वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही दुकान जहाँ अनाया पहली बार आई थी,सफेद सूती कुर्ते में, माथे पर हल्की-सी बिंदी, और आँखों में वह ठहराव जो किसी जल्दबाज़ दुनिया से नहीं आता आरव ने उसे उसी क्षण देख लिया था, लेकिन प्रेम उस क्षण नहीं हुआ। प्रेम तब हुआ जब वह चली गई,और उसके बाद भी आरव उसे देखता रहा।
हर शाम वह दुकान पर बैठा रहता, किताबों के बहाने, चाय के बहाने, गंगा के बहते पानी के बहाने,असल में अनाया के लौट आने के बहाने। वह जानता था,प्रेमी इंतज़ार करता नहीं, वह इंतज़ार से बना होता है। जब अनाया आती, वे बहुत कम बोलते। कुछ शब्द, कुछ मुस्कानें, किताबों के पन्नों के बीच दबे हुए मौन। और जब वह नहीं आती,आरव के पास शब्द बहुत होते, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। अनुपस्थिति उपस्थिति से अधिक तीखी होती थी ।
अनाया की हँसी की कल्पना, उसके बालों से आती धूप की गंध, उसका बिना छुए छू जाना,सब कुछ आरव के भीतर चलता रहता। वह हर चीज़ में अर्थ खोजता,उसके आने के समय में, न आने की वजह में, उसके संदेश के एक इमोजी में, एक अल्पविराम में।
एक दिन अनाया देर से आई। उसके साथ कोई और था,एक सहज, आत्मविश्वासी पुरुष। वह हँस रही थी। खुलकर।
आरव ने महसूस किया,दिल का कस जाना। ईर्ष्या कोई तीर नहीं थी जो बाहर से आई हो। वह भीतर से उठी थी।
“अगर वह किसी और के साथ खुश हो सकती है,” आरव ने सोचा, “तो मैं उसके लिए क्या हूँ?”
उसने कुछ नहीं कहा। मुस्कुराया। प्रेम में अधिकार माँगना अहंकार लगता है,यह वह जानता था। लेकिन उस रात वह सो नहीं पाया। कल्पना ने आग पकड़ ली थी। ईर्ष्या कल्पना का सबसे उन्मत्त खेल होती है,और वह खेल अब शुरू हो चुका था।
अगले दिन बारिश हुई। वाराणसी की बारिश,मिट्टी, पानी और धुएँ की मिली-जुली गंध। अनाया अकेली आई। वे दोनों दुकान के पीछे वाले छोटे कमरे में चले गए,जहाँ किताबें दीवारों से सटी थीं और एक पीली-सी रोशनी लटकती थी।
कुछ देर तक वे चुप रहे। फिर अनाया ने कहा, “तुम कल अजीब थे।”
आरव ने आँखें उठाईं। “मैं हमेशा ऐसा ही हूँ।”
अनाया मुस्कुराई। “नहीं। तुम इंतज़ार कर रहे थे।”
आरव हँसा नहीं। उसने बस कहा, “जब प्रिय पास हो, शब्द अनावश्यक होते हैं।”
अनाया ने एक कदम आगे बढ़ाया। बहुत छोटा कदम,लेकिन उस कमरे की हवा बदल गई। उसका हाथ आरव की उँगलियों को छू गया। बस छू गया।
स्पर्श वह जगह है जहाँ प्रेम अपनी सबसे कोमल आवाज़ में बोलता है।
आरव के भीतर कुछ टूट गया,या शायद जुड़ गया। उसने अनाया का हाथ थाम लिया। कोई जल्दबाज़ी नहीं। कोई दावा नहीं। बस स्वीकार।
“तुम डरते हो?” अनाया ने धीमे से पूछा।
“हाँ,” आरव ने कहा, “लेकिन मेरा डर प्रेम को नष्ट नहीं करता, उसे गहरा करता है।”
अनाया ने आँखें बंद कर लीं। उसकी साँसें आरव की साँसों से मिलने लगीं,कोई चुंबन नहीं, फिर भी देह संवाद में थी।
शब्द अर्थ बनाते हैं। स्पर्श सच बनाता है।
उनके बीच प्रेम बराबर नहीं था,आरव ज़्यादा जलता था, ज़्यादा इंतज़ार करता था। अनाया ज़्यादा स्वतंत्र थी, ज़्यादा जीवन में रमी हुई। लेकिन यही असमानता उस प्रेम को असली बना रही थी। उस रात कुछ भी “पूरी तरह” नहीं हुआ,और शायद यही सबसे सुंदर था।
क्योंकि प्रेम कभी पूरा नहीं होता। वह अधूरा रहता है,इंतज़ार में, ईर्ष्या में, कल्पना में, स्पर्श के अधूरे वाक्य में। और उसी अधूरेपन में
प्रेम साँस लेता है।
सुबह हुई। वाराणसी की वह गली, किताबों की दुकान, पीली रोशनी,सब वैसा ही था। बस आरव वहाँ नहीं था। अनाया ने सोचा,शायद देर हो गई होगी। शायद वह आज नहीं आएगा। प्रेमी अक्सर अनुपस्थित रहते हैं,यह कोई नई बात नहीं।
लेकिन दिन ढल गया। दुकान बंद रही।
दूसरा दिन भी।
तीसरे दिन अनाया ने हिम्मत करके दुकान के मकान-मालिक से पूछा।
वृद्ध आदमी ने उसकी ओर देखा,ऐसे जैसे वह पहले से जानता हो कि यह प्रश्न आएगा।
“आप… आरव को जानती थीं?”
अनाया ने सिर हिलाया।
वह आदमी कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “यह दुकान आरव की नहीं थी, बिटिया। वह तो बस यहाँ बैठता था।”
अनाया के भीतर कुछ ठंडा-सा उतर गया।
“तो… वह कहाँ है?”
वृद्ध ने गहरी साँस ली।
“तीन साल पहले…
पीछे वाले कमरे में, ,
आरव की मृत्यु हो गई थी।”
शब्द नहीं गिरे। वे टूटकर बिखर गए।
“दिल की बीमारी,” वृद्ध बोला, “डॉक्टरों ने कहा, वह बहुत ज़्यादा संवेदनशील था।”
अनाया पीछे के कमरे में चली गई। वही किताबें। वही दीवारें। वही जगह जहाँ उसका हाथ थामा गया था।
मेज़ के कोने पर एक पुरानी डायरी रखी थी, धूल में ढकी। उस पर लिखा था,
“अगर तुम यह पढ़ रही हो,
तो इसका मतलब है,
तुम आई थीं।”
अनाया के हाथ काँपने लगे। डायरी के पन्ने पलटे।
“प्रेमी इंतज़ार में नहीं मरता, इंतज़ार ही उसे जीवित रखता है।
मैंने हर शाम तुम्हें नहीं देखा, मैंने हर शाम तुम्हारा इंतज़ार किया।
अगर तुमने मेरा हाथ महसूस किया, तो समझना, कुछ प्रेम देह के बाद भी बोलते हैं।”
आख़िरी पन्ना,
“स्पर्श सच बनाता है। और सच यह है, प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, वह बस देह बदल लेता है।”
अनाया की आँखों से आँसू नहीं गिरे। वे थम गए।
उस शाम वह गंगा किनारे बैठी।
हवा चली।
सीढ़ियों पर पीपल के पत्ते हिले।
और पहली बार उसने महसूस किया,
इंतज़ार खत्म नहीं हुआ है। वह अब उसका भी स्वभाव बन चुका है।
क्योंकि कुछ प्रेम मिलने के लिए नहीं होते, वे इसलिए होते हैं ताकि जीवन भर किसी की अनुपस्थिति दिल के सबसे जीवित हिस्से में धड़कती रहे।
अनाया ने वह डायरी बंद कर दी।
लेकिन कहानी वहाँ खत्म नहीं हुई,
क्योंकि उसी क्षण उसने कुछ अजीब देखा। डायरी के पन्नों के किनारों पर सूक्ष्म-सा अंकन था, हर पन्ने पर एक अक्षर, इतना हल्का कि पहले कभी दिखा नहीं। उसने सारे अक्षर जोड़ दिए। एक वाक्य बना,
“तुम पहली नहीं हो।”
अनाया की साँस रुक गई। डायरी के पीछे एक जेब थी। उसमें पाँच पुराने पत्र थे, पाँच अलग-अलग हाथों की लिखावट, पाँच अलग-अलग शहरों के नाम। और हर पत्र में वही शब्द, वही प्रतीक्षा, वही प्रेम। केवल प्रिय का नाम अलग था।
अनाया समझने लगी,धीरे, बहुत धीरे, आरव कोई व्यक्ति नहीं था।
आरव एक भूमिका था।
एक ऐसा मन, जो इंतज़ार करना जानता था,
जो अनुपस्थिति में भी उपस्थिति रच सकता था।
हर शहर में एक ऐसा ही प्रेमी बैठता है,
किसी किताबों की दुकान में, किसी कैफ़े में, किसी स्टेशन के कोने में।
वह प्रेम करता है , पूरी सच्चाई से।
और जब प्रेम पूरी तरह जन्म ले लेता, तो वह व्यक्ति कहानी से हट जाता है ।
प्रेम जीवित रह जाता है ।
ऐसे ही डायरी के आख़िरी पन्ने पर
इस डायरी का आखरी पन्ना , जो अब भी खाली था,
वहाँ अपने आप एक नई लिखावट उभर रही थी। अनाया की लिखावट।
वह डर गई।
लेकिन उससे ज़्यादा उसे एक अजीब-सी शांति महसूस हुई।
अब वह समझ गई थी, प्रेम किसी व्यक्ति से नहीं बँधता। व्यक्ति प्रेम को वहन करता है, कुछ समय के लिए।
और फिर प्रेम किसी और को चुन लेता है।
अनाया ने डायरी बंद की। उसे वापस उसी मेज़ पर रख दिया। और बाहर निकल गई।
अगली शाम, उसी किताबों की दुकान में एक नया व्यक्ति बैठा था। वह इंतज़ार कर रहा था।
किसका?
यह अब किसी को नहीं पता।
(क्योंकि प्रेम कभी एक ही कहानी दो बार नहीं सुनाता।)
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रविकांत राऊत
जबलपुर (म.प्र)
