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कवितायें

तुम्हारे जाने के बाद

तुम चली गईं, तब भी कमरा कहां खाली  हुआ तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बैठी रही कुर्सी पर, और खिड़की के पास, तुम्हारी आवाज़ ठहरी रही। आज सुबह अधजागी…

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तुम्हारी किताब के और पन्ने पढ़ने की चाह

तुम्हें जान लेने के बाद भी मैं तुम्हें और पढ़ना चाहता हूँ। तुम्हारी हँसी देखने के बाद अब तुम्हारी खामोशी पढ़ना चाहता हूँ, तुम्हारी आँखों के…

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जब पहली बार ‘अ’ लिखा

  एक स्लेट थी, फटी हथेली जितनी छोटी, और मिट्टी सी सोंधी एक कलम, जिसे खड़िया कहते थे बड़े लोग मास्टर जी की उंगली मेरी मुट्ठी पर थी, और मेरी मुट्ठी में था डर , फिर एक लकीर बनी, टेढ़ी, हकलाती हुई, जैसे कोई बच्चा पहला कदम रखता है बिना यह जाने कि गिरना भी सीखने का हिस्सा है ‘अ’ बस एक अक्षर था, पर उस दिन लगा जैसे किसी ने मेरे नाम की पहली ईंट रख दी हो। घर लौटा तो आंगन की धूल में उसी अक्षर को फिर-फिर लिखता रहा, जैसे मैं अपने होने का सबूत गढ़ रहा होऊं बरसों बाद आज भी जब अपने नाम का हस्ताक्षर करता हूं, तो कभी-कभी वही टेढ़ी लकीर याद आ जाती है वह पहला ‘अ’, जो डर से नहीं, एक उम्मीद से लिखा गया था।…

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कुर्सी

जंगल में पड़ी लकड़ी… और घर में रखी कुर्सी — दोनों एक ही वृक्ष से जन्मी थीं, पर अर्थ ने उन्हें अलग कर दिया। उसके घर…

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मैं नारसिस्ट हूँ : मुझसे बचकर रहना

मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप  तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन  खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को मुझसे बचा कर रखना     …

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अनाम ख़त

अलमारी के हर ख़ाने पर करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं अब यादों को तलाशने में वक़्त ज़ाया नहीं होता आज एक ख़त अचानक निकल आया…

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