
मेरे भीतर कई कमरे हैं।
हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है।
जिंदगी जब भी मेरे सामने कोई नई चुनौती रखती है,मैं उनमें से एक मुखौटा उतार कर पहन लेता हूँ।
आज जो मुखौटा मैंने पहना है,उसका नाम है—निराशा का प्रहरी।
उस सुबह जब मैंने आईने में देखा,तो उसमें मुझे अपना चेहरा नहीं दिखा।बल्कि दिखी”निराशा”जो पहले से वहाँ खड़ी थी।
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे किसी सरकारी दफ़्तर का क्लर्क किसी पुराने आवेदन को देखता है—जिसे वह वर्षों से फ़ाइल में दबाकर बैठा हो।
फिर उसने कहा,
“अब तुम्हारी बारी है।”
मुझे ठीक से याद नहीं कि”निराशा”मेरे घर कब आई।
शायद वह हमेशा से यहीं थी।
दरवाज़े के पीछे,
जूतों के पास,
दीवार की छाया में।
मैंने उसे कभी बुलाया नहीं था।लेकिन कुछ चीज़ें होती हैं न,जिन्हें बुलाने की ज़रूरत नहीं होती।वो तो बस धीरे-धीरे घर का हिस्सा बन जाती हैं।
वैसे ही,जैसे हमारे पुराने मकानों में एक कमरा होता है जिसे कोई खोलता नहीं,पर घर का हर सदस्य जानता है कि वह वहाँ है।
उस सुबह मैं उठा,लेकिन चाय नहीं बनाई।
गैस थी।
दूध भी था।
चायपत्ती भी वहीं थी जहाँ हमेशा रहती है।
बस…कारण नहीं था।
और शायद उसी क्षण निराशा ने मेरी मेज़ पर एक काग़ज़ रख दिया।
काग़ज़ पर सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे—“अब आगे क्या?”
मैं देर तक उस काग़ज़ को देखता रहा।
उस पर कोई मुहर नहीं थी।किसी दफ़्तर का नाम नहीं था।
फिर भी उसमें अजीब-सी अधिकारिक और एक जानलेवा ठंडक थी—जैसे यह कोई नोटिस हो जिसे बहुत पहले लिखा गया हो और जिसे किसी ने सालों तक सिर्फ़ मेरे लिए संभालकर रखा हो।
मैंने सोचा—जवाब लिख दूँ।
पर जवाब देने के लिए क़लम चाहिए।
क़लम ढूँढने के लिए उठना पड़ेगा।
उठने के लिए कारण चाहिए होगा।
और कारण के लिए…फिर उसी काग़ज़ को पढ़ना पड़ेगा जिस पर लिखा था—
“अब आगे क्या?”
मैं उसी गोल-गोल चक्कर में फँसा रहा हूँ।
समय कमरे में फैलता चला गया।
शायद यही मनुष्य की सबसे पुरानी उलझनों में से एक है।
कहा जाता है कि जब हमारी प्रजाति पेड़ों से उतरकर मैदानों में आई,तब हमने दो चीज़ें साथ लाईं—
कल्पना और चिंता।
कल्पना ने हमें देवता दिए,
राष्ट्र दिए,
पैसा दिया,
भविष्य के सपने दिए।
लेकिन उसी कल्पना ने हमें एक सवाल भी दे दिया—
अब आगे क्या?
शायद हमारे दूर के चिम्पांज़ी रिश्तेदारों को यह सवाल कभी परेशान नहीं करता था।
वे भूख लगने पर खाते थे,
थकने पर सो जाते थे।
पर मनुष्य…
मनुष्य भविष्य के बारे में सोचता है।
और कभी-कभी वही भविष्य उसके सामने एक खाली काग़ज़ की तरह खड़ा हो जाता है।
तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर पड़ोस की बुज़ुर्ग महिला खड़ी थी।
अस्सी साल की होगी।
उसके दोनों बेटे वर्षों पहले शहर छोड़कर कहीं दूर बस गए थे।
उसके घुटनों ने जैसे कसम खा ली थी कि अब ज़्यादा सीढ़ियाँ नहीं उतरेंगे।
उसके हाथ में एक बाल्टी थी।
पुरानी एल्युमिनियम की।
किनारा थोड़ा टेढ़ा था।
उसने धीमे से कहा—
“बेटा…ज़रा ऊपर से पानी भर दोगे?आज नल बंद है।”
मैंने उसकी ओर देखा।
उसने मेरी ओर देखा।
एक पल के लिए लगा—हम दोनों की आँखों में वही काग़ज़ तैर रहा है।
“अब आगे क्या?”
लेकिन उसकी बाल्टी असली थी।
मैं धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ।
सिर्फ़ पानी भरने के लिए।
बस इतने-से कारण के लिए।
और जब मैंने वह एक क़दम उठाया—जो मैंने अपने लिए नहीं,उस बाल्टी के लिए उठाया था—तब कोई बड़ी चीज़ नहीं टूटी।
कोई चमत्कार नहीं हुआ।
बस…
उस बंद कमरे में,जहाँ निराशा रहती थी,एक बहुत महीन-सी दरार पड़ गई।
अंदर से उसकी आवाज़ आई—
“यह कोई जीत नहीं है।”
मैंने कहा,
“मुझे पता है।”
वह बोली—
“तुम फिर लौटोगे।”
मैंने कहा,
“मुझे ये भी पता है।”
“तो फिर गए क्यों?”
मैं कुछ पल चुप रहा।
मेरे हाथ में अभी भी वह बाल्टी थी।
हल्की।
थोड़ी टेढ़ी।
पर बिल्कुल असली।
मैंने धीरे से कहा—
“क्योंकि यह बाल्टी मेरी नहीं थी।
और शायद इसी वजह से…
यह मेरी ज़िम्मेदारी बन गई।”
निराशा चुप हो गई।
ऐसी चीज़ें कभी हमेशा के लिए नहीं जातीं।
वह बस अपने कमरे में लौट गई और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
मैं ऊपर गया।
पानी भरा।
सीढ़ियाँ उतरकर बाल्टी उसे दे दी।
उस बुढ़ी अम्मा ने मुस्कुराकर कहा—
“भगवान भला करे।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
लेकिन भीतर कहीं एक धीमी-सी आवाज़ उठी।
वह वही हिस्सा था जो निराशा के बाद भी बचा रह जाता है।
दुनिया की बड़ी-बड़ी किताबों में उसका ज़िक्र नहीं मिलता।
न किसी सरकारी फ़ाइल में,
न उन दार्शनिकों की डायरी में जिन्होंने मनुष्य की पीड़ा को समझने की कोशिश की।
वह हिस्सा न सिद्धांत लिखता है,
न भाषण देता है।
वह बस इतना करता है—
किसी की खाली बाल्टी देखता है और उसे भरने के लिए उठ खड़ा होता है।
निराशा शायद हमारी प्रजाति की सबसे पुरानी छाया है।
लेकिन जब तक किसी और की बाल्टी खाली है—
तब तक मनुष्य के पास पूरी तरह निराश होने की फ़ुर्सत नहीं होती।
—रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
