धरती माँ, थोड़ा और एडजस्ट कर लो
सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार
सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार
फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा
उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने
हम भारतीय पुरुष की कमर हैं। हमें “हाय” कहना नहीं आता। सुबह सात बजे सिलेंडर ख़त्म हुआ। रमेश उठा, तीन मंज़िल