नज़र-अंदाज़
October 12, 2026 · 9 मिनटशनिवार की शाम मेरे लिए चाय की शाम होती है। घर से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक छोटी-सी चाय की टपरी है। टीन की छत,…
पूरा पढ़ें →शनिवार की शाम मेरे लिए चाय की शाम होती है। घर से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक छोटी-सी चाय की टपरी है। टीन की छत,…
पूरा पढ़ें →दीपावली की जगमगाती रात, एक सुनार का तराज़ू और बीस बरस पुराना अपराधबोध — दीपावली की यह कहानी “विश्वगाथा” त्रैमासिक पत्रिका (गुजरात) के अक्टूबर–दिसंबर अंक में…
पूरा पढ़ें →आरव ने उस आदमी को ब्लॉक कर दिया। वह उसे जानता भी नहीं था। केवल इसलिए कि उसने उसकी बात से असहमति जताई थी। कुछ क्षण…
पूरा पढ़ें →उस दिन शुक्रवार था, आटाचक्की के पाट टाँकने का दिन। केसर बाई ने चक्की का पत्थर उतरवाकर बरामदे में लिटा दिया था। टाँकी से उसकी घिसी…
पूरा पढ़ें →गाँव का नाम था देवपुर—नदी के किनारे बसा, पीपल और नीम की छाया में साँस लेता हुआ एक साधारण-सा गाँव। देवपुर में एक पुराना मंदिर था,…
पूरा पढ़ें →उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था…
पूरा पढ़ें →पांच सितंबर की सुबह प्रिंसिपल साहब खुद स्टाफ रूम में मिठाई बांटने आए, वही प्रिंसिपल जो बाकी तीन सौ चौंसठ दिन शाला के अतिथि शिक्षकों को…
पूरा पढ़ें →दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल पर एक कमरा था , कमरे…
पूरा पढ़ें →आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते हैं। बहुत कम लोगों को याद…
पूरा पढ़ें →मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक गली में सुधीर और मालती का…
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