
मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक गली में सुधीर और मालती का घर था। पक्की दीवारें,आँगन में तुलसी का चौरा,रसोई में हमेशा कुछ न कुछ पकने की महक। बाहर से देखने पर—एक सम्पूर्ण घर।
लेकिन भीतर?
भीतर कुछ और था।
सुधीर हर शाम दफ़्तर से लौटता। दरवाज़े पर चप्पल उतारता। मालती रसोई में होती। दोनों के बीच कुछ शब्द होते—“खाना कब होगा”,“बच्चों ने पढ़ा कि नहीं”,“बिजली का बिल आया क्या।” बस इतना।
न झगड़ा। न रोना। न कोई बड़ा उपद्रव।
बस एक चुप्पी—जो दीवारों में रच-बस गई थी।
सुधीर रात को खाने की थाली लेकर बैठता। मालती सामने बैठती। और सुधीर को लगता—जैसे कोई अजनबी सामने बैठा हो। वही चेहरा,वही आँखें—लेकिन भीतर से कुछ था जो उसे वहाँ रहने नहीं देता था। वह अकारण उठकर पानी लेने चला जाता। या अख़बार उठा लेता। या खाँसने का नाटक करके उठ जाता।
मालती देखती थी। कुछ नहीं कहती थी।
ऐसा नहीं था कि शुरू से यही था।
बारह साल पहले—जब ब्याह हुआ था—सुधीर घंटों मालती से बातें करता था। बरसात की रात को छत पर जाकर दोनों चाय पीते थे। मालती जब हँसती थी तो सुधीर को लगता था—यही सबसे बड़ी दौलत है।
फिर क्या हुआ?
कुछ नहीं हुआ—और यही सबसे बड़ी त्रासदी थी।
एक दिन सुधीर ने नौकरी में तरक्की की बात घर आकर बताई। मालती उस वक्त बच्चे को बुखार में देख रही थी। उसने सिर उठाया,कहा—“अच्छा।” और वापस बच्चे की तरफ़ मुड़ गई।
सुधीर के भीतर कुछ सिकुड़ गया। उसने सोचा—जाने दो।
फिर एक बार मालती ने अपनी माँ के घर जाने की बात कही। सुधीर ने कहा—“अभी नहीं,त्योहार के बाद।” मालती चुप हो गई। भीतर से कुछ बंद हो गया। उसने भी सोचा—जाने दो।
यही “जाने दो”—दोनों के भीतर इकट्ठा होता रहा। वर्षों तक। परत दर परत।
और फिर एक रात ऐसी आई।
दीपावली की रात थी। पूरा मोहल्ला जगमगा रहा था। बच्चे आँगन में पटाखे छोड़ रहे थे। मालती ने आँगन में दिये जलाए थे। तुलसी के चौरे के पास,दरवाज़े पर,खिड़की की मुंडेर पर।
सुधीर बाहर से लौटा। आँगन में मालती को दिये जलाते देखा।
और उस एक क्षण में—पता नहीं क्यों—उसने मालती का चेहरा ध्यान से देखा।
दीये की लौ में वह चेहरा काँप रहा था। माथे पर पसीने की एक बूँद थी। होंठ कुछ गुनगुना रहे थे—शायद कोई श्लोक। आँखों में वह एकाग्रता थी जो केवल तब आती है जब कोई किसी काम में पूरी तरह डूबा हो।
सुधीर वहीं रुक गया।
उसने कुछ कहा नहीं। कुछ पूछा नहीं।
बस देखता रहा।
बीस क्षण। तीस क्षण।
और उस देखने में—न कोई पुरानी शिकायत थी,न कोई हिसाब—अचानक उसे कुछ याद आया। यह वही मालती थी जो बरसात की रात छत पर चाय लेकर आती थी। यह वही थी।
भीतर कहीं कुछ पिघला।
बहुत धीरे। जैसे जाड़े की धूप में बर्फ पिघलती है।
मालती ने आँख उठाई। सुधीर को खड़े देखा।
“कब आए?” उसने पूछा।
“अभी।” सुधीर ने कहा।
एक पल रुककर उसने कहा—“एक दिया मुझे भी जलाने दो।”
मालती ने बिना कुछ कहे माचिस की डिबिया उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
सुधीर बैठ गया। एक दिया उठाया। काँपती बाती को थामा।
दोनों वहाँ बैठे रहे। आँगन में। मिट्टी के दियों के बीच।
कोई बड़ी बात नहीं हुई। कोई माफ़ी नहीं माँगी गई। कोई पुराना हिसाब नहीं खुला।
बस दो लोग—एक आँगन में—दिये जलाते हुए।
रिश्ते बड़े झगड़ों से नहीं टूटते।
वे उन हज़ार छोटे क्षणों से टूटते हैं जब हम सामने वाले को देखना बंद कर देते हैं।
और शायद वे उसी तरह जुड़ते भी हैं—
एक आँगन में,एक काँपती बाती को थामने से।
— रविकान्त राऊत
