मिथक के बाद मनुष्य
मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य […]
मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य […]
फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा
यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला
जिस रात मुझे वह मिला जो मैं चाहता था —उस रात मैं बहुत देर तक छत की सफ़ेद दीवार देखता
वह समंदर जो कभी नहीं आया शाम ढल रही थी।छत पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी — लेकिन मैंने
मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था।और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे
मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ,लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है।यह
आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों
मेरे पास एक मुखौटा है। इसका कोई नाम नहीं है। या शायद है, पर मुझे याद नहीं। यह मुखौटा तब
उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने