सफ़री का रसायन
मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे […]
1000 दिन, 1000 कहानियाँ — हर दिन एक नया मुखौटा
मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे […]
माँ ने फोन पर पूछा, “तुम खाना खा लिए? मैंने कहा, “हाँ।” उन्होंने कहा, “अच्छा। सो जाओ फिर।” मैंने कहा, “हाँ।”
उस दिन मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था। ट्रेन पैंतीस मिनट लेट थी। बोर्ड पर लिखा था — “प्रतीक्षा
लंच के लिए हमने वही जगह चुनी जहाँ कभी हम अक्सर आया करते थे। पर अब यह जगह भी बदल
आज मैं बिना वजह मुस्कुरा रहा था। कोई बड़ी खुशी नहीं थी। कोई उपलब्धि नहीं। बस एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान
घर के बीचों-बीच खड़े होकर अचानक मुझे लगा — मैं कहीं जा नहीं रहा, मैं बस रुकने की जगह बदल
आज मैंने तय किया कि मैं कम बोलूँगा। यह कोई संकल्प नहीं था। कोई आध्यात्मिक प्रयोग भी नहीं। बस सुबह
आज पूरे दिन किसी ने मुझे नहीं देखा। मैं सड़क पर चला — लोग टकराए नहीं। दुकान में गया —