लंच के लिए हमने वही जगह चुनी जहाँ कभी हम अक्सर आया करते थे। पर अब यह जगह भी बदल चुकी थी — या शायद हम बदल चुके थे। दीवारों का रंग वही था, लेकिन जो चीज़ें दीवारों के बीच घटती हैं, वे कभी वैसी नहीं रहतीं।
मैं पहले पहुँच गया था। उस कोने वाली मेज़ पर बैठा जहाँ खिड़की से धूप आती थी। मेरे हाथ मेनू कार्ड पर थे, लेकिन मैं पढ़ नहीं रहा था। सिर्फ पन्ने पलट रहा था — जैसे कुछ करने का बहाना चाहिए हो।
मैंने खुद से वादा किया था: *कोई उम्मीद मत रखो।*
पर उम्मीदें ऐसी होती हैं — उन्हें मना करने से वे और भी ज़िद्दी हो जाती हैं।
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वह आया तो मुझे एक अजीब घबराहट हुई।
पहचाना हुआ चेहरा — पर अनजान-सा लगा। जैसे किसी पुरानी किताब को बरसों बाद खोला हो और पन्ने तो वही हों, लेकिन शब्द अलग अर्थ देने लगे हों।
“हाय,” उसने कहा।
“हाय,” मैंने जवाब दिया।
दोनों की आवाज़ में वही सावधानी थी जो दो देशों के बीच सीमा पर होती है। कोई हमला नहीं, पर कोई विश्वास भी नहीं।
हमने ऑर्डर दिया। मैंने वही लिया जो हमेशा लेता था। उसने भी वही जो वो लेता था ।
यह एक अजीब सांत्वना थी — कुछ चीज़ें नहीं बदलीं। भले ही हम बदल गए हों।
पहले दस मिनट मौसम की बातें हुईं। फिर काम की। फिर कुछ देर तक बस चुप्पी रही।
चुप्पी — यह वह जगह होती है जहाँ असली बातचीत होती है। जहाँ शब्द नहीं पहुँचते, वहाँ सिर्फ भाव रह जाते हैं।
मैंने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में भी वही थकान थी जो शायद मेरी आँखों में होगी। हम दोनों एक-दूसरे को सज़ा देते-देते खुद को भी सज़ा दे चुके थे।
“तुम्हें याद है,” उसने अचानक कहा, “एक बार यहीं बैठकर तुमने कहा था कि तुम कभी किसी से नाराज़ नहीं रह सकते?”
मुझे याद आया।
हाँ, मैंने कहा था।
और फिर मैंने यह भी साबित कर दिया था कि मैं कितना गलत था।
“मुझे माफ़ी माँगनी चाहिए,” उसने कहा।
मैं रुक गया।
यह वाक्य मैंने कई बार अपने मन में सुना था — रात के अंधेरे में, नींद न आने पर, किसी पुरानी बातचीत के बीच। पर अब जब यह वाक्य असल में आया, तो मुझे नहीं पता था कि इसका जवाब क्या है।
“नहीं,” मैंने कहा। “मुझे भी।”
और यह सच था।
दोष का हिसाब लगाना एक खेल है जो हम तब खेलते हैं जब हमें लगता है कि जीतने से कुछ मिल जाएगा। पर सच यह है — इस खेल में कोई नहीं जीतता।
हमने खाना खाया।
धीरे-धीरे बातचीत में वज़न कम होने लगा। वह हँसा एक बार। मैं भी मुस्कुराया।
यह कोई चमत्कार नहीं था। कोई फिल्मी पल नहीं था। बस दो लोग थे जो समझ रहे थे कि गुस्सा रखना और माफ़ करना — दोनों में से माफ़ करना कम थकाऊ है।
जब हम बाहर निकले, तो धूप तेज़ थी।
“अगली बार फिर मिलेंगे?” उसने पूछा।
“हाँ,” मैंने कहा। “अगली बार।”
और यह झूठ नहीं था। यह उम्मीद थी।
उस रात मैंने अपने मुखौटों की अलमारी खोली।
“क्षमा का मुखौटा” — यह अजीब मुखौटा है। यह हल्का नहीं होता, जैसा लोग समझते हैं। यह भारी होता है। इसे पहनने के लिए ताक़त चाहिए।
लेकिन इसे पहनने के बाद जो होता है, वह और भी अजीब है — आप खुद से हल्के हो जाते हैं।
मैंने सोचा — शायद माफ़ी माँगना और माफ़ करना दोनों एक ही चीज़ के दो पहलू हैं।
यह मानना कि हम महज़ इंसान हैं।
कि हम गलतियाँ करते हैं।
कि हम एक-दूसरे को चोट पहुँचाते हैं — जानबूझकर नहीं, बल्कि इसलिए कि हम अपने ही दर्द में इतने उलझे होते हैं कि दूसरे का दर्द दिखता नहीं।
अगली सुबह मैंने उसे मैसेज किया:
*”कल का शुक्रिया।”*
उसने लिखा: *”तुम्हें भी ।”*
बस इतना।
लेकिन कभी-कभी इतना ही काफ़ी होता है।
कल शायद एक नया मुखौटा हो। एक नई कहानी। लेकिन आज — आज सिर्फ यह एहसास है, कि
माफ़ करना दरवाज़ा खोलना नहीं है, बल्कि यह सीखना है कि दरवाज़े के दोनों तरफ़ हम ही हैं
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आपका
रविकान्त राऊत
