हरे झूठ का महोत्सव
September 21, 2026 · 1 मिनटदुनिया के सबसे बड़े झूठ हमेशा बहुत सुंदर रंगों में लिखे जाते हैं। कभी वे साम्राज्य कहलाते हैं। कभी विकास। कभी सभ्यता। और अब— वे “हरित…
पूरा पढ़ें →दुनिया के सबसे बड़े झूठ हमेशा बहुत सुंदर रंगों में लिखे जाते हैं। कभी वे साम्राज्य कहलाते हैं। कभी विकास। कभी सभ्यता। और अब— वे “हरित…
पूरा पढ़ें →मेहताजी ने पूरी ज़िंदगी एक ही सपना देखा — “रेटायरमेंट के बाद आराम करूँगा।” नौकरी में — “अभी थोड़ा और।” त्योहार में — “रिटायर होने दो,…
पूरा पढ़ें →बारह अगस्त आते ही सरकारी विज्ञापनों, भाषणों और…
पूरा पढ़ें →सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार गूँजती आवाज़, “आज पर्यावरण दिवस के…
पूरा पढ़ें →फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़…
पूरा पढ़ें →उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था। रात के…
पूरा पढ़ें →हम भारतीय पुरुष की कमर हैं। हमें “हाय” कहना नहीं आता। सुबह सात बजे सिलेंडर ख़त्म हुआ। रमेश उठा, तीन मंज़िल उतरा, सिलेंडर वाले से माथापच्ची की,…
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