूप आती थी। मेरे हाथ मेनू कार्ड पर थे, लेकिन मैं पढ़ नहीं रहा था। सिर्फ पन्ने पलट रहा था — जैसे कुछ करने का बहाना चाहिए हो। मैंने खुद से वादा किया था: *कोई उम्मीद मत रखो।* पर उम्मीदें… - [एपिसोड 4 — “हल्की मुस्कान का रहस्य”](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8/): आज मैं बिना वजह मुस्कुरा रहा था। कोई बड़ी खुशी नहीं थी। कोई उपलब्धि नहीं। बस एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान — जो होंठों से ज़्यादा भीतर हो रही थी। पहले मुझे लगा यह थकान है। कभी-कभी शरीर हार मानकर मुस्कुरा देता है, जैसे कह रहा हो — “ठीक है, जितना हो सकता था कर लिया।” लेकिन यह वैसी मुस्कान नहीं थी। यह शांत थी। टिकाऊ। मैं सड़क पर चल रहा था। लोग अपने-अपने चेहरों में व्यस्त थे। किसी के फोन पर झुंझलाहट, किसी की भौंहों में जल्दी, किसी की चाल में चिंता। अचानक लगा — हम सब अपने दिन को ऐसे ढो… - [एपिसोड-3 "बीच रास्ते खड़ा आदमी"](https://ravikantraut.in/%e0%a4%8f%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%a1-3-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%9a-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6/): घर के बीचों-बीच खड़े होकर अचानक मुझे लगा — मैं कहीं जा नहीं रहा, मैं बस रुकने की जगह बदल रहा हूँ।एक पैर आगे था, दूसरा पीछे। शरीर मुड़ा हुआ। जैसे किसी ने चलते-चलते मेरा नाम पुकारा हो और मैं आधा रास्ता लौट आया हूँ। उस क्षण में समय अटक गया था। जीवन अक्सर इसी मुद्रा में बीतता है — आधा आगे, आधा पीछे। हम सोचते हैं कि हम निर्णय ले रहे हैं पर असल में हम संतुलन बना रहे होते हैं। कमरे में रोज़मर्रा की चीज़ें थीं। कुर्सी। मेज़। दीवार। हल्की बिखरी चीज़ें। वही परिचित दुनिया जिसमें आदमी सुरक्षित महसूस… - [मुखौटा 2 -शांत चेहरा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be/): आज मैंने तय किया कि मैं कम बोलूँगा। यह कोई संकल्प नहीं था। कोई आध्यात्मिक प्रयोग भी नहीं। बस सुबह उठते समय लगा कि शब्द आज भारी हैं। जैसे हर वाक्य को उठाने के लिए अतिरिक्त ताकत चाहिए। मैंने दिन की शुरुआत बिना संगीत के की। चाय बनाई। कप से उठती भाप को कुछ सेकंड देखा। ध्यान आया — मैं अक्सर चाय पीता हूँ, उसे देखता नहीं। शायद जीवन की ज़्यादातर चीज़ें हम इस्तेमाल करते हैं, अनुभव नहीं। फोन पर कई संदेश थे। मैंने जवाब टाल दिए। किसी से नाराज़ नहीं था। बस भीतर एक हल्की थकान थी — वह थकान… - [मुखौटा-1 : अदृश्य आदमी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/): आज पूरे दिन किसी ने मुझे नहीं देखा। मैं सड़क पर चला — लोग टकराए नहीं। दुकान में गया — दुकानदार ने पूछा नहीं। ऑफिस पहुँचा — मेरी कुर्सी पर कोई और बैठा था। मैंने कहा: “यह मेरी सीट है।” उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं। जैसे आवाज़ हवा में घुल गई। पहले मुझे लगा मज़ाक है। फिर प्रयोग। फिर डर। मैंने हाथ हिलाया। लोगों के सामने खड़ा हुआ। मोबाइल लहराया। कुछ नहीं। मैं मौजूद था — लेकिन किसी की दुनिया में नहीं। अदृश्य होना फिल्मों में रोमांचक लगता है। असल में वह बेहद शांत त्रासदी है। क्योंकि अस्तित्व का आधा… - [हर डॉलर के बदले छह डॉलर: चीन पर निर्भरता का असली बिल](https://ravikantraut.in/india-china-trade-deficit-dependence-bill/): हर एक डॉलर का सामान हम चीन को बेचते हैं, तो बदले में छह डॉलर से ज़्यादा का सामान वहाँ से ख़रीद लाते हैं। चीन से व्यापार घाटा इस साल के पहले नौ महीनों में ही 105.93 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, और यह आँकड़ा किसी विपक्षी नेता के भाषण से नहीं, बल्कि चीन के अपने कस्टम विभाग के रिकॉर्ड से निकला है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान भारत का चीन को निर्यात 40.7 प्रतिशत बढ़ा है। यानी हमने बेहतर खेला, फिर भी स्कोरबोर्ड पर फ़ासला और बढ़ गया। यह विरोधाभास ही आज की असली ख़बर है।… - [जो ज़हर मरता नहीं, उसकी सीमा कौन तय करेगा?](https://ravikantraut.in/forever-chemicals-pfas-drinking-water-india/): फॉरएवर केमिकल्स के बारे में सबसे डराने वाली बात उनका ज़हर नहीं, उनका नाम है। ये रसायन सच में “हमेशा के लिए” रहते हैं। ये न धूप में टूटते हैं, न पानी में घुलकर ख़त्म होते हैं, और न शरीर से आसानी से बाहर निकलते हैं। हम मानते आए हैं कि नल से आया, plant में साफ़ किया गया पानी सुरक्षित होता है। पर एक भारतीय अध्ययन बताता है कि कुछ मामलों में शुद्धिकरण के बाद पानी पहले से ज़्यादा प्रदूषित निकला। यह किसी विदेशी प्रयोगशाला की कहानी नहीं है। यह चेन्नई के पीने के पानी की कहानी है, और शायद… - [नज़र-अंदाज़](https://ravikantraut.in/nazar-andaaz/): शनिवार की शाम मेरे लिए चाय की शाम होती है। घर से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक छोटी-सी चाय की टपरी है। टीन की छत, लकड़ी की दो-तीन बेंचें और सामने उबलती चाय की केतली से उठती भाप। शहर की भागती हुई शाम के बीच वह जगह मुझे हमेशा थोड़ी देर ठहरने का बहाना देती है। उस दिन भी मैं वहीं पहुंचा। लेकिन उस शाम मेरी नजर सबसे पहले चाय पर नहीं, टपरी के कोने में बैठे दो चेहरों पर गई। दोनों चुप थे। दोनों के सामने चाय के गिलास रखे थे, लेकिन दोनों की चाय ठंडी हो चुकी थी।… - [दस साल का क़ानून, पचास हज़ार बच्चों का इंतज़ार](https://ravikantraut.in/juvenile-justice-act-dus-saal-intezaar/): किशोर न्याय का असली इम्तिहान अदालत के भाषणों में नहीं, उस पंद्रह साल के लड़के के इंतज़ार में होता है जो महीनों से एक बोर्ड के सामने अगली तारीख़ गिन रहा है। उसका मामला छोटा हो सकता है, ग़लती गंभीर भी हो सकती है। पर जिस क़ानून ने उससे सुधार का वादा किया था, वह उसे अब तक सिर्फ़ तारीख़ें दे पाया है। इसी 10-11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति ने UNICEF के साथ मिलकर किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर एक राष्ट्रीय परामर्श किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने… - [ठगी का पूरा बोझ ग्राहक के ही कंधे पर क्यों?](https://ravikantraut.in/cyber-fraud-who-bears-the-loss/): देश में साइबर ठगी अब किसी इक्का-दुक्का बदक़िस्मत की कहानी नहीं रह गई है। अपने आसपास ही नज़र डालिए। किसी रिटायर्ड शिक्षक को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर दो दिन वीडियो कॉल पर बंधक रखा गया। किसी छोटे दुकानदार का खाता “KYC अपडेट” वाले एक लिंक से ख़ाली हो गया। किसी कॉलेज के लड़के ने कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता किराये पर दे दिया। इन सब कहानियों का अंत लगभग एक-सा होता है। पुलिस थाने में शिकायत दर्ज होती है, बैंक “हम जाँच करेंगे” कहता है, और कुछ हफ़्तों बाद ठगे गए आदमी को समझा दिया जाता है कि… - [जब एफआईआर 'पदक' बन जाए, सवाल कौन पूछेगा?](https://ravikantraut.in/election-commission-sir-protest-theatre/): चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठा सवाल इस हफ़्ते दिल्ली की सड़कों तक पहुँच गया, पर सड़क पर पहुँचते-पहुँचते वह सवाल किसी और ही चीज़ में बदल गया। जंतर-मंतर पर बैरिकेड चढ़ते हुए राहुल गांधी की तस्वीर, सड़क पर लेटे सांसदों को खींचकर हटाती पुलिस, प्रियंका गांधी वाड्रा का यह दावा कि उन्हें धकेला और खरोंचा गया – इन तीन दिनों की यह तस्वीरें टीवी पर खूब चलीं। और फिर आया वह जुमला, जो शायद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे यादगार हिस्सा बन गया: “हर एफआईआर मेरे लिए एक पदक है, मेरे पास अभी पैंतालीस हैं, मुझे सौ चाहिए।” तालियां बजीं,… - [हथकड़ी से हिसाब तक: टैक्स वसूली में भरोसे की परीक्षा](https://ravikantraut.in/gst-arrest-powers-handcuffs-to-ledgers/): जीएसटी गिरफ़्तारी का प्रावधान हटाने का प्रस्ताव आज जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक की मेज़ पर है, और यह सिर्फ़ टैक्स कानून की एक धारा का मामला नहीं है। यह उस पुराने सवाल का नया रूप है कि राज्य अपने नागरिक को पहले कर्ज़दार मानता है या पहले अपराधी। किसी व्यापारी पर टैक्स बकाया हो, तो उससे पैसा वसूलना चाहिए या उसे हथकड़ी पहनानी चाहिए? नई दिल्ली के भारत मंडपम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में बैठी परिषद के सामने जो प्रस्ताव हैं, वे पिछले नौ साल की जीएसटी व्यवस्था की सबसे बड़ी आत्म-स्वीकृति जैसे हैं। तय होना है… - [आख़िरी दीया](https://ravikantraut.in/aakhiri-diya-diwali-story/): दीपावली की जगमगाती रात, एक सुनार का तराज़ू और बीस बरस पुराना अपराधबोध — दीपावली की यह कहानी “विश्वगाथा” त्रैमासिक पत्रिका (गुजरात) के अक्टूबर–दिसंबर अंक में प्रकाशित हुई है। ✦ ✦ ✦ लिम्बड़ी की सुनार गली में दीपावली की शाम कुछ और ही रंग लेकर आती है। दुकानों के शटर सोने के पानी से नहाए हुए लगते हैं, हवा में इत्र, घी और जलते हुए तेल की मिली-जुली गंध तैरती रहती है, और हर दरवाज़े पर एक कतार-सी दीयों की लगी होती है, जैसे पूरी गली ने मिलकर आसमान से कुछ माँगा हो और जवाब में उसे ये टिमटिमाती रोशनी मिली… - [कैंसर की दवा पर दस गुना मुनाफ़ा: इलाज या वसूली?](https://ravikantraut.in/profit-on-cancer-drug/): किसी परिवार में जब पहली बार “कैंसर” शब्द बोला जाता है, तो उसी दिन से घर का हिसाब-किताब बदल जाता है। पहले रिपोर्टें आती हैं, फिर डर आता है, और उसके ठीक बाद एक पर्ची आती है, जिस पर दवाओं के नाम लिखे होते हैं। उस पर्ची के साथ अक्सर एक बिना कहा निर्देश भी होता है: दवा अस्पताल की अपनी फ़ार्मेसी से ही लीजिए। उस घड़ी में कोई मरीज़ या उसका बेटा काउंटर पर खड़े होकर यह नहीं पूछता कि इस शीशी की असली क़ीमत क्या है। डरा हुआ आदमी मोलभाव नहीं करता। और हमारी पूरी दवा-व्यवस्था इसी डर के… - [जब तिजोरी की चाबी ही बिक जाए](https://ravikantraut.in/mpsc-paper-leak-who-examines-the-examiner/): किसी बैंक में डकैती हो जाए तो हम पहले ताले देखते हैं, फिर दीवारें, फिर पहरेदार। पर अगर पता चले कि तिजोरी किसी ने तोड़ी ही नहीं, बल्कि उसकी चाबी रखने वाले कर्मचारी ने ख़ुद पार्किंग में खड़े होकर किसी को थमा दी थी, तब सवाल ताले का नहीं रह जाता। तब सवाल उस पूरे भरोसे का हो जाता है जिसके सहारे बैंक चलता है। महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के साथ इस समय ठीक यही हो रहा है। पिछले हफ़्ते भर से पुणे की सड़कों पर हज़ारों प्रतियोगी छात्र बैठे हैं। उनकी माँग है कि आयोग के अध्यक्ष इस्तीफ़ा दें।… - [भूजल के लगातार सूखते जाने का संकट](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/): विगत दिनों  दिल्ली के भारत मंडपम में एक बड़ा तमाशा शुरू हुआ। नौवां “इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक” खुला है, उपराष्ट्रपति ने इसका उद्घाटन किया , दुनिया भर से नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, उद्योगपति और स्टार्टअप जुटे , और पांच दिन तक “क्लाइमेट रेज़िलिएंट वॉटर मैनेजमेंट” पर गंभीर चर्चाएं हुयीं। भाषण हुये होंगे, प्रस्तुतियां हुयी होंगी, तस्वीरें खिंचेंगी गयीं होंगी, और शुक्रवार तक सब लोग अपने-अपने शहर लौट गये होंगे। ठीक इसी हफ्ते, बीते कुछ दिनों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच किशाऊ बांध परियोजना पर पानी बांटने का समझौता हुआ है, मध्य प्रदेश-गुजरात-राजस्थान-महाराष्ट्र के बीच नर्मदा को… - [ग्रेट निकोबार: जिनसे पूछा ही नहीं गया, उनकी 'हाँ' कैसे मान ली?](https://ravikantraut.in/great-nicobar-whose-consent-counts/): किसी से उसकी ज़मीन माँगने के दो तरीके होते हैं। पहला, उसके सामने बैठकर पूरी बात बताई जाए: क्या बनेगा, कितना जंगल कटेगा, उसका गाँव कहाँ जाएगा, और वह चाहे तो मना भी कर सकता है। दूसरा, एक काग़ज़ आगे बढ़ा दिया जाए और कहा जाए, यहाँ दस्तख़त कर दो। काग़ज़ पर दोनों का नतीजा “सहमति” ही लिखा जाता है। पर लोकतंत्र में इन दोनों के बीच जो फ़ासला है, वही बताता है कि कोई राज्य अपने सबसे कमज़ोर नागरिक को किस नज़र से देखता है। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी केंद्र सरकार की एक… - [गार्गी से गीब्रा तक-स्त्री-ऋषिकायें और ए.आई.-एथिक्स](https://ravikantraut.in/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/):  जब प्रश्न ही ब्रह्म था, और आज भी है जबलपुर में नर्मदा के किनारे एक छोटे-से कोचिंग सेंटर में, शाम की उस घड़ी जब सूरज घाटों पर सुनहरा उतरता है, मेरी पोती लैपटॉप की स्क्रीन पर पायथन का कोड चला रही थी। उसने बिना सिर उठाए पूछा – “दादाजी, अगर ए.आई. सब कुछ सीख लेगा, तो हम आगे क्या पूछेंगे?” यह सवाल इतना सीधा था कि उसकी गहराई तुरंत समझ नहीं आई। पर उसी शाम, नर्मदा की धार देखते हुए, मुझे राजा जनक की वह सभा याद आ गई जहाँ दक्षिणा सोने की नहीं, प्रश्नों की दी जाती थी और उस… - [जब महंगाई खेत से आए, तो इलाज बैंक में क्यों?](https://ravikantraut.in/rbi-rate-hike-drought-inflation-question/): मान लीजिए, किसी मरीज़ को लू लग गई है और डॉक्टर उसे खांसी की दवाई दे रहा है। दवाई अच्छी है, असरदार भी है, पर सवाल यह है कि बीमारी वही है या नहीं। आज जब रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) तीन दिन की बैठक के लिए बैठी है, और बाज़ार लगभग मान चुका है कि बुधवार को रेपो रेट बढ़ेगा, तब यही उलझन सबसे ज़्यादा सोचने लायक है। महंगाई लौट आई है, यह सच है। लेकिन यह महंगाई आई कहाँ से है, और क्या ब्याज दर का औज़ार वहाँ तक पहुँच भी सकता है? ख़बर इतनी है कि… - [पुस्तक समीक्षा मौन संवाद: “कराहते कुरुक्षेत्र में युयुत्सु – बर्बरीक संवाद” की समीक्षा ‘"कुलीनता और धर्म पर एक मौन प्रतिरोध"](https://ravikantraut.in/%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/):   महाभारत का काल केवल युद्ध का काल नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के धर्म और अधर्म, कुलीनता और कर्मशीलता, नीति और कृपणता के संघर्ष का काल था। अनुपम त्रिपाठी का खंड-काव्य “मौन संवाद” इस संघर्ष को पुनः मानवीय चेतना के स्तर पर ले आता है। यह काव्य न केवल दो उपेक्षित पात्रों युयुत्सु और बर्बरीक का संवाद है, बल्कि उस मौन इतिहास की पुनर्स्मृति भी है जो हर युग में अकुलीन पराक्रम को कुलीनता की चौखट पर नत कर देता है। इस दृष्टि से यह खंड-काव्य महाभारत की कथावस्तु का पुनर्पाठ है , परंतु यह पुनर्पाठ किसी धार्मिक या पौराणिक… - [पराली प्रबंधन की असली परीक्षा अभी बाकी है](https://ravikantraut.in/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%80/): सितंबर का महीना उत्तर भारत के लिए एक अदृश्य उलटी गिनती लेकर आता है। पंजाब और हरियाणा के खेतों में धान की बालियां अभी हरी हैं, लेकिन अगले डेढ़-दो महीने में यही खेत एक ऐसे फैसले का मैदान बनेंगे जो दिल्ली-एनसीआर की सांसों की गुणवत्ता तय करेगा। हरियाणा सरकार के अपने आकलन के मुताबिक इस सीजन करीब अस्सी लाख टन धान की पराली पैदा होने का अनुमान है, जो लगभग सोलह लाख हेक्टेयर में हुई धान की खेती से निकलेगी। सवाल वही पुराना है, पर हर साल पहले से ज्यादा तीखा होता जाता है: क्या इस बार खेत जलने से बचेंगे,… - [बापू आज होते तो](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%82-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%8b/): आरव ने उस आदमी को ब्लॉक कर दिया। वह उसे जानता भी नहीं था। केवल इसलिए कि उसने उसकी बात से असहमति जताई थी। कुछ क्षण पहले तक आरव उसके जवाब में तीखी टिप्पणी लिख रहा था। फिर उसकी उंगली स्क्रीन पर रुक गई। अचानक उसे लगा – क्या असहमति का जवाब अपमान ही होना चाहिए? उसने मोबाइल बंद किया और कुर्सी पर पीछे टिक गया। कमरे की दीवार पर गांधी की एक छोटी-सी तस्वीर टंगी थी। किसी पुराने कैलेंडर से काटकर उसने न जाने कब वहाँ चिपका दी थी। उसने शायद ही कभी उस तस्वीर को ध्यान से देखा था।… - [दो टिकट और एक पेड़](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%9f-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): उस दिन शुक्रवार था, आटाचक्की के पाट टाँकने का दिन। केसर बाई ने चक्की का पत्थर उतरवाकर बरामदे में लिटा दिया था। टाँकी से उसकी घिसी लकीरों पर चोट करतीं—ठक, ठक, ठक। पत्थर की धूल उनके पल्लू पर जमती जाती। “ग्राहक कहते हैं आटा मोटा आ रहा है,” भोला ने कहा। “पाट घिस गया था। आज टाँक रही हूँ। कल से बारीक आएगा।” भोला सीढ़ी पर बैठा था। पास में एक थैला था। “चाची, मैं इंदौर जा रहा हूँ। कारखाने में काम मिल गया है। बारह हजार।” केसर बाई ने थैले की ओर देखा, कुछ नहीं पूछा। भोला बोला, “रुक्मिणी का… - [आज गांधी होते तो जेन-ज़ी से क्या कहते?](https://ravikantraut.in/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87/): 2 अक्टूबर केवल गांधी का जन्मदिन नहीं, यह उस प्रश्न का दिन भी है कि गांधी आज होते तो हमें क्या कहते। हर वर्ष 2 अक्टूबर आते ही गांधी हमारे सामने फिर खड़े कर दिए जाते हैं- गोल चश्मा, लाठी, चरखा, खादी और “अहिंसा परमो धर्मः” जैसी परिचित पंक्तियों के साथ। कल्पना कीजिए, गांधी आज के भारत में जन्मे होते। उनके सामने अंग्रेजी साम्राज्य नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म की दुनिया होती। हाथ में अखबार नहीं, स्मार्टफोन होता। उनके सामने चंपारण का किसान ही नहीं, ऐप पर काम करता युवा, स्टार्टअप का संस्थापक, बेरोजगार डिग्रीधारी, कंटेंट क्रिएटर, जलवायु परिवर्तन से चिंतित किशोर और… - [कैंसर की दवा पर दस गुना मुनाफ़ा: इलाज या वसूली?](https://ravikantraut.in/cancer-drug-tenfold-markup-hospital-pharmacy/): किसी परिवार में जब पहली बार “कैंसर” शब्द बोला जाता है, तो उसी दिन से घर का हिसाब-किताब बदल जाता है। पहले रिपोर्टें आती हैं, फिर डर आता है, और उसके ठीक बाद एक पर्ची आती है, जिस पर दवाओं के नाम लिखे होते हैं। उस पर्ची के साथ अक्सर एक बिना कहा निर्देश भी होता है: दवा अस्पताल की अपनी फ़ार्मेसी से ही लीजिए। उस घड़ी में कोई मरीज़ या उसका बेटा काउंटर पर खड़े होकर यह नहीं पूछता कि इस शीशी की असली क़ीमत क्या है। डरा हुआ आदमी मोलभाव नहीं करता। और हमारी पूरी दवा-व्यवस्था इसी डर के… - [तुम्हारे जाने के बाद](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6/): तुम चली गईं, तब भी कमरा कहां खाली  हुआ तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बैठी रही कुर्सी पर, और खिड़की के पास, तुम्हारी आवाज़ ठहरी रही। आज सुबह अधजागी हालत में मैंने तुम्हें टटोलने के लिए हाथ बढ़ाया था , फिर याद आया कि तुम नहीं हो, तो मैं झट से उठ बैठा और फ़िर इस खालीपन के अहसास से  भागने लिए खुद को काम में झोंक दिया दिनभर आज भी सुबह जब मैंने चाय रखता हूं टेबल पर तो याद आता है तुम तो ऐसे पीती थीं। दरवाज़ा खोलता हूँ तो एक पल को उम्मीद होती है कि तुम सामने होओगी। फिर याद… - [जो छत बना रहे थे, उसी के नीचे दब गए](https://ravikantraut.in/ambala-collapse-construction-worker-safety/): किसी भी इमारत में सबसे नाज़ुक क्षण वह होता है जब उसकी छत ढाली जा रही होती है। सरिया बँध चुका होता है, शटरिंग खड़ी होती है, मसाले से भरी तसलियाँ एक हाथ से दूसरे हाथ तक दौड़ रही होती हैं, और पूरा ढाँचा उस वक़्त अपने सबसे ज़्यादा वज़न के नीचे होता है। जो लोग उस क्षण उस छत पर और उसके नीचे खड़े होते हैं, वे जानते हैं कि उनकी जान कुछ बल्लियों, कुछ तख़्तों और किसी ठेकेदार की ईमानदारी पर टिकी है। रविवार की दोपहर अंबाला के पास धूलकोट गाँव में यही भरोसा टूट गया। एक तीन मंज़िला… - [गिरते रुपये का बिल किसके नाम?](https://ravikantraut.in/who-pays-for-the-falling-rupee/):   रुपये की गिरावट की खबर अब अख़बार के पहले पन्ने से खिसककर बिज़नेस पेज के किसी कोने में पहुँच गई है। 94, फिर 95, फिर 96। हर नया आंकड़ा पिछले से थोड़ा कम चौंकाता है। यही सबसे ख़तरनाक बात है। जो चीज़ धीरे-धीरे बिगड़ती है, उस पर हम ध्यान देना बंद कर देते हैं, जबकि उसका बिल हर महीने किसी न किसी की जेब से चुपचाप कट रहा होता है। इस हफ़्ते रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगभग 95.6 से 96 के बीच रहा। पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल के दाम नरम पड़े और सरकारी बैंकों के ज़रिये रिज़र्व बैंक… - [मतदाता सूची से मिटता नाम, आयोग के भीतर उठती आवाज़](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%86/): दिल्ली की मतदाता सूची पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई हो गई। मामला 21 सितंबर को सूचीबद्ध था, बहस 22 को हुई, और फैसला अभी नहीं आया। अदालत ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर पूछा है कि अब तक क्या कदम उठाए गए, और दो हफ्ते बाद मामला फिर सुना जाएगा। सुनने में यह एक सामान्य अदालती तारीख लगती है। पर इस सुनवाई के अगले ही दिन इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट छपी, और दोनों को साथ रखकर पढ़ें तो तस्वीर बदल जाती है। SIR पर सवाल अब सिर्फ विपक्ष के मंच से नहीं उठ रहे। वे सुप्रीम कोर्ट की… - [नोटशीट](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%9f/):           रजिस्टर संख्या 27/1984 को अलमारी के तीसरे खाने में रखा जाता था। यह बात दफ़्तर में किसी नियम-पुस्तिका में नहीं लिखी थी। फिर भी पिछले बयालीस सालों में किसी बाबू ने उसे कभी दूसरी जगह नहीं रखा। जैसे पुरानी फ़ाइलें अपनी जगह खुद चुन लेती हों, और बाद में आने वाले लोग केवल उस निर्णय का पालन करते रहें। रजिस्टर की जिल्द कभी नीली रही होगी। अब उसका रंग वैसा था जैसा बरसों धूप खाने के बाद आसमान का कोई भूला हुआ टुकड़ा हो जाता है। किनारों का कपड़ा उधड़ चुका था। भीतर के पन्नों में… - [हुनर का सूखा: भारत की सबसे बड़ी ताकत किसके हाथ से फिसल रही है?](https://ravikantraut.in/yuva-berojgari-hunar-ka-sookha-bharat-ki-badi-taaqat/): आठ करोड़ सत्तर लाख। यह अकेला एक आंकड़ा है, पर इसके भीतर एक पूरी पीढ़ी की बेचैनी छिपी है। नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि पंद्रह से उनतीस साल के बीच के इतने युवा भारत में ऐसे हैं जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न किसी काम में लगे हैं, न ही किसी हुनर को सीखने की ट्रेनिंग में। न स्कूल, न कॉलेज, न नौकरी, न प्रशिक्षण। बस इंतज़ार। और यह इंतज़ार किसी छोटे शहर के किसी कोने तक सीमित नहीं, यह देश भर में फैला हुआ है। यही रिपोर्ट, जिसका नाम है “रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित… - [जब अमेरिका का सपना एक करोड़ का हो जाए](https://ravikantraut.in/jab-america-ka-sapana/): आज से ठीक एक साल पहले, 21 सितंबर 2025 को, अमेरिका ने एक ऐसा फैसला सुनाया था जिसकी गूंज बेंगलुरु के पीजी कमरों से लेकर हैदराबाद के कोचिंग सेंटरों तक सुनाई दी थी — हर नई H-1B वीज़ा याचिका पर एक लाख डॉलर, यानी करीब एक करोड़ रुपये का शुल्क। इस हफ्ते, ठीक उसी तारीख पर, वॉशिंगटन ने इस शुल्क को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। जो फैसला कभी एक अस्थायी झटके जैसा लग रहा था, वह अब एक स्थायी नीति की शक्ल लेता दिख रहा है। और इसके साथ ही भारत के सामने एक सवाल फिर खड़ा… - [संदेह का दीप](https://ravikantraut.in/sandeh-ka-deep/): गाँव का नाम था देवपुर—नदी के किनारे बसा, पीपल और नीम की छाया में साँस लेता हुआ एक साधारण-सा गाँव। देवपुर में एक पुराना मंदिर था, जिसकी घंटियों की आवाज़ सुबह की चिड़ियों से पहले उठती थी। लोग कहते थे—“यह मंदिर विश्वास पर टिका है।” मंदिर का दीप वर्षों से हरि शास्त्री जलाते आ रहे थे। सफ़ेद धोती, शांत आँखें, और माथे पर हल्की-सी चंदन रेखा। लोग उन्हें ज्ञानी मानते थे, पर कोई नहीं जानता था कि हरि शास्त्री के भीतर एक गहरा द्वंद्व पल रहा था। उस वर्ष बारिश समय पर नहीं आई। खेत सूखने लगे। कुएँ का पानी नीचे… - [भूजल के लगातार सूखते जाने का संकट](https://ravikantraut.in/india-water-crisis-that-wins-no-votes/) - [हरे झूठ का महोत्सव](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5/): दुनिया के सबसे बड़े झूठ हमेशा बहुत सुंदर रंगों में लिखे जाते हैं। कभी वे साम्राज्य कहलाते हैं। कभी विकास। कभी सभ्यता। और अब— वे “हरित भविष्य” कहलाते हैं। 5 जून की सुबह फिर आएगी। सरकारी भवनों पर हरे कपड़े के बैनर टाँगे जाएँगे। कॉर्पोरेट कार्यालयों में छोटे-छोटे पौधे बाँटे जाएँगे। बच्चे पृथ्वी की तस्वीर रंगेंगे। नेता मिट्टी में फावड़ा छुआकर कैमरे की ओर मुस्कुराएँगे। और उसी समय पृथ्वी, अपने भीतर कहीं बहुत गहरे, चुपचाप काँप रही होगी। क्योंकि मनुष्य ने पहली बार प्रकृति को नष्ट करना नहीं सीखा है— उसने पहली बार प्रकृति को बचाने का अभिनय करना सीख लिया… - [रिटायरमेंट प्लान](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a8/): मेहताजी ने पूरी ज़िंदगी एक ही सपना देखा — “रेटायरमेंट के बाद आराम करूँगा।” नौकरी में — “अभी थोड़ा और।” त्योहार में — “रिटायर होने दो, फिर मनाएँगे।” बच्चों के साथ — “अभी टाइम नहीं। रिटायर होने दो।” पत्नी के साथ — “अभी टेंशन है। रिटायर होने दो।” रेटायरमेंट आई। पहला दिन — चाय पी। अख़बार पढ़ा। अच्छा लगा। पहला हफ़्ता — फिर चाय। फिर अख़बार। थोड़ा कम अच्छा लगा। पहला महीना — बेटे ने कहा, “पिताजी, आप घर पर रहते हो तो काम वाली बाई काम नहीं करती — आप टोकते रहते हो।” तीसरा महीना — बहू ने कहा, “पिताजी,… - [देह रुकी, मन बह चला’ : मन की अनवरत यात्रा का काव्य-संसार](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b9-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a8/): मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर इंदौर समाचार पत्र  में समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’ द्वारा दी गई पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय अनुभव है। समीक्षा के अंश : कविता वह विधा है जो मनुष्य के अंतर्मन की अनुभूतियों को शब्दों का स्पर्श देती है। जब कोई कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में छिपे असाधारण भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, तब उसकी रचनाएँ सीधे पाठक के हृदय तक पहुँच जाती हैं। समकालीन हिंदी कविता में रविकांत राऊत ऐसे ही संवेदनशील रचनाकार हैं। रविकांत राऊत एक ऐसे कवि हैं, जिनकी लेखनी जीवन के साधारण अनुभवों में… - [आईआईटी की तीसरी मौत: मेरिट के दुर्ग में जाति की सेंध](https://ravikantraut.in/iit-jaatigat-bhedbhav-ki-teesri-maut-merit-durg-mein-sendh/): मुंबई के पवई इलाके में आईआईटी बॉम्बे का कैंपस देश के सबसे चमकदार सपनों का पता माना जाता है। बारहवीं की परीक्षा देने वाले लाखों बच्चे रात-रात भर जागकर बस यही एक पता पाने की कोशिश करते हैं। इसी कैंपस के एक हॉस्टल कमरे में 18 सितंबर की रात 22 साल के साहिल वाकोडे का शव पंखे से लटका मिला। यह इस कैंपस में सात महीनों के भीतर तीसरी छात्र आत्महत्या है। और हर बार की तरह इस बार भी वही पुराना, बेचैन करने वाला सवाल लौट आया है, क्या भारत के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान सचमुच मेरिट की मूर्ति हैं,… - [अनुकरण की संस्कृति : अतीत से वर्तमान की यात्रा](https://ravikantraut.in/anukaran-ki-sanskriti/): अनुकरण की संस्कृति गढ़ने की ढाई हज़ार साल पुरानी भारतीय तरकीब एक लड़का जंगल में मिट्टी की एक मूर्ति बनाता है। सामने कोई गुरु नहीं होता, कोई मार्गदर्शन नहीं, बस एक अस्वीकृति का घाव और उसे मिटाने की ज़िद। वर्षों की तपस्या के बाद वह उस राजकुमार से बेहतर धनुर्धर बन जाता है, जिसके लिए गुरु ने उसे भगा दिया था और जब गुरु को यह पता चलता है, तो वह शिष्य न मानते हुए भी उससे दक्षिणा मांग लेता है -उसका दाहिना अंगूठा। एकलव्य बिना एक पल गंवाए अपना अंगूठा काट देता है। हमें सदियों से यह सिखाया गया है… - [“सफलता का कैदी”](https://ravikantraut.in/safalta-ka-kaidi/):   आज मैंने जो मुखौटा पहना है, उसका नाम है—सफलता का कैदी। सुबह के अख़बार में मेरा नाम छपा था। राज्य सेवा परीक्षा की चयनित अभ्यर्थियों की सूची में मेरा नाम था। घर में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं। फोन लगातार बज रहा था—”बधाई हो!”, “हम जानते थे तुम कर लोगे!”, “अब तो ज़िंदगी सेट है!” हर आवाज़ में उत्साह था, हर शब्द में एक निश्चितता। मैं मुस्कुरा रहा था—वही मुस्कान, जो ऐसे मौकों पर पहनी जाती है। तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला। वह बाहर आई—सफलता। उसने बहुत महंगे कपड़े पहने थे। चेहरे पर एक स्थिर, भारी-सी… - [सौ फ़ीसदी टैरिफ़ की धमकी और भारत की स्वतंत्रता का असली इम्तिहान](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a5%8c-%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%94/): कल्पना कीजिए एक ऐसा घर, जिसे बिजली दो पड़ोसियों से मिलती है – एक सस्ती लेकिन विवादित, दूसरी महंगी लेकिन ‘सम्मानजनक’। अब वह पड़ोसी जो महंगी बिजली बेचता है, धमकी देता है कि सस्ती बिजली लेना बंद करो, वरना घर का सामान बाज़ार में बेचने नहीं दूंगा। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि पिछले हफ़्ते अमेरिकी संसद में पारित हुए एक क़ानून ने भारत के सामने ठीक यही स्थिति खड़ी कर दी है। 17 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 262 के मुक़ाबले 159 वोटों से ‘सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ पारित कर दिया। सीनेट पहले ही अगस्त में इसे… - [सपनों पर लगा टैक्स: क्या भारत अब अपने ही युवाओं को घर में मौका देना सीखेगा?](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%9f%e0%a5%88%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8/): पिछले तीन दशकों में भारत के लाखों घरों में एक ख़्वाब पला-बढ़ा है। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लेते ही एक अनकहा रोडमैप तय हो जाता है, अच्छे ग्रेड, एक कैंपस प्लेसमेंट, कुछ साल की मेहनत, और फिर एक दिन H-1B वीज़ा की लॉटरी में नाम निकलने का इंतज़ार। यह सिर्फ़ नौकरी का सपना नहीं है, यह एक पूरी सामाजिक व्यवस्था बन गया है जिसमें शादी के बाज़ार से लेकर मोहल्ले की इज़्ज़त तक सब कुछ इस एक वीज़ा स्टैम्प से जुड़ा हुआ है। अब उस सपने पर अमेरिका ने एक भारी टैक्स लगा दिया है, और यह टैक्स सिर्फ़ पैसों का… - [‘देह रुकी, मन बह चला’ : मन की अनवरत यात्रा का काव्य-संसार](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b9-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a5%82/): । मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर हरिभूमि समाचार पत्र  में समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’ द्वारा दी गई पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय अनुभव है। समीक्षा के अंश : क विता वह विधा है जो मनुष्य के अंतर्मन की अनुभूतियों को शब्दों का स्पर्श देती है। जब कोई कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में छिपे असाधारण भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, तब उसकी रचनाएँ सीधे पाठक के हृदय तक पहुँच जाती हैं। समकालीन हिंदी कविता में रविकांत राऊत ऐसे ही संवेदनशील रचनाकार हैं। रविकांत राऊत एक ऐसे कवि हैं, जिनकी लेखनी जीवन के साधारण… - [चिप का सपना और ज़मीन की सचाई](https://ravikantraut.in/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a4%be/): जिस देश में हज़ारों गाँवों के स्कूलों में आज भी बिजली कभी आती है कभी चली जाती है, जहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज से निकले लाखों नौजवान हर साल अपनी डिग्री के अनुरूप कोई नौकरी न मिलने पर सरकारी क्लर्क की परीक्षा की कतार में लग जाते हैं, उसी देश की सरकार अब दुनिया को चिप्स बेचने का सपना दिखा रही है। बात हवाई नहीं है। दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण का बजट 8 अरब डॉलर से बढ़ाकर 13.5 अरब डॉलर करने का ऐलान किया। पाँचवें संस्करण के इस… - [‘'देह रुकी, मन बह चला' मन की अनवरत यात्रा का काव्य-संसारसमीक्षा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%b9-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0/): मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर नवभारत, रायपुर में नूपेंद्र अभिषेक नृप द्वारा प्रस्तुत पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय अनुभव है। वरिष्ठ समीक्षक नूपेंद्र अभिषेक नृप ने अपनी समीक्षा में इस काव्य-संग्रह को मन की अनवरत यात्रा और मानवीय संवेदनाओं का काव्य-संसार बताते हुए इसकी कविताओं के भाव पक्ष और सहज अभिव्यक्ति को रेखांकित किया है। समीक्षा के अंश: कविता वह विधा है जो मनुष्य के अंतर्मन की अनुभूतियों को शब्दों का स्पर्श देती है। जब कोई कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में छिपे असाधारण भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, तब उसकी रचनाएँ… - [वादे बूम, नौकरी गुम](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%ae/):                                     बारह अगस्त आते ही सरकारी विज्ञापनों, भाषणों और सामाजिक माध्यमों पर देश में युवाओं की संख्या अचानक बढ़ जाती है। बाकी दिनों में वही युवा अपने कमरे में बैठा नौकरी के आवेदन भरता रहता है । युवा दिवस का मौसम बड़ा सुहावना होता है। मंच पर एक विशाल बैनर लगता है – “युवा शक्ति : राष्ट्र की शक्ति।” नीचे पचास कुर्सियाँ होती हैं। पहली पंक्ति पर वे लोग बैठते हैं जिनकी उम्र मिलाकर शायद युवा शक्ति की परिभाषा बदल सकती है। कार्यक्रम शुरू… - [बहुध्रुवीयता का दिल्ली संस्करण](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b8/): बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात साल में पहली बार भारत की धरती पर कदम रखते हुए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामफोसा, ये सब एक ही मेज़ पर बैठे, और मेज़बानी भारत के हाथ में थी। अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर सहमति बनवाई, उसे कूटनीतिक हलकों में पहले ही मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी बहुपक्षीय उपलब्धियों में गिना… - [जिनके पास कागज़ नहीं, क्या लोकतंत्र में उनकी जगह भी नहीं?](https://ravikantraut.in/jinake-paas-kagaz-nahi/): दिल्ली की एक बस्ती में रहने वाला मज़दूर, जो पिछले पंद्रह बरसों से हर चुनाव में वोट डालता आया है, अचानक पाता है कि उसका नाम मतदाता सूची से ग़ायब है। कोई अपराध नहीं, कोई शिकायत नहीं -बस एक फ़ॉर्म में उसकी जानकारी “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” या “अनमैप्ड” की श्रेणी में डाल दी गई। उसे पता भी नहीं कि इसका मतलब क्या होता है, फिर भी उसे साबित करना होगा कि वह मौजूद है, कि वह नागरिक है, कि वह मतदाता है। यह किसी एक आदमी की कहानी नहीं है। यह लाखों लोगों की कहानी है, और यही वजह है कि यह… - [शी चिनफिंग की दिल्ली वापसी: सात साल की खामोशी के बाद एक सतर्क हाथ](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%b8/): बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग  सात साल में पहली बार भारत की धरती पर कदम रखते हुए  ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामफोसा, ये सब एक ही मेज़ पर बैठे, और मेज़बानी भारत के हाथ में थी। अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर सहमति बनवाई, उसे कूटनीतिक हलकों में पहले ही मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी बहुपक्षीय उपलब्धियों में गिना… - [प्यार को पलों में मत तौलिये](https://ravikantraut.in/pyaar-ke-palon-ko-mat-tauliye/): उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था कणाद, पूरे पैंतालीस मिनट गाड़ी चलाकर, भीगते हुए, हाथ में गरमागरम सूप का थर्मस लिए। एक घंटा बैठा रहा। मेरी बॉटल में पानी भरा, दो चुटकुले सुनाए, मेरी हंसी लौटाई… और चला गया। फिर? फिर दो महीने की खामोशी। अब आप सोचिए, क्या कणाद बुरा इंसान था? नहीं। उस शाम वो सच में मौजूद था, सच में फ़िक्रमंद था। पर यहीं वो सवाल छिपा है, जिसे हम अक्सर पूछना भूल जाते हैं, क्या इंसान की… - [तेल, टैरिफ और तटस्थता की असली परीक्षा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%9f%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%ab-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%9f%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%b8/): एक अमीर दोस्त का सबसे बड़ा हथियार क्या होता है? यह धमकी नहीं कि वह रिश्ता तोड़ देगा, बल्कि यह याद दिलाना कि रिश्ता उसकी मर्ज़ी पर टिका है। इस हफ़्ते अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने ठीक यही किया। “लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026” नाम का एक विधेयक 262-159 वोटों से पास हुआ — सीनेट में यह पहले ही अगस्त में 86-11 के भारी बहुमत से पार हो चुका था। इस कानून का सार सीधा है: जो भी देश रूस से तेल खरीदेगा, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उस पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल… - [पगार से पहले पीएफ: 25,000 की नई सीमा किसकी जेब भरेगी, किसकी काटेगी?](https://ravikantraut.in/%e0%a4%aa%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%8f%e0%a4%ab-25000-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a5%80/): महीने की पहली तारीख़ को जब सैलरी स्लिप खुलती है, तो ज़्यादातर लोग सीधे एक ही आंकड़े पर नज़र डालते हैं — “इन-हैंड” कितना आया। बाकी की कटौतियां, चाहे वे टैक्स की हों या भविष्य निधि की, अक्सर एक धुंधली-सी लाइन भर होती हैं, जिन्हें कोई मुश्किल से पढ़ता है। लेकिन 17 सितंबर से देश के लाखों निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह धुंधली लाइन थोड़ी मोटी हो जाएगी। केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO के तहत अनिवार्य कवरेज की वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी है। बारह साल में पहली बार यह… - [वंदे मातरम :एक गीत जिसे अनुमति नहीं, बराबरी चाहिए थी](https://ravikantraut.in/vande-mataram-ek-geet-jise-anumati-nahi-barabarii-chaahiye-thii/): 15 अगस्त की सुबह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर पर पहुँचेंगे, तो पहली आवाज़ जन गण मन की नहीं होगी। आज़ादी के अस्सी बरस में पहली बार, उनके भाषण से ठीक पहले वंदे मातरम् गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान अपनी तय जगह पर रहेगा। रक्षा मंत्रालय ने इसे वंदे मातरम् के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने का सम्मान बताया है। लेकिन इस घोषणा के ठीक भीतर एक दूसरी, कम चर्चित खबर छिपी है, जो असल में ज़्यादा वज़नदार है: जुलाई में संसद ने प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट – 1971 (राष्ट्रीय सम्मान के अपमान के… - [चॉक की धूल में एक उम्र](https://ravikantraut.in/chok-kii-dhool-me-ek-umra/):       बरसों पुरानी वह उंगलियां, जो श्याम्पट्ट पर अ, आ लिखती थीं, सफेद धूल में सनी होती थी मास्टर जी की आवाज में कोई मिठास नहीं होती थी दिखावे की. न कोई डांट होती थी नफरत की, बस एक जिद होती थी कि यह बच्चा कुछ बन कर दिखाए हमें बस याद है वह छड़ी जो कभी लगी नहीं. बस हवा में लहराई, और हमें सीधा कर गई। हमने उनकी थकान कभी नहीं गिनी, न उनकी तनख्वाह पूछी, न यह जाना कि शाम को घर जाकर वे किस कुर्सी पर बैठते थे। आज जब अपने बच्चों को कोई सबक… - [दोष स्क्रीन का नहीं](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/): यूट्यूब गलत नहीं है। सोशल मीडिया भी अपने आप में दोषी नहीं है।माध्यम हमारे सामने संभावनाएं रखता है।अंततः यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उसी स्क्रीन से मनोरंजन लेकर उठते हैं या कोई विचार लेकर।क्योंकि सोए हुए मन के सामने दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी भी खुली हो, तो वह केवल रोशनी देखेगा। जागा हुआ मन उसी स्क्रीन में एक पाठशाला खोज लेगा। जिस उपकरण को हमने मनोरंजन के लिए बनाया था, वही धीरे-धीरे हमारा शिक्षक, पुस्तकालय, समाचार कक्ष, सभागार और कभी-कभी हमारा विचारक भी बन गया है। लेकिन इसी स्क्रीन पर एक और दुनिया भी रहती है।… - [तुम्हारी किताब के और पन्ने पढ़ने की चाह](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8/): तुम्हें जान लेने के बाद भी मैं तुम्हें और पढ़ना चाहता हूँ। तुम्हारी हँसी देखने के बाद अब तुम्हारी खामोशी पढ़ना चाहता हूँ, तुम्हारी आँखों के उजाले तो देख लिये मैंने अब उनमें उतरती हुई शाम पढ़ना चाहता हूँ। जो कुछ कहा था तुमने कहा, वह सब तो सब सुन लिया मैंने अब वह पढ़ना चाहता हूँ जिसे पढ़ने से कभी , रोक लिया था तुमने कोई ज़ल्दी नहीं है मुझे न कोई ज़िल्द हो तुम कि किसी दिन बंद कर दूँ तुम्हें तुम तो वह पन्ना हो जो हर रोज़ कुछ और रौशन हुआ करता है मुझसे पूछे अगर कोई… - [कृष्ण बनाम जेन-ज़ी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%80/): जन्माष्टमी के उत्सव के समांतर, अगर हम कृष्ण को देवता के खोल से बाहर निकालकर सिर्फ एक किरदार की तरह देखें, तो सामने एक ऐसा युवा खड़ा मिलता है जिसे आज की पीढ़ी शायद अपना ही कोई सहपाठी मान बैठे। वह युवा जो किसी एक पद, एक शहर, एक पहचान में बंधने से इनकार करता रहा . कभी गोकुल का ग्वाला, कभी मथुरा का राजनेता, कभी कुरुक्षेत्र का सारथी, कभी द्वारका का कूटनीतिज्ञ। एक ऐसा करियर-ग्राफ, जिसे आज की भाषा में “पोर्टफोलियो करियर” कहा जाता – जहां पद की ऊंचाई नहीं, हुनर की चौड़ाई मायने रखती है। हाल ही में आई… - [हिंदी चुनना: पीछे लौटना नहीं, अपनी आवाज़ को ऊँचा करना](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9/): कल्पना कीजिए कि कोई 22 साल का युवा है। उसे कोडिंग आती है, वह आर्टिफिशियल-इंटेलीज़ेंस समझता है, इंस्टाग्राम पर रील्स बनाता है, व्हाट्सएप पर बात करता है और उसके फोन में दुनिया की लगभग हर जानकारी मौजूद है। वह अंग्रेजी समझता है, पर ‘हिंग्लिश’ बोलता है और उसकी बातचीत में LOL, BTW, vibe, literally, bro और यार एक ही वाक्य में सहजता से आ सकते हैं। अब उससे यह कहना कि “तुम्हें हिंदी बचानी चाहिए” शायद उसे प्रभावित न करे। लेकिन अगर उससे कहा जाए- “तुम्हें हिंदी पर कमांड हासिल करनी चाहिए, क्योंकि इससे तुम दूसरे लोगों के दिमाग और दिल… - [व्यंग्य: भाषण हिंदी में, व्हाट्सएप रोमन में](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a5%8d/): चौदह सितंबर की सुबह दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर एक चमकीला पोस्टर चस्पा हुआ — “Hindi Pakhwada: 14 to 28 September, Celebrate Our Mother Tongue!” पोस्टर का शीर्षक अंग्रेज़ी में था, नीचे मोटे अक्षरों में हिंदी में लिखा था, “अपनी भाषा पर गर्व करें।” जिस बाबू ने यह पोस्टर बनाया, उसने कंप्यूटर पर हिंदी कीबोर्ड ढूंढने में इतना वक्त गंवाया कि आखिर में पूरा मैटर अंग्रेज़ी में टाइप कर के गूगल ट्रांसलेट से हिंदी करवाना पड़ा, इस उम्मीद के साथ कि कोई शब्द अजीब न निकले। संयोग से एक जगह “प्राउड” का अनुवाद “गर्भवती” छपते-छपते बचा, वरना उद्घाटन समारोह में ही… - [जब पहली बार 'अ' लिखा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%85-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%be/):   एक स्लेट थी, फटी हथेली जितनी छोटी, और मिट्टी सी सोंधी एक कलम, जिसे खड़िया कहते थे बड़े लोग मास्टर जी की उंगली मेरी मुट्ठी पर थी, और मेरी मुट्ठी में था डर , फिर एक लकीर बनी, टेढ़ी, हकलाती हुई, जैसे कोई बच्चा पहला कदम रखता है बिना यह जाने कि गिरना भी सीखने का हिस्सा है ‘अ’ बस एक अक्षर था, पर उस दिन लगा जैसे किसी ने मेरे नाम की पहली ईंट रख दी हो। घर लौटा तो आंगन की धूल में उसी अक्षर को फिर-फिर लिखता रहा, जैसे मैं अपने होने का सबूत गढ़ रहा होऊं बरसों बाद आज भी जब अपने नाम का हस्ताक्षर करता हूं, तो कभी-कभी वही टेढ़ी लकीर याद आ जाती है वह पहला ‘अ’, जो डर से नहीं, एक उम्मीद से लिखा गया था। रविकान्त राऊत   जबलपुर, मध्यप्रदेश   9425611243        - [एक अच्छी हिंदी बोलने वाला युवा कहाँ पहुँच सकता है](https://ravikantraut.in/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be/): आज कैमरा सबके पास है। AI भी सबके पास पहुँच रहा है। लेकिन प्रभावशाली भाषा अभी भी सबके पास नहीं है। यही वह जगह है जहाँ भाषा प्रतिभा को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदल सकती है। कल्पना कीजिए एक ऐसे युवा की जो हिंदी पर असाधारण कमांड रखता है। वह किसी विषय को सिर्फ समझाता नहीं- समझा देता है। वह किसी कहानी को सिर्फ सुनाता नहीं- दृश्य बना देता है। वह किसी भावना को केवल व्यक्त नहीं करता- दूसरे व्यक्ति को वह भावना महसूस करा देता है। वो क्या नहीं कर सकता वो क्या नहीं बन सकता ऐसा युवा मीडिया में जा… - [हिंदी छोड़ने से पहले ज़रा यह हिसाब तो लगा लो](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%b0%e0%a4%be/): चौदह सितंबर आते ही देश भर के स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में वही तस्वीर दोहराई जाती है – दीवार पर “मातृभाषा का सम्मान करें” के पोस्टर, मंच से हिंदी को सिंहासन पर बिठाने वाले भाषण, और शाम होते ही सब कुछ फिर अंग्रेज़ी में लौट आना। यह तारीख भी उतनी रोमांटिक नहीं जितनी बताई जाती है। चौदह सितंबर उन्नीस सौ उनचास को संविधान सभा में तीन साल की खींचतान के बाद जो फैसला हुआ, वह दरअसल के.एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अयंगर के नाम पर बना एक समझौता था, जिसे मसौदा समिति के अध्यक्ष भीमराव आंबेडकर ने भी आगे बढ़ाया –… - [अहल्या : पाषाण में धड़कता स्त्रीत्व](https://ravikantraut.in/ahilya-paashan-mein-srtitva/): शांति नायर के कविता-संग्रह ‘अहल्या’ पर साहित्यिक समीक्षा शांति नायर की ‘अहल्या’ को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात मन में उतरती है, वह यह नहीं कि अहल्या पत्थर क्यों बनी, बल्कि यह कि आखिर उसे पत्थर बनाने का अधिकार किसे था। मिथक ने हमें एक ऐसी कथा दी है जिसे हम सदियों से लगभग बिना किसी प्रतिप्रश्न के स्वीकार करते आए हैं-अहल्या गौतम ऋषि की पत्नी थीं, इंद्र ने छल किया, गौतम ने शाप दिया और राम के चरण-स्पर्श से उनका उद्धार हुआ। कथा में सब कुछ अपनी जगह पर है, लेकिन जैसे ही हम इस कथा को अहल्या की… - [कुर्सी](https://ravikantraut.in/kursi-chair/): जंगल में पड़ी लकड़ी… और घर में रखी कुर्सी — दोनों एक ही वृक्ष से जन्मी थीं, पर अर्थ ने उन्हें अलग कर दिया। उसके घर की पुरानी कुर्सी खिड़की के पास रखी रहती थी। नीम के पेड़ की छाया दोपहर को धीरे-धीरे फर्श पर उतर आती, और शाम को वही कुर्सी सूर्यास्त की गवाह बनती। वह रोज़ वहीं बैठती थी। कभी चाय का कप हाथ में, कभी अधखुली किताब गोद में, और कभी—बस यादें। उस कुर्सी पर बैठते ही घर “घर” हो जाता था। उस दिन जब वह पहली बार आया था, तो उसने कुर्सी की ओर इशारा कर कहा… - [मुरली वाला भी जेन-ज़ी निकला](https://ravikantraut.in/murali-wala-bhii-zen-g-nikalaa/): जन्माष्टमी की रात घरों और मंदिरों में झूला सजता है, माखन-मिश्री का भोग चढ़ता है, शंख बजते हैं, पर इसी उत्सव के ठीक बगल में, अगर हम कृष्ण को देवता के तेजोमय खोल से पल भर के लिए बाहर निकालें और सिर्फ एक किरदार की तरह देखें, तो सामने एक ऐसा युवा खड़ा मिलता है जिसे आज की पीढ़ी शायद अपना ही कोई सहपाठी मान बैठे। एक ऐसा युवा, जिसने कभी किसी एक पद, एक शहर, एक तयशुदा पहचान में बंधना स्वीकार नहीं किया। कभी गोकुल का ग्वाला, कभी मथुरा का न्यायकर्ता, कभी कुरुक्षेत्र का सारथी, कभी द्वारका का कूटनीतिज्ञ और… - [अतिथि शिक्षक : एक दिन सम्मान, बाकी दिन अपमान](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%bf-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be/): पांच सितंबर की सुबह प्रिंसिपल साहब खुद स्टाफ रूम में मिठाई बांटने आए, वही प्रिंसिपल जो बाकी तीन सौ चौंसठ दिन शाला के अतिथि शिक्षकों को यह याद दिलाते नहीं थकते कि “आपकी कोई हैसियत नहीं, चाहें तो अभी छुट्टी कर दें।” आज उन्होंने हर अध्यापक के गले में माला डाली, हाथ जोड़े, और मंच से घोषणा की, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं, इनके चरणों में हमारा नमन है।” पीछे खड़े गणित के मास्टर तिवारी जी मन ही मन हिसाब लगा रहे थे कि पिछले तीन महीने से जो वेतन नहीं आया, वह किस खाते में नमन कर रहा है। मंच पर… - [विरासत से व्यवस्था तक टाटा की अगली परीक्षा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%95-%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%9f/): एन. चंद्रशेखरन ने टाटा संस के चेयरमैन पद पर अपने अगले कार्यकाल की पेशकश न करने का निर्णय लिया है। उनका वर्तमान कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना है। उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को बोर्ड में एक सदस्य का समर्थन नहीं मिला और छह महीने तक इस पर कोई समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद उन्होंने नेतृत्व में स्पष्टता की आवश्यकता को देखते हुए स्वयं को अगले कार्यकाल से अलग कर लिया। बाजार ने इसे तुरंत महसूस किया। टाटा समूह की कई सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई और टीसीएस पर विशेष दबाव दिखा। लेकिन शेयर बाजार की… - [गुरु दक्षिणा-जो हमने कभी चुकाई ही नहीं](https://ravikantraut.in/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81-%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%9a/): पांच सितंबर की सुबह देश के हर स्कूल में एक जैसा दृश्य दोहराया जाता है, बच्चों के हाथों में फूल, गले में मालाएं, और मंच से गूंजता वही श्लोक, गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः। यह तारीख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की है, जो अठारह सौ अठासी में जन्मे थे और उन्नीस सौ बासठ में जब भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ शिष्यों और मित्रों ने उनका जन्मदिन बड़े स्तर पर मनाने की इच्छा जताई। राधाकृष्णन ने उस प्रस्ताव को यह कहकर लौटा दिया कि उनका जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, ताकि… - [धरती माँ, थोड़ा और एडजस्ट कर लो](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%a5%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%a1%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95/): सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार गूँजती आवाज़, “आज पर्यावरण दिवस के अवसर पर, ग्रीनवुड एन्क्लेव सोसाइटी की ओर से वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।” मंच पर एक बैनर टंगा था, जिस पर हरे रंग की पृष्ठभूमि में लिखा था – “धरती बचाओ, पेड़ लगाओ” — और बैनर के ठीक नीचे, ज़मीन पर, उस पेड़ का कटा हुआ तना अब भी पड़ा था, जिसे दो हफ्ते पहले “पार्किंग की जगह बढ़ाने” के लिए काटा गया था। सोसाइटी के सेक्रेटरी अग्रवाल जी, सफेद कुर्ता पहने,… - [सातवी मंज़िल की खिडकी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%a1%e0%a4%95%e0%a5%80/): दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल पर एक कमरा था , कमरे के बाहर सफेद रंग के दरवाजे पर लिखा था- “पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी वार्ड” और उस कमरे में एक बाप था। सुनील शर्मा। पचासवाँ साल भी पूरा नहीं हुआ था उम्र का अभी। लेकिन आँखें अस्सी साल की थीं, उनमें वह ख़ाली रोशनी थी जो आदमी को तब मिलती है जब वह बहुत ज़्यादा देख चुका होता है। आठ महीने। इतना वक़्त उसने उस प्लास्टिक की कुर्सी पर गुजारा था , जो खिड़की के ठीक बगल में… - [मास्टर जी मेरा नाम कैसा दिखता है](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf/): आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते हैं। बहुत कम लोगों को याद रहता है कि यह तारीख यूनेस्को ने उन्नीस सौ छियासठ में तय की थी, और इस बरस यह परंपरा साठ बरस पूरे कर रही है। इस बार की थीम है “साक्षरता, लोगों, धरती और समृद्धि के लिए” तीन शब्द जो एक साथ पढ़े जाएं तो अजीब लगते हैं, आदमी, ज़मीन और पैसा भला एक अक्षर की माला में कैसे पिरोए जा सकते हैं? पर ग़ौर करें तो यही तीनों किसी एक हस्ताक्षर के मोहताज होते… - [निराशा का व्याकरण](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3/): एक वैश्विक दर्शन : जब दुनिया के महान मन अंधेरे में उतरे एक रात काफका ने अपनी डायरी में लिखा, “मेरे भीतर एक विशाल संसार है। और में नहीं जानता कि इसे कैसे मुक्त करूं और यदि मुक्त न कर सका, तो यह मुझे नष्ट कर देगा।” यह वाक्य पढ़कर मैं बहुत देर तक बैठा रहा। इसलिए नहीं कि यह किसी महान लेखक का वाक्य था। बल्कि इसलिए कि यह वाक्य ऐसा लगा, जैसे किसी ने मेरे भीतर झांककर लिख दिया हो। और तब मुझे पहली बार समझ आया कि निराशा कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है। यह मनुष्य की सबसे पुरानी,… - [खुली नाराज़गी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%97%e0%a5%80/): वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे जिनसे दिल में दर्द उठता है गोता लगा निराशा के गहरे गर्त से मैंने उबारा था उसे पर वो तो ‘अमी’ बन मंथन की बंट गयी देवताओं में बुरा क्यों लगता है अगर ज़ाहिर करता हूं मैं नाराज़गी खुल के ज़हर पी के ख़ामखां ‘नीलकण्ठ’ यहां बनना किसे है रविकांत राऊत जबलपुर मध्य प्रदेश     - [अंतस का टूटना](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be/):           रात के दस बज रहे हैं। घर में सब कुछ सामान्य दिख रहा है। टीवी पर कोई कार्यक्रम चल रहा है। भीतर से संगीत आ रहा है। कोई बैठकर अपना दूरभाष देख रहा है। और आप… उसी घर में बैठे हैं। उस व्यक्ति के सामने, जिसे कभी आपने अपना सबसे निकट का कहा था। लेकिन अब — पता नहीं क्यों — उसके पास बैठते ही आपके भीतर कुछ बंद होने लगता है। एक अजीब-सी घुटन। जैसे मन चुपके से वहाँ से निकल भागना चाहता हो। वो कुछ पूछता है…आपके भीतर खीझ उठती है। वो चुप रहता… - [जलती हुई बाती](https://ravikantraut.in/%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%88-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80/): मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक गली में सुधीर और मालती का घर था। पक्की दीवारें,आँगन में तुलसी का चौरा,रसोई में हमेशा कुछ न कुछ पकने की महक। बाहर से देखने पर—एक सम्पूर्ण घर। लेकिन भीतर? भीतर कुछ और था। सुधीर हर शाम दफ़्तर से लौटता। दरवाज़े पर चप्पल उतारता। मालती रसोई में होती। दोनों के बीच कुछ शब्द होते—“खाना कब होगा”,“बच्चों ने पढ़ा कि नहीं”,“बिजली का बिल आया क्या।” बस इतना। न झगड़ा। न रोना। न कोई बड़ा उपद्रव। बस एक चुप्पी—जो दीवारों में रच-बस गई… - [बेटे का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): माँ ने पूछा—“बेटा,सब ठीक है?” मैंने कहा—“हाँ माँ।” झूठ नहीं था।सच भी नहीं था। बस वो मुखौटा था—जो हम माँ-बाप के लिए पहनते हैं।ताकि वे चिंता न करें।ताकि हम उन्हें कमज़ोर न दिखें। यही सबसे भारी मुखौटा है। क्योंकि इसे प्रेम से बनाते हैं। और प्रेम से पहनते हैं। रात के ग्यारह बज रहे थे। माँ का call आया। मैं उस वक्त छत पर बैठा था।अकेला।एक ऐसी थकान के साथ जिसे नाम देना मुश्किल था।वह थकान नहीं थी जो नींद से जाती है।वह कुछ और थी। मैंने call उठाया। “बेटा,खाना खाया?” “हाँ माँ।” झूठ था।पर उस वक्त यही सच लगा। “नींद… - [सबका चहेता](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be/): दुनिया अक्सर सच से ज़्यादा presentation पर भरोसा करती है।असली अपराधी डरावने नहीं,भरोसेमंद दिखते हैं और अक्सर वही होते हैं जिन्हें हम”सबसे अच्छा इंसान”घोषित कर चुके होते हैं।यहीं से कहानी शुरू होती है,क्योंकि हम अपराधी को पहचानना चाहते हैं चेहरे से।हम चाहते हैं कि वह डरावना लगे।लेकिन असली अपराधी अक्सर dinner guest जैसे दिखते हैं—सभ्य,आकर्षक,भले आदमी।2015 में जब राहुल मेरे साथ join हुआ,लंच टेबल पर आया जैसे सालों का दोस्त हो।बातूनी,मिलनसार,हर किसी के काम का।फाइल गिरे तो उठा दे,किसी का birthday हो तो cake ले आए।धीरे-धीरे वह सिर्फ़ सबका नहीं,मेरा भी चहेता बन गया।2017 में एक दिन मेरी सहयोगी प्रिया ने… - [भय का प्रहरी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ad%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%80/): “रात 2:17।अनजान नंबर।मैंने उठाया।चुप्पी।फिर एक औरत की आवाज़—‘तुम जाग रहे हो…’मैं जम गया।‘कौन?’उसने कहा—‘तुम्हें डर लग रहा है ना?’फोन कट गया।लेकिन मेज़ पर एक काग़ज़ था—जो पहले नहीं था।उस पर लिखा था:‘अब आगे क्या?’📞💀” रात 1:47 AM—उस रात मैं सो नहीं पा रहा था। कमरे की लाइट बंद थी।लेकिन अंधेरा पूरी तरह अंधेरा नहीं होता—उसमें हमेशा कुछ आकार तैरते रहते हैं।खिड़की से बाहर की हल्की रोशनी।पंखे की छाया।कोने में रखी कुर्सी का धुंधला रूप। घड़ी की टिक-टिक बहुत साफ़ सुनाई दे रही थी। मैं छत की तरफ़ देख रहा था।आँखें खुली थीं।लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था—सिवाय अपने विचारों के। मेरे… - [सफलता का कैदी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a5%80/): आज मैंने जो मुखौटा पहना है,उसका नाम है—सफलता का कैदी। सुबह के अख़बार में मेरा नाम छपा था। राज्य सेवा परीक्षा—चयनित अभ्यर्थियों की सूची। घर में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं। फोन लगातार बज रहा था। “बधाई हो!” “हम जानते थे तुम कर लोगे!” “अब तो ज़िंदगी सेट है!” हर आवाज़ में उत्साह था। हर शब्द में एक निश्चितता। मैं मुस्कुरा रहा था। वही मुस्कान जो ऐसे मौकों पर पहनी जाती है। तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला। वह बाहर आयी। सफलता। उसने बहुत महंगे कपड़े पहने थे। चेहरे पर एक स्थिर,भारी-सी शांति थी। वह मेरे सामने कुर्सी… - [महत्वाकांक्षा का जुआरी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%80/): उस शाम मैं एक छोटे से कमरे में बैठा था।कमरा किराए का था। दीवारों पर कोचिंग संस्थानों के पोस्टर लगे थे— “सफलता अब दूर नहीं” “आपका चयन हमारा लक्ष्य” टेबल पर किताबों का ढेर था। इतिहास। अर्थशास्त्र। राजनीति। समसामयिक घटनाएँ। कमरे की खिड़की से शहर का शोर आ रहा था। पर कमरे के भीतर…बस पन्नों की फड़फड़ाहट की आवाज़ थी। तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला। वह बाहर आया। महत्वाकांक्षा। उसने बहुत चमकदार कपड़े पहने थे। आँखों में अजीब-सी चमक। उसने मेरी किताबों को देखा और मुस्कुराया। “अच्छा है,”उसने कहा। “तुम खेल में शामिल हो चुके हो।” मैंने… - [सम्मान का अभिनेता](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be/): उस शाम मैं एक शादी में था। भारतीय शादियाँ अजीब जगह होती हैं। यहाँ संगीत भी होता है,मिठाइयाँ भी,और साथ-साथ अदृश्य मंच भी—जहाँ हर कोई अपनी भूमिका निभा रहा होता है। लॉन में रोशनी की लड़ियाँ लटक रही थीं। प्लास्टिक की कुर्सियाँ कतार में रखी थीं। दूर से ढोल की आवाज़ आ रही थी। मैं एक कोने में खड़ा सब देख रहा था। तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला। सम्मान बाहर आया। उसने बहुत साफ़ कपड़े पहने हुए थे। चेहरे पर एक स्थिर मुस्कान। वह बोला, “ध्यान से देखो।” मैंने पूछा, “क्या?” वह बोला, “नाटक।” मैंने इधर-उधर देखा।… - [क्रोध का व्यापारी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/): उस सुबह मैं बस अड्डे पर खड़ा था। छोटे शहर का बस अड्डा था। वहीं जहाँ चाय की भाप,धूल,पसीना और इंतज़ार—सब एक ही हवा में घुल जाते हैं। लाइन लगी हुई थी। कोई अख़बार पढ़ रहा था। कोई मोबाइल पर बात कर रहा था। कोई बस की दिशा में ऐसे देख रहा था जैसे आँखों से ही उसे जल्दी बुला लेगा। मैं भी उसी लाइन में खड़ा था। धीरे-धीरे। चुपचाप। तभी एक आदमी आया। वह सीधे लाइन के आगे जाकर खड़ा हो गया। बस इतना ही हुआ। कोई धक्का नहीं। कोई लड़ाई नहीं। बस वह आगे खड़ा हो गया। और उसी… - [निराशा का प्रहरी](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%80/): मेरे भीतर कई कमरे हैं। हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है। जिंदगी जब भी मेरे सामने कोई नई चुनौती रखती है,मैं उनमें से एक मुखौटा उतार कर पहन लेता हूँ। आज जो मुखौटा मैंने पहना है,उसका नाम है—निराशा का प्रहरी। उस सुबह जब मैंने आईने में देखा,तो उसमें मुझे अपना चेहरा नहीं दिखा।बल्कि दिखी”निराशा”जो पहले से वहाँ खड़ी थी। उसने मुझे ऐसे देखा जैसे किसी सरकारी दफ़्तर का क्लर्क किसी पुराने आवेदन को देखता है—जिसे वह वर्षों से फ़ाइल में दबाकर बैठा हो। फिर उसने कहा, “अब तुम्हारी बारी है।” मुझे ठीक से याद नहीं कि”निराशा”मेरे घर कब आई। शायद… - [ईर्ष्या का व्याकरण](https://ravikantraut.in/%e0%a4%88%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3/): यह कथा हर उस लेखक, कलाकार, इंसान की है जो किसी दोस्त की सफलता पर ताली बजाते हुए भीतर से कुछ महसूस करता है जिसे वह नाम नहीं देना चाहता। ईर्ष्या कभी चिल्लाती नहीं। वह बस चुपचाप तुम्हारे पास बैठ जाती है — और तुम्हारी चाय पीने लगती है। यह कथा हर उस लेखक, कलाकार और मनुष्य की है, जो किसी अपने की सफलता पर ताली तो बजाता है, लेकिन भीतर कहीं एक धीमी टीस भी महसूस करता है — ऐसी टीस, जिसे वह नाम नहीं देना चाहता। मेरे मित्र रमेश के उपन्यास का विमोचन था। मैं भी गया था। हम… - [खुली संभावनाओं का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): सुबह 6 बजे।मैंने गैस जलाई।क्लिक हुई।आग नहीं लगी।उस क्षण—पहली बार मुझे‘गैस’दिखी।पहले वह सिर्फ़‘चाय बनाने का ज़रिया’थी।अब घटना एक रूटीन का टूटना थी और उस टूटन में—मुझे पूरी दुनिया का खुलना दिखा। सुबह छह बजे की alarm बजी। मैंने आँखें खोलीं।वही छत।वही रोशनी।वही आवाज़ें—बाहर सड़क पर ट्रक की,पड़ोसी के नल की,अपने साँसों की। मैं उठा।पैर फर्श पर रखे।ठंडक महसूस हुई।लेकिन मैंने”ठंडक”के बारे में नहीं सोचा।मैं बस—उठ गया। रसोई की तरफ़ चला।दरवाज़ा खोला।गैस के पास गया।लाइटर उठाया। क्लिक। आग नहीं लगी। मैंने फिर कोशिश की।क्लिक।फिर नहीं लगी। और तभी—मुझे हमेशा से अदृश्य रही”गैस”दिखी। जो पहले सिर्फ़”चाय बनाने का ज़रिया”थी।एक पारदर्शी,ग़ायब-सी चीज़।मैं उसे”इस्तेमाल”करता था—सोचता… - [सही बंदा है यार का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): 10 में से 1 व्यक्ति ऐसा होता है—जो जहाँ भी जाता है,वहाँ ज़हर घोल देता है।समस्या यह नहीं कि वे मौजूद हैं।समस्या यह है—हम उन्हें पहचानते नहीं।और जब पहचानते हैं—तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।मैंने सोचा—वह मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।5 साल बाद पता चला—वह सबसे बड़ा दुश्मन था।धीमा ज़हर।इतना धीमा कि पता ही नहीं चला कब मर गया मैं।पहली बार जब मैं उससे मिला—तो बहुत अच्छा लगा।ऑफिस की पहली meeting थी।नई team।नए लोग।वह आया।मुस्कुराया।हाथ मिलाया।“अरे यार,तुम भी यहाँ!बहुत बढ़िया।अब मज़ा आएगा।”मैंने सोचा—अच्छा इंसान है।Positive vibes।लेकिन 10 लोगों की उस team में—एक ज़हरीला साँप घुस चुका था।और मुझे पता… - [My Passion का मुखौटा](https://ravikantraut.in/my-passion-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): “‘Follow your passion’—सबसे बड़ा झूठ है।Passion पेट नहीं भरता, और झूठा passion आपको तोड़ देता है।मैंने 5 साल बर्बाद किए।फिर सच जाना। जब पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने नौकरी न करने की बात कही,तब सबने कहा—”पागल हो गया है क्या?” मैंने कहा—”नहीं।मैं अपना passion follow कर रहा हूँ।” मेरा passion था—लिखना।कहानियाँ।किताबें।वो सब जो “सफल” लेखक अपने ब्लॉग और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। मैंने सोचा—अगर मैं पूरी तरह समर्पित हो गया,तो ज़रूर कुछ होगा। यह सोच—मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी। पहले तीन महीने शानदार थे। मैं रोज़ सुबह 6 बजे उठता।कॉफ़ी बनाता।कम्प्यूटर खोलता।और लिखता—घंटों। कोई बॉस नहीं।कोई मीटिंग नहीं।बस… - [हां का झूठा मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): “Counterfeit Yes: जब लोग कहते हैं ‘हाँ, ज़रूर’ और फिर ग़ायब हो जाते हैं।यह बुराई नहीं — लोगों को खुश रखने की बीमारी है। और मैं भी यही करता था। 🎭” उस शाम मैं एक कॉफी शॉप में बैठा था।मेरे सामने एक दोस्त बैठा था। वह उत्साहित था।“मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ,” उसने कहा।“क्यों?” मैंने पूछा।“Passion,” उसने कहा।मैंने सिर हिलाया। कॉफी ठंडी हो रही थी।तभी उसने कहा, “तुम मेरे साथ जुड़ोगे?”मैंने सहजता से कहा — “हाँ, ज़रूर।”यह शब्द मुँह से निकलते ही मुझे भीतर कुछ टूटता हुआ लगा।क्योंकि मैं जानता था — मैं यह नहीं करूँगा। उस रात घर लौटते समय… - [परफेक्ट प्रेमी का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ab%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): “अगर यह कहानी आपको चुभे…तो शायद यह आपके लिए है।” “शायद मैं ही गलत थी”—यह वाक्य सबसे ख़तरनाक है।क्योंकि यह तब बोला जाता है जब कोई आपको इतना तोड़ चुका होता है कि आप अपनी गलती ढूँढने लगते हो।यह कहानी उस औरत की है जिसने एक नार्सिसिस्ट से प्यार किया।और आज भी सोचती है—”शायद किस्मत ही ख़राब थी।” हर इंसान के भीतर एक छोटा-सा नार्सिसिस्ट बैठा होता है।कुछ उसे छिपाते हैं। कुछ उसे पालते हैं। कुछ उसे इतनी खूबसूरती से सजाते हैं कि वह दानव नहीं,देवता लगने लगता है।और मैं—मैं उन लोगों में से हूँ जिन्होंने अपने भीतर के उस नार्सिसिस्ट… - [अब क्या का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be-2/): जिस रात मुझे वह मिला जो मैं चाहता था—उस रात मैं बहुत देर तक छत की सफ़ेद दीवार देखता रहा।कोई उत्सव नहीं था भीतर। कोई ढोल नहीं बज रहा था। बस एक अजीब सी ख़ामोशी थी—वैसी ख़ामोशी जो तब होती है जब घड़ी की टिक-टिक अचानक बंद हो जाए और आपको पहली बार एहसास हो कि वह आवाज़ कितनी ज़रूरी थी।मैंने सोचा था—मिलेगा तो रोऊँगा।नहीं रोया।मैंने सोचा था—मिलेगा तो हँसूँगा।नहीं हँसा।बस लेटा रहा। और छत देखता रहा। बरसों पहले की बात है।एक सपना था। एक पद। एक पहचान। एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचकर लगे—हाँ,अब मैं वह हूँ जो होना चाहता था।उस… - [चुप्पी का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be-2/): “वह समंदर जो कभी नहीं आया” शाम ढल रही थी।छत पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी—लेकिन मैंने उसे पिया नहीं। बस पकड़े रहा। जैसे कप में चाय नहीं कोई पुरानी बात थी जिसे छोड़ना मुनासिब नहीं लग रहा था।नीचे गली में ज़िंदगी चल रही थी। ठेलेवाला आलू बेच रहा था, एक बच्चा साइकिल पर लड़खड़ा रहा था, किसी खिड़की से रोटी की महक आ रही थी। सब कुछ वैसा ही था—जैसा कल था, जैसा परसों था, जैसा शायद कल भी रहेगा।मैं यह सब देख रहा था।पर मैं और कहीं और भी था। दफ़्तर में आज किसी ने टोका—”यार, आजकल कहाँ… - [सामान्यता का मुखौटा, जहां दीवारें भूलती नहीं](https://ravikantraut.in/1210-2/): “सामान्यता का मुखोटा-जहां दीवारें याद रखती हैं” मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ, लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है। यह छोटा कमरा है — एक खिड़की जो हमेशा आधी खुली रहती है, एक मेज़ जिसके तीन पैर बराबर हैं और चौथा थोड़ा छोटा, एक कुर्सी जो मेरे दादा की थी, और एक बिस्तर जो रात को बिस्तर है, दिन में सोफा, और कभी-कभी एक गवाह।जब मैं पहली बार आया था, तो मकान मालकिन ने — एक बूढ़ी औरत जिसकी आँखें हरी थीं और जो हमेशा सूखे गुलाब की खुशबू से भरी रहती… - [संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9a/): संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा बसंती देवी के हाथों में अब वह ताकत नहीं रही जो कभी पांच किलो आटे को सानते वक्त दिखती थी। पर आज उन्होंने फिर भी चूल्हा जलाया। गैस वाला नहीं,लकड़ी वाला। आँगन के कोने में जो मिट्टी का चूल्हा था, जिसे बहुओं ने कई बार “गंदा और धुएँदार” कहा था, उसे उन्होंने गीली-मिट्टी से भीगे कपड़े से पोंछा, सूखी लकड़ियाँ जमाईं और दियासलाई की एक तीली से आग लगाई।धुआँ उठा। आँखों में चुभा। उन्होंने पोंछा नहीं।आज बड़का बेटा रमेश आने वाला था। नोएडा से। छोटका सुरेश भी,पुणे से। और मँझला दीपक… दीपक का पता नहीं। उसने… - [मिथक के बाद मनुष्य](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af/): मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं।   मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता है, भाग्य भरोसे भावनाएँ, शब्दों में सत्य मरता है, और विचारशील मनुष्य को तो, प्रश्न करने का अधिकार नहीं।   चालाकियाँ करके विचार, आगे ही बढ़ते जाते हैं, और सरल मनुष्य बेचारा, अपने अर्थ को तरस जाता है, खोज रहा बस अस्तित्व को अपने, टूट रहे उसके सपने, पूछ रहा समय से अपने — क्या मेरे जीवन का कोई अभिप्राय नहीं।   लोकतंत्र अब अभिनय है, जहाँ शक्ति गिरवी रखी गई, तालियों के शोर तले,… - [टूटते परिवार, बिखरता समाज](https://ravikantraut.in/%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/): एक समय था जब घर सिर्फ एक पता नहीं होता था। वह एक साँस होता था,साझा, उलझी हुई, एक,दूसरे में गुँथी हुई साँस। दादा की खाँसी, चूल्हे की धीमी आँच, बच्चों की वह हँसी जो आधी रात में भी किसी को नहीं डराती थी,ये सब मिलकर एक ऐसी भाषा बनाते थे जिसे कोई शब्दकोश नहीं समझा सकता। वह भाषा अब धीरे,धीरे खामोश हो रही है। परिवार टूटते नहीं अचानक। जैसे किसी पुरानी इमारत की नींव में दरारें पड़ती हैं,पहले अदृश्य, फिर महीन,सी, फिर इतनी गहरी कि दीवारें खुद ही झुकने लगती हैं,वैसे ही रिश्ते भी टूटते हैं। एक दिन आप पाते… - [आदमी जो हमेशा सही था](https://ravikantraut.in/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a5%e0%a4%be-2/): मेरे एक परिचित आशुतोष  को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे। हर बहस में। हर बैठक में। हर WhatsApp ग्रुप में। उनका प्रिय वाक्य था — “मैंने तो पहले ही कह दिया था।” मुझ जैसे कईयों के  पास एक मुखौटा होता है जिसे मैं “सर्वज्ञ का मुखौटा” कहता हूँ। यह बहुत चमकदार मुखौटा है। सोने जैसा। इस पर लिखा है — “मैं जानता हूँ।” जब भी कोई इसे  पहनता है , तो उसे  लगता है कि वो  हर सवाल का जवाब जानता है । मेरे पास भी ऐसा ही एक मुखौटा… - [इंतज़ार का रंग](https://ravikantraut.in/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97/): वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही दुकान जहाँ अनाया पहली बार आई थी,सफेद सूती कुर्ते में, माथे पर हल्की-सी बिंदी, और आँखों में वह ठहराव जो किसी जल्दबाज़ दुनिया से नहीं आता आरव ने उसे उसी क्षण देख लिया था, लेकिन प्रेम उस क्षण नहीं हुआ। प्रेम तब हुआ जब वह चली गई,और उसके बाद भी आरव उसे देखता रहा। हर शाम वह दुकान पर बैठा रहता, किताबों के बहाने, चाय के बहाने, गंगा के बहते पानी के बहाने,असल में अनाया के लौट आने के बहाने। वह… - [क़ॉफ्का का कॉकरोच का HR को लिखा मेल](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a4%bc%e0%a5%89%e0%a4%ab%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9a-%e0%a4%95%e0%a4%be-hr-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a4%bf/): फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़ है. सुबह के छः बजे थे। ग्रेगर सामसा की आँख खुली। कुछ गड़बड़ था। पहले उसने सोचा — शायद करवट लेने में तकलीफ हो रही है। फिर देखा — छः पैर हैं। एंटीना है। पीठ पर कड़ा खोल है। “ओह,” उसने सोचा। “मैं cockroach हो गया।” एक पल रुका। “Office का क्या होगा?” ________________________________________ यही फर्क है Gregor Samsa और बाकी लोगों में। आम आदमी cockroach बनता तो पहले चिल्लाता। फिर रोता। फिर दार्शनिक हो… - [मेरा शहर](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0/):       यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता है हवा गुजरती है जब भी यहां से, ये हरी हरी घास उसकी भाषा बन जाती है, और धरती जैसे बिना शब्दों के कुछ बहुत गहरा कह जाती है सुबह की धूप अटकती नहीं…यहां कंगूरों पर… वो उतरती है, धीरे-धीरे दीवारों से हो कर कमरे के भीतर तक यूं धूप तो साधारण ही है यहां की, पर वही…… मेरी रोज की “गुरु” बन जाती है। पेड़ खड़े हैं स्थिर यहां , पर समय के साथ… - [मैं नारसिस्ट हूँ : मुझसे बचकर रहना](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a/): मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप  तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन  खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को मुझसे बचा कर रखना                                                                                        मैं तुम्हें चाह तो सकता हूँ, पर अपनी फ़ितरत से तुम्हें बचा नहीं सकता मैं तुम्हें इतना चाहूँगा  कि तुम डर जाओ।इतनी तारीफ करूंगा , कि तुम्हें अपनी हैसियत भूलने लगो ।तुम इसे   Love… - [शून्य : एक अवधारणा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%b5%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a4%be/): शून्य इसे किस रुप में देखा जाये- “निरंकता” के रूप में  अथवा “अनंतता” के रूप में ? आज सुबह-सुबह ही , अपने व्हाट्स-एप्प  पर शून्य पर दो पोस्ट पढ़ कर मैं भी प्रेरित हुआ लगा मैं भी कुछ कहूं . एक तरफ ये कहा गया कि शून्य की अपनी कोई कीमत नहीं पर जब वो किसी से जुड़्ता है तो एक मूल्य निर्मित होता है, दूसरी तरफ कहा गया कि जिसकी कोई कीमत ही नहीं वो कैसे किसी को मायने दे सकता है ? शून्य को नापने के मैं दो पैमाने आपको देता हूं ,सबसे पहला प्रश्न तो यह है कि आप नापना… - [थकावट का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।हर बातचीत में मुझसे समाधान माँगा गया।मैंने दिया भी — मुस्कान के साथ, स्पष्ट आवाज़ में, बिना झिझक।लेकिन शाम तक आते-आते एक हल्की दरार महसूस हुई।थकान शरीर में नहीं थी।वह भूमिका में थी।कभी-कभी नायक होना भी एक आदत बन जाती है।हर जगह जवाब देना।हर स्थिति में स्थिर दिखना।हर संकट में संयमित रहना।धीरे-धीरे लोग यह मान लेते हैं कि आप टूटते नहीं।और आप भी।आज दोपहर एक क्षण ऐसा आया जब मैं अकेला था।कमरे में कोई नहीं।खिड़की से हल्की रोशनी… - [अधूरेपन का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): मेरे पास एक मुखौटा है। इसका कोई नाम नहीं है। या शायद है, पर मुझे याद नहीं। यह मुखौटा तब पहनता हूँ जब मुझे कुछ ख़त्म करना होता है — कोई काम, कोई किताब, कोई रिश्ता, कोई वादा। लेकिन ख़त्म करना आसान नहीं होता। क्योंकि ख़त्म करने का मतलब है — मान लेना कि यह पूरा नहीं हो सकता। पिछले तीन महीने से मैं एक चीज़ पर काम कर रहा हूँ। यह बड़ी नहीं है, लेकिन छोटी भी नहीं। जब शुरू किया था, तो लगा था — एक हफ़्ते में हो जाएगी। फिर एक हफ़्ता दो हफ़्ते हो गया। फिर एक… - [सफ़री का रसायन](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8/): मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे हैं, हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है। कुछ मुखौटे मुझे दुनिया से बचाते हैं और कुछ मुझे दुनिया के भीतर ले जाते हैं। जब मैं सफ़र में होता हूँ, मैं एक अलग ही मुखौटा पहन लेता हूँ। आज मैंने जो मुखौटा पहना है, उसका नाम है सफ़री का रसायन। मैं उस शहर में पहली बार आया था। नाम ज़रूरी नहीं है। हर शहर की एक आत्मा होती है, नाम तो बस नक्शे के लिए होता है। स्टेशन से बाहर निकला… - [अनुवाद का मुखौटा](https://ravikantraut.in/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a4%be/): माँ ने फोन पर पूछा, “तुम खाना खा लिए? मैंने कहा, “हाँ।” उन्होंने कहा, “अच्छा। सो जाओ फिर।” मैंने कहा, “हाँ।” और यह बातचीत ख़त्म हो गई। जैसे हर बार होती है। लेकिन जो बातें हमने नहीं कहीं, वे इतनी थीं कि अगर उन्हें लिख दिया जाए तो एक पूरी किताब बन जाए। माँ ने यह नहीं कहा, “मुझे तुम्हारी याद आती है।” मैंने भी यह नहीं कहा, “मुझे भी।” माँ ने यह नहीं पूछा, “क्या तुम अकेला तो महसूस नहीं करते ?” “हमेशा।”-मैंने कहना चाहता था पर नहीं कहा, मेरे पास एक मुखौटा है जिसे मैं “अनुवाद का मुखौटा” कहता हूँ।… ## Pages - [Contact (Theme)](https://ravikantraut.in/contact-theme/): This is a theme template page created by Superb Addons. 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If the blocks you want to edit can't be found in the page content, please edit the front page template. - [ऑडियो](https://ravikantraut.in/%e0%a4%91%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b/) - [दरारों मे स्त्री](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80/) - [होम](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%ae/): हिंदी साहित्य · जबलपुर शब्दों से बुनी दुनिया में आपका स्वागत है जहाँ हर कहानी एक सफ़र है, हर किरदार एक सच्चाई — और हर पंक्ति आपके दिल को छू जाती है। कहानियाँ पढ़ें → लेखक से मिलें २०+ एपिसोड ५ विधाएँ २०२५ से लेखन “ एक अच्छी कहानी वो नहीं जो आप पढ़ते हैं, बल्कि वो है जो आपके भीतर जीती है। रविकान्त राऊत ✦ ताज़ा रचना मेरे हज़ार मुखौटे — नवीनतम एपिसोड हर इंसान के भीतर हज़ार चेहरे होते हैं — कुछ वो जो दुनिया देखती है, कुछ वो जो सिर्फ वो खुद जानता है। यह शृंखला उन्हीं मुखौटों… - [मेरा ब्लॉग](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97/) - [मेरी किताबें](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%82/) - [कवितायें](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82/) - [आलेख](https://ravikantraut.in/%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/) - [मेरे हज़ार मुखौटे](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96%e0%a5%8c%e0%a4%9f%e0%a5%87/) - [मेरे बारे में](https://ravikantraut.in/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/): यहाँ हर कहानी एक सफ़र है — और हर सफ़र में एक सच। रविकांत राऊत — एक परिचय मैं रविकांत राऊत हूँ। लेखक। कवि। और एक ऐसा इंसान जो दूसरे इंसानों को बहुत ध्यान से पढ़ता है। मेरे लिए लिखना कोई शौक नहीं — यह सांस लेने जैसा है। जब नहीं लिखता, तो कुछ अधूरा रहता है। मैं जबलपुर से हूँ — मध्यप्रदेश का वह शहर जहाँ नर्मदा बहती है और शब्द हवा में तैरते हैं। इस शहर ने मुझे संवेदनशीलता दी। ज़िंदगी ने बाकी सब। मेरा लेखन मैं उन चीज़ों के बारे में लिखता हूँ जो हम जीते हैं —… - [व्यंग्य](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af/) - [दीर्घ कथायें](https://ravikantraut.in/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%98-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82/) - [लघु कथायें](https://ravikantraut.in/%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82/) - [कहानियां](https://ravikantraut.in/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82/) ## Optional - [Agent (MCP protocol)](websites-agents.hostinger.com/ravikantraut.in/mcp) [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)