सुमित्रा की नींद

उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था।
रात के ग्यारह बजे सुमित्रा सोई नहीं है, रसोई में है। कल के लिए आटा गूँध रही है, दाल भिगो रही है, बच्चे का टिफ़िन सोच रही है कल क्या दूँ जो खाए भी और फेंके भी नहीं। यह सवाल दुनिया की किसी परीक्षा में नहीं आता, पर सुमित्रा रोज़ हल करती है, बिना किसी मार्क की आशा के।
रात के बारह बजे पति महेश जी सो गए। नींद आते ही उन्होंने करवट ली, पूरी रजाई अपनी तरफ़ खींच ली। यह उन्होंने जान-बूझकर नहीं किया  ।

यह उनका स्वभाव है, जैसे सरकार का स्वभाव है बजट अपनी तरफ़ खींच लेना।

रात के दो बजे बच्चे को बुख़ार आया। सुमित्रा उठी, माथा छुआ, थर्मामीटर लगाया, पानी की पट्टी रखी, दवाई दी, पीठ थपथपाई। बच्चा सो गया। और महेश जी करवट बदलकर और गहरी नींद में चले गए।

सुबह पाँच बजे अलार्म बजा, सुमित्रा उठी। चाय, नाश्ता, टिफ़िन, बच्चे की यूनिफ़ार्म, महेश की शर्ट का बटन जो कल से टूटा था और यार देख लेना से आज तक अटका था। उसने बटन लगाया, शर्ट प्रेस की।
सुबह आठ बजे महेश जी उठे, स्ट्रैच किया। बोले, यार रात को नींद बहुत अच्छी आई, तू भी सो लिया करो इत्ती रात तक जागने की क्या ज़रूरत है। सुमित्रा ने चाय रखी, कुछ नहीं कहा।
नौ बजे महेश ऑफिस के लिये निकले, दरवाज़े पर रुके, मुड़े। बोले, और हाँ आज थोड़ा आराम करना, तू बहुत थकी लगती है। सुमित्रा मुस्कुरायी, दरवाज़ा बंद किया, झाड़ू उठाई।

दोपहर को पड़ोसन आई। बोली, भाभी आज कुछ थकी लग रही हो। सुमित्रा ने कहा, नहीं ठीक हूँ। पड़ोसन ने कहा, अरे हम औरतें खुद का ख़याल नहीं रखतीं यही तकलीफ़ है। सुमित्रा ने सोचा, ख़याल रखें कब, सुबह पाँच से रात बारह तक तो, ख़याल किसका रखें। पर बोली कुछ नहीं, चाय बनायी, पड़ोसन के लिए भी।
शाम को बच्चा स्कूल से आया। माँ भूख लगी, माँ होमवर्क, माँ पानी, माँ मेरी वो वाली पेन कहाँ है, माँ टीचर ने कहा कल प्रोजेक्ट लाना है। सुमित्रा ने प्रोजेक्ट बनाया, रात नौ बजे तक।
रात दस बजे महेश जी आए, थके हुए, सोफ़े पर बैठे। बोले, यार ऑफिस में बहुत स्ट्रैस है, पता नहीं कैसे करते हैं लोग इतना काम। सुमित्रा ने खाना लगाया। बोली, हाँ। सिर्फ़ हाँ।
रात ग्यारह बजे महेश सो गए, रजाई अपनी तरफ़, खर्राटा चालू। सुमित्रा बैठी रही रसोई में, कल के लिए दाल भिगोते हुए, आटा गूँधते हुए, टिफ़िन का सोचते हुए।
तभी टीवी पर कोई विज्ञापन आया। एक आदमी, थका हुआ, ऑफिस से लौटा। पत्नी ने उसे च्यवनप्राश दिया, वो मुस्कुराया जैसे उसे इसी एक बात से एनर्जी मिलती हो।
सुमित्रा ने टीवी बंद किया। सोचा, हमें कौन देगा, हम किससे माँगें, और माँगें भी तो किस वक़्त। फिर उसने सोचा, नहीं, माँगना नहीं है। बस एक बार कोई देखे, बस देखे, इतना ही काफ़ी है।
रात के बारह बजे सुमित्रा सोने गई, लेटी, आँखें बंद कीं। नींद जो पिछली रात भर से इंतज़ार कर रही थी आख़िरकार आई। और खुल गयी पाँच बजे अलार्म के बजने से पहले। वो पड़ी रही छत को घूरती।
पाँच बजे अलार्म बजा। सुमित्रा उठी।
कल भी यही होगा, परसों भी, और उसके बाद भी। बिना विज्ञापन के, बिना आयोडेक्स के, बिना किसी के हाय के।
पर एक बात, सुमित्रा ने कभी शिकायत नहीं की। इसलिए नहीं कि दर्द नहीं था। इसलिए कि उसे पता है, शिकायत करने के लिए भी वक़्त चाहिए। और वक़्त वो चीज़ है जो सुमित्रा के पास सबसे कम है।
बस एक चुप्पी है साथ जो इतनी भारी है कि अगर तौली जाए तो सारे सिलेंडर हल्के पड़ जाएँ।

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