खुली नाराज़गी
वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे जिनसे दिल में दर्द उठता है गोता लगा निराशा के […]
वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे जिनसे दिल में दर्द उठता है गोता लगा निराशा के […]
यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला
मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को
कितने सालों के 365 दिन मैं जिसके लिये खिलती रही हर रात जिसके लिये महकती रही करीब रह कर भी