नोटशीट
September 25, 2026 · 21 मिनटरजिस्टर संख्या 27/1984 को अलमारी के तीसरे खाने में रखा जाता था। यह बात दफ़्तर में किसी नियम-पुस्तिका में नहीं लिखी…
पूरा पढ़ें →रजिस्टर संख्या 27/1984 को अलमारी के तीसरे खाने में रखा जाता था। यह बात दफ़्तर में किसी नियम-पुस्तिका में नहीं लिखी…
पूरा पढ़ें →मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर इंदौर समाचार पत्र में समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’ द्वारा दी गई पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय…
पूरा पढ़ें →कल्पना कीजिए एक ऐसा घर, जिसे बिजली दो पड़ोसियों से मिलती है – एक सस्ती लेकिन विवादित, दूसरी महंगी लेकिन ‘सम्मानजनक’। अब वह पड़ोसी जो महंगी…
पूरा पढ़ें →बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन…
पूरा पढ़ें →उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था…
पूरा पढ़ें →चौदह सितंबर की सुबह दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर एक चमकीला पोस्टर चस्पा हुआ — “Hindi Pakhwada: 14 to 28 September, Celebrate Our Mother Tongue!” पोस्टर…
पूरा पढ़ें →मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता…
पूरा पढ़ें →फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़…
पूरा पढ़ें →यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता…
पूरा पढ़ें →आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।हर बातचीत में…
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