तुम्हारे जाने के बाद
September 29, 2026 · 1 मिनटतुम चली गईं, तब भी कमरा कहां खाली हुआ तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बैठी रही कुर्सी पर, और खिड़की के पास, तुम्हारी आवाज़ ठहरी रही। आज सुबह अधजागी…
पूरा पढ़ें →तुम चली गईं, तब भी कमरा कहां खाली हुआ तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी बैठी रही कुर्सी पर, और खिड़की के पास, तुम्हारी आवाज़ ठहरी रही। आज सुबह अधजागी…
पूरा पढ़ें →बरसों पुरानी वह उंगलियां, जो श्याम्पट्ट पर अ, आ लिखती थीं, सफेद धूल में सनी होती थी मास्टर जी की आवाज में कोई…
पूरा पढ़ें →तुम्हें जान लेने के बाद भी मैं तुम्हें और पढ़ना चाहता हूँ। तुम्हारी हँसी देखने के बाद अब तुम्हारी खामोशी पढ़ना चाहता हूँ, तुम्हारी आँखों के…
पूरा पढ़ें →एक स्लेट थी, फटी हथेली जितनी छोटी, और मिट्टी सी सोंधी एक कलम, जिसे खड़िया कहते थे बड़े लोग मास्टर जी की उंगली मेरी मुट्ठी पर थी, और मेरी मुट्ठी में था डर , फिर एक लकीर बनी, टेढ़ी, हकलाती हुई, जैसे कोई बच्चा पहला कदम रखता है बिना यह जाने कि गिरना भी सीखने का हिस्सा है ‘अ’ बस एक अक्षर था, पर उस दिन लगा जैसे किसी ने मेरे नाम की पहली ईंट रख दी हो। घर लौटा तो आंगन की धूल में उसी अक्षर को फिर-फिर लिखता रहा, जैसे मैं अपने होने का सबूत गढ़ रहा होऊं बरसों बाद आज भी जब अपने नाम का हस्ताक्षर करता हूं, तो कभी-कभी वही टेढ़ी लकीर याद आ जाती है वह पहला ‘अ’, जो डर से नहीं, एक उम्मीद से लिखा गया था।…
पूरा पढ़ें →जंगल में पड़ी लकड़ी… और घर में रखी कुर्सी — दोनों एक ही वृक्ष से जन्मी थीं, पर अर्थ ने उन्हें अलग कर दिया। उसके घर…
पूरा पढ़ें →वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे जिनसे दिल में दर्द उठता है गोता लगा निराशा के गहरे गर्त से मैंने उबारा था…
पूरा पढ़ें →यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता…
पूरा पढ़ें →मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को मुझसे बचा कर रखना …
पूरा पढ़ें →अलमारी के हर ख़ाने पर करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं अब यादों को तलाशने में वक़्त ज़ाया नहीं होता आज एक ख़त अचानक निकल आया…
पूरा पढ़ें →कितने सालों के 365 दिन मैं जिसके लिये खिलती रही हर रात जिसके लिये महकती रही करीब रह कर भी निष्ठुर बना रहा वो किसी कांटे…
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