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तेल, टैरिफ और तटस्थता की असली परीक्षा

एक अमीर दोस्त का सबसे बड़ा हथियार क्या होता है? यह धमकी नहीं कि वह रिश्ता तोड़ देगा, बल्कि यह याद दिलाना कि रिश्ता उसकी मर्ज़ी पर टिका है। इस हफ़्ते अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने ठीक यही किया। “लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026” नाम का एक विधेयक 262-159 वोटों से पास हुआ — सीनेट में यह पहले ही अगस्त में 86-11 के भारी बहुमत से पार हो चुका था। इस कानून का सार सीधा है: जो भी देश रूस से तेल खरीदेगा, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उस पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। सूची में भारत का नाम सबसे ऊपर है। अब गेंद ट्रंप के पाले में है, और भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था — तीनों एक साथ दांव पर हैं।

यह कोई अचानक आई आफ़त नहीं है। पिछले साल भी ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ — 25 प्रतिशत “रेसिप्रोकल” और 25 प्रतिशत सीधे रूसी तेल खरीद के लिए दंड स्वरूप — लगाया था। तब भारत को जो सीमित छूट मिली थी, वह 17 जून 2026 को खत्म हो गई। यानी यह नया बिल किसी पुरानी लड़ाई की अगली कड़ी भर है, बस इस बार दांव और ऊंचे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रूस से करीब 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, और जून 2026 तक भारत के कुल क्रूड आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 48.6 प्रतिशत तक पहुंच गई थी — यानी हर दूसरा बैरल तेल रूस से आ रहा है। इसी आंकड़े पर अमेरिकी कांग्रेस को ऐतराज़ है।

असली सवाल टैरिफ के प्रतिशत का नहीं है। असली सवाल यह है: जब दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियां व्यापार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगें, तो एक उभरती हुई, महत्वाकांक्षी, मगर अब भी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” कितनी देर तक बचा सकती है? क्या आज़ादी से फ़ैसला लेने का अधिकार अब भी उतना ही असली है जितना विदेश मंत्रालय के बयानों में सुनाई देता है, या वह सिर्फ एक ऐसा नारा बनता जा रहा है जिसकी कीमत हर साल बढ़ती जाती है?

यह सवाल भारत के लिए नया नहीं, बल्कि उसकी नींव जितना पुराना है। आज़ादी के फ़ौरन बाद, शीत युद्ध के दो ध्रुवों के बीच, नेहरू ने जिस गुटनिरपेक्षता की बुनियाद रखी थी, वह किसी आदर्शवाद से ज़्यादा एक व्यावहारिक ज़रूरत थी — एक ग़रीब, अभी-अभी आज़ाद हुए देश के पास इतनी ताक़त नहीं थी कि वह किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनकर अपनी शर्तें मनवा सके, इसलिए उसने दोनों खेमों से बराबर दूरी बनाकर अपनी गुंजाइश बचाई। सत्तर साल बाद, नाम बदल गया है — अब इसे “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” कहा जाता है — लेकिन तर्क वही है। भारत अमेरिका से रक्षा उपकरण, तकनीक और निवेश चाहता है; रूस से सस्ता तेल, हथियारों के पुराने पुर्ज़े और एक भरोसेमंद, दशकों पुराना रिश्ता चाहता है; और चीन के मुक़ाबले दोनों के साथ संतुलन बनाए रखना चाहता है। यह कोई दुविधा नहीं, बल्कि एक सायास रणनीति रही है।

लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि यह संतुलन अब पहले जैसा आसान नहीं रहा। युद्ध शुरू होने से पहले भारत रूस से मुश्किल से एक-दो प्रतिशत कच्चा तेल खरीदता था। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल का बहिष्कार किया, तो रूस को भारी छूट पर खरीदार चाहिए थे, और भारत को सस्ता तेल — दोनों की ज़रूरतें मिल गईं, और यह आंकड़ा 48 प्रतिशत तक जा पहुंचा। इसी छूट ने बीते तीन-चार वर्षों में भारत को अरबों डॉलर की बचत दी, महंगाई को काबू में रखने में मदद की, आम आदमी के पेट्रोल-डीज़ल के बिल को नियंत्रण में रखा। यानी यह सिर्फ कूटनीति का मसला नहीं, हर भारतीय की जेब से सीधे जुड़ा मसला है। अगर टैरिफ लगता है, तो चोट सिर्फ रिफाइनरी कंपनियों या निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगी — वह घूमकर आम उपभोक्ता तक पहुंचेगी, चाहे वह पेट्रोल पंप पर हो या टेक्सटाइल और फार्मा जैसे निर्यात-निर्भर उद्योगों में नौकरियों के रूप में हो।

यहीं यह मामला उतना सीधा नहीं रह जाता जितना सुर्खियां बताती हैं। यह “भारत बनाम अमेरिका” जैसा दो-रंगी चित्र नहीं है। भारत अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार नहीं तो कम से कम टॉप पांच में है; अमेरिका में बसे तीन-सवा तीन करोड़ भारतवंशी, आईटी सेवाओं का अरबों डॉलर का व्यापार, रक्षा सौदे, क्वाड जैसे मंच — ये सारे धागे इतने उलझे हुए हैं कि कोई एक झटके में इस रिश्ते को तोड़ नहीं सकता। दूसरी तरफ़ रूस के साथ पुराना भरोसा है, S-400 जैसी रक्षा प्रणालियां हैं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो के समीकरण हैं। भारत किसी एक को छोड़कर दूसरे को गले नहीं लगा सकता — दोनों उसकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों को थामे हुए हैं। और अमेरिका के भीतर भी एक स्वर नहीं है — कई थिंक-टैंक और यहां तक कि खुद प्रशासन के भीतर के लोग मानते हैं कि भारत को चीन के मुक़ाबले एक स्वाभाविक साझेदार के तौर पर साधे रखना, उसे दंडित करने से कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद है।

इसका एक ईमानदार प्रति-तर्क भी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना ग़लत होगा। जो लोग इस टैरिफ बिल का समर्थन करते हैं, उनका तर्क सिर्फ मनमानी दादागिरी नहीं है। वे कहते हैं कि रूस अपनी तेल-कमाई से यूक्रेन पर हमले जारी रखे हुए है, और जो भी देश उस कमाई को बढ़ाने में मदद करता है, वह परोक्ष रूप से उस युद्ध को लंबा खींच रहा है। इस नज़रिए से भारत की “ऊर्जा सुरक्षा” की दलील, अमेरिका या यूरोप की निगाह में, एक नैतिक चुप्पी जैसी दिखती है। यह तर्क कमज़ोर नहीं है — बस भारत के लिए यह उतना आसान नहीं है जितना दूर बैठकर लगता है, क्योंकि यहां सवाल सिद्धांत का नहीं, 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा ज़रूरतों का है, और कोई भी ज़िम्मेदार सरकार अपने नागरिकों की कीमत पर किसी और के युद्ध की नैतिक गणित नहीं साध सकती।

फिर भी, अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो असल कमज़ोरी भारत की नीयत में नहीं, उसकी संरचनात्मक निर्भरता में है। भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। जब तक यह आंकड़ा इतना ऊंचा रहेगा, तब तक “स्वायत्तता” की हर घोषणा किसी न किसी बाहरी शक्ति की सहूलियत पर निर्भर बनी रहेगी — चाहे वह रूस की छूट हो या अमेरिका की नाराज़गी। जयशंकर जब कहते हैं कि भारत “स्वतंत्र सोच वाला” फैसला लेगा, तो यह इरादे की दृष्टि से बिल्कुल सही है, लेकिन इरादा तभी टिकता है जब उसके पीछे विकल्प भी हों — वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत, घरेलू उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा में गंभीर निवेश। पिछले दशक में सौर ऊर्जा और गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता में भारत की प्रगति सराहनीय ज़रूर रही है, पर तेल पर निर्भरता लगभग जस की तस बनी हुई है। जब तक यह नहीं बदलता, हर पांच साल में कोई न कोई महाशक्ति इसी तेल की नली को पकड़कर भारत की विदेश नीति हिलाने की कोशिश करती रहेगी। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बेचैन करने वाला सबक है — स्वायत्तता सिर्फ बयानों से नहीं, बुनियादी ढांचे से हासिल होती है।

आगे का रास्ता आसान नहीं दिखता। अगर ट्रंप इस बिल पर दस्तखत करते हैं, तो भारत के पास मोटे तौर पर तीन विकल्प बचेंगे — रूसी तेल की खरीद घटाकर अमेरिका को कुछ राहत देना और बदले में टैरिफ में छूट मांगना; डटे रहना और अल्पकालिक आर्थिक चोट सहते हुए खाड़ी और अन्य स्रोतों से तेल विविधीकरण तेज़ करना; या दोनों के बीच का एक मझला रास्ता, जो भारत की कूटनीति का पुराना और आज़माया हुआ ढंग रहा है। तीनों रास्तों की अपनी कीमत है, और कोई भी सरकार — चाहे किसी भी दल की हो — बिना घरेलू राजनीतिक शोर के इनमें से कोई फैसला नहीं ले पाएगी। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें, निर्यातकों की नौकरियां, और अमेरिका से रिश्तों का भविष्य — तीनों अगले कुछ महीनों में एक साथ परीक्षा में होंगे।

लेकिन इस पूरी बहस से एक बात साफ़ होती है, जो सिर्फ इस एक बिल या इस एक तेल सौदे से बड़ी है। दुनिया अब उस दौर में लौट रही है जहां व्यापार, तकनीक और मुद्रा — सब कुछ ताक़त के औज़ार बन चुके हैं, और “मुक्त बाज़ार” का पुराना वादा असल में बड़ी शक्तियों की मर्ज़ी पर टिका निकला। भारत जैसे देश के लिए सवाल अब यह नहीं रहा कि वह किसका दोस्त बने — रूस का या अमेरिका का। असली सवाल यह है कि वह कितनी जल्दी खुद इतना सक्षम बने कि उसे यह चुनाव करना ही न पड़े। जिस दिन भारत की ऊर्जा, तकनीक और पूंजी की ज़रूरतें उसकी अपनी ज़मीन से पूरी होने लगेंगी, उस दिन कोई टैरिफ बिल उसकी नींद नहीं उड़ाएगा। तब तक, हर विदेशी संसद में पास होने वाला हर कानून, हर बार, भारत की तथाकथित आज़ादी की असली कीमत पूछता रहेगा।

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