गुरु दक्षिणा – जो हमने कभी चुकाई ही नहीं
पांच सितंबर की सुबह देश के हर स्कूल में एक जैसा दृश्य दोहराया जाता है, बच्चों के हाथों में फूल,
पांच सितंबर की सुबह देश के हर स्कूल में एक जैसा दृश्य दोहराया जाता है, बच्चों के हाथों में फूल,
सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार
दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल
आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते
एक वैश्विक दर्शन : जब दुनिया के महान मन अंधेरे में उतरे एक रात काफका ने अपनी डायरी में लिखा,
वो तमाम बातें रह रह कर याद आती हैं मुझे जिनसे दिल में दर्द उठता है गोता लगा निराशा के
मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक
माँ ने पूछा—“बेटा,सब ठीक है?” मैंने कहा—“हाँ माँ।” झूठ नहीं था।सच भी नहीं था। बस वो मुखौटा था—जो हम माँ-बाप
दुनिया अक्सर सच से ज़्यादा presentation पर भरोसा करती है।असली अपराधी डरावने नहीं,भरोसेमंद दिखते हैं और अक्सर वही होते हैं