मिथक के बाद मनुष्य
May 15, 2026मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता…
पूरा पढ़ें →मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता…
पूरा पढ़ें →फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़…
पूरा पढ़ें →यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता है हवा गुजरती…
पूरा पढ़ें →जिस रात मुझे वह मिला जो मैं चाहता था —उस रात मैं बहुत देर तक छत की सफ़ेद दीवार देखता रहा।कोई उत्सव नहीं था भीतर। कोई…
पूरा पढ़ें →वह समंदर जो कभी नहीं आया शाम ढल रही थी।छत पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी — लेकिन मैंने उसे पिया नहीं। बस पकड़े रहा।…
पूरा पढ़ें →मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था।और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे — हर बहस में, हर बैठक…
पूरा पढ़ें →मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ,लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है।यह छोटा कमरा है — एक खिड़की…
पूरा पढ़ें →आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।हर बातचीत में…
पूरा पढ़ें →मेरे पास एक मुखौटा है। इसका कोई नाम नहीं है। या शायद है, पर मुझे याद नहीं। यह मुखौटा तब पहनता हूँ जब मुझे कुछ ख़त्म…
पूरा पढ़ें →उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने का वक़्त नहीं था। रात के…
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