नदी, नाव और भाषा

मनोविज्ञान, भाषा और दर्शन का एक खूबसूरत संगम है। आइये इसे एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं।

वाराणसी के एक पुराने मोहल्ले में राजीव नाम का एक युवा दर्जी रहता था। पिता की छोटी सी दुकान थी—और उम्मीदें बड़ी। पर एक साल ऐसा आया कि बाजार बदल गया, ग्राहक घट गए, और उधारी बढ़ गई। एक शाम, दुकान का शटर गिराते हुए वह अपनी पत्नी से बोला, “सब खत्म हो गया। मेरी किस्मत फूटी है… मैं नाकाम हूँ।” शब्द भारी थे। इतने भारी कि उनका वजन उसके कंधों से नहीं, उसके दिल से उठ ही नहीं पा रहा था।

अगली सुबह वह घाट पर गया। वहाँ एक बूढ़ा कारीगर लकड़ी की जली-टूटी नाव को ठीक कर रहा था। राजीव ने उससे पूछा, “बाबा, ये नाव तो आधी सड़ चुकी है… आप इसे क्यों ठीक कर रहे हैं?” बूढ़ा मुस्कुराया, “नाव टूटी है बेटा… नदी तो नहीं टूटी।” राजीव चौंका। बूढ़े ने हथौड़ा नीचे रखा और बोला— “हालत और शब्द अलग होते हैं। नाव का टूटना घटना है। ‘सब खत्म हो गया’ कहना शब्द हैं। घटना ठीक हो सकती है। शब्दों को बस बदलना होता है।”

राजीव जैसे भीतर तक हिल गया। वह सोचने लगा— “मेरी दुकान मुश्किल में है—यह घटना है। पर ‘मैं नाकाम हूँ’? यह तो मैंने खुद को सुनाई हुई कहानी है!” उसने उसी दिन यह वाक्य खुद से कहकर देखा— “मेरी दुकान गिर रही है, पर मैं नहीं।” अचानक भीतर एक हल्कापन आया—जैसे धूप हमेशा थी, बस खिड़की आज खुली हो।

अगले महीनों में उसने नए डिज़ाइन, ऑनलाइन ऑर्डर, और कस्टम टेलरिंग शुरू की। दुकान उठी या नहीं—वह बाद की बात है। पहले उसका मन उठा। और जब मन उठता है, तो आदमी कोई भी नाव, किसी भी नदी में चलाने लग जाता है।

कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। राजीव आज भी घाट पर जाता है… नदी वही है, नावें बदलती रहती हैं, और वह अपने हर शिष्य से बस एक बात कहता है— * “घटनाएँ कभी उतना दुख नहीं देतीं, जितना हम उनके बारे में गढ़ी हुई भाषा दे देती है।”

जनरल सेमेंन्टिक (General Semantics) मनोविज्ञान, भाषा और दर्शन का एक खूबसूरत संगम है। इसका मूल संदेश है: घटना सिर्फ घटना होती है। लेकिन हमारा दिमाग उस घटना पर अर्थ, मूल्यांकन, भावनाएँ और शब्द लाद देता है। यही शब्द हमें तोड़ते या संभालते हैं।

इस कहानी को सुनने के लिये “क्लिक” करें –

रविकान्त राऊत

जबलपुर (मध्यप्रदेश)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रविकान्त राऊत

जबलपुर (मध्यप्रदेश)

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