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कहानियां

आख़िरी दीया

दीपावली की जगमगाती रात, एक सुनार का तराज़ू और बीस बरस पुराना अपराधबोध — दीपावली की यह कहानी “विश्वगाथा” त्रैमासिक पत्रिका (गुजरात) के अक्टूबर–दिसंबर अंक में…

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प्यार को पलों में मत तौलिये

उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था…

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अतिथि शिक्षक : एक दिन सम्मान, बाकी दिन अपमान

पांच सितंबर की सुबह प्रिंसिपल साहब खुद स्टाफ रूम में मिठाई बांटने आए, वही प्रिंसिपल जो बाकी तीन सौ चौंसठ दिन शाला के अतिथि शिक्षकों को…

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मास्टर जी मेरा नाम कैसा दिखता है

आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते हैं। बहुत कम लोगों को याद…

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जलती हुई बाती

मध्यप्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में—जहाँ शाम को अज़ान और मंदिर की घंटी एक साथ सुनाई देती है—वहाँ की एक गली में सुधीर और मालती का…

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