सातवी मंज़िल की खिडकी
दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल
दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहाँ ट्रैफिक की आवाज़ें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल
आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते
मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक
संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा बसंती देवी के हाथों में अब वह ताकत नहीं रही जो कभी पांच किलो आटे
वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही
मनोविज्ञान, भाषा और दर्शन का एक खूबसूरत संगम है। आइये इसे एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते
प्रेम—यह शब्द हमारे बीच कभी नहीं आया। इसे कहना ऐसा होता जैसे किसी बहुत नाजुक काँच पर हथौड़ा मार देना।