सुमित्रा की नींद
April 8, 2026उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था। रात के…
पूरा पढ़ें →उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था। रात के…
पूरा पढ़ें →हम भारतीय पुरुष की कमर हैं। हमें “हाय” कहना नहीं आता। सुबह सात बजे सिलेंडर ख़त्म हुआ। रमेश उठा, तीन मंज़िल उतरा, सिलेंडर वाले से माथापच्ची की,…
पूरा पढ़ें →प्रेम—यह शब्द हमारे बीच कभी नहीं आया। इसे कहना ऐसा होता जैसे किसी बहुत नाजुक काँच पर हथौड़ा मार देना। सच तो यह था कि उसके…
पूरा पढ़ें →उस दिन मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था। ट्रेन पैंतीस मिनट लेट थी। बोर्ड पर लिखा था — “प्रतीक्षा करें।” जैसे यह कोई सूचना नहीं,…
पूरा पढ़ें →लंच के लिए हमने वही जगह चुनी जहाँ कभी हम अक्सर आया करते थे। पर अब यह जगह भी बदल चुकी थी — या शायद हम…
पूरा पढ़ें →आज मैं बिना वजह मुस्कुरा रहा था। कोई बड़ी खुशी नहीं थी। कोई उपलब्धि नहीं। बस एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान — जो होंठों से ज़्यादा भीतर…
पूरा पढ़ें →घर के बीचों-बीच खड़े होकर अचानक मुझे लगा — मैं कहीं जा नहीं रहा, मैं बस रुकने की जगह बदल रहा हूँ।एक पैर आगे था, दूसरा…
पूरा पढ़ें →आज मैंने तय किया कि मैं कम बोलूँगा। यह कोई संकल्प नहीं था। कोई आध्यात्मिक प्रयोग भी नहीं। बस सुबह उठते समय लगा कि शब्द आज…
पूरा पढ़ें →आज पूरे दिन किसी ने मुझे नहीं देखा। मैं सड़क पर चला — लोग टकराए नहीं। दुकान में गया — दुकानदार ने पूछा नहीं। ऑफिस पहुँचा…
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