मेरे पास एक मुखौटा है।
इसका कोई नाम नहीं है।
या शायद है, पर मुझे याद नहीं।
यह मुखौटा तब पहनता हूँ जब मुझे कुछ ख़त्म करना होता है —
कोई काम, कोई किताब, कोई रिश्ता, कोई वादा।
लेकिन ख़त्म करना आसान नहीं होता।
क्योंकि ख़त्म करने का मतलब है —
मान लेना कि यह पूरा नहीं हो सकता।
पिछले तीन महीने से मैं एक चीज़ पर काम कर रहा हूँ।
यह बड़ी नहीं है, लेकिन छोटी भी नहीं।
जब शुरू किया था, तो लगा था —
एक हफ़्ते में हो जाएगी।
फिर एक हफ़्ता दो हफ़्ते हो गया।
फिर एक महीना।
अब तीन महीने हो गए हैं।
और अब मुझे नहीं पता —
यह कभी पूरी होगी या नहीं।
समस्या यह नहीं है कि मैं काम नहीं कर रहा।
समस्या यह है कि हर बार जब मैं सोचता हूँ कि यह पूरा हो गया —
कुछ गड़बड़ दिखती है।
एक शब्द ग़लत जगह पर।
एक तर्क कमज़ोर।
एक वाक्य जो कहीं से भी सही नहीं लगता।
तो मैं उसे फिर से लिखता हूँ।
और फिर से।
और फिर से।
कल रात मैं बिस्तर पर लेटा था।
आँखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
मैं सोच रहा था —
क्या यह इतना ज़रूरी है?
क्या कोई इसे पढ़ेगा?
क्या किसी को फ़र्क़ पड़ेगा?
और अगर नहीं पड़ेगा,
तो मैं यह कर क्यों रहा हूँ?
फिर मुझे याद आया —
शुरुआत में मैंने क्यों शुरू किया था।
कोई बड़ा कारण नहीं था।
बस एक सवाल था —
एक छोटा-सा सवाल।
और मुझे लगा था —
मैं इसका जवाब ढूँढ़ सकता हूँ।
लेकिन जैसे-जैसे मैं गहरे गया,
सवाल बड़ा होता गया।
और अब वह इतना बड़ा हो चुका है कि
मैं उसे पूरी तरह देख भी नहीं सकता।
आज सुबह मैंने फ़ैसला किया।
मैं यह ख़त्म करूँगा।
पूरा नहीं —
लेकिन ख़त्म।
दोनों में फ़र्क़ है।
पूरा करने का मतलब है —
हर चीज़ सही जगह पर।
ख़त्म करने का मतलब है —
रुक जाना, भले ही कुछ अधूरा रह जाए।
मैंने आख़िरी पन्ना पढ़ा।
फिर उसे फ़ाइल में रख दिया।
फिर फ़ाइल बंद कर दी।
कोई आवाज़ नहीं हुई।
कोई ख़ुशी नहीं हुई।
बस एक ख़ामोशी थी —
लंबी, भारी।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
बारिश हो रही थी।
सड़क पर लोग छाते लेकर चल रहे थे।
एक बच्चा पानी में कूद रहा था।
उसकी माँ उसे रोक रही थी,
लेकिन बच्चा हँस रहा था।
मुझे लगा —
शायद यही है जीना।
पूरा न हो पाना,
लेकिन फिर भी हँसना।
अब मैं सोचता हूँ —
क्या यह ठीक है?
अधूरा छोड़ देना?
मुझे नहीं पता।
लेकिन मैं यह जानता हूँ —
अगर मैं इसे पकड़े रहूँगा,
तो यह मुझे खा जाएगा।
इसलिए मैंने इसे जाने दिया।
शाम को मैं फिर मेज़ पर बैठूँगा।
फिर काग़ज़ होंगे।
फिर कॉफ़ी होगी।
और फिर से —
कुछ अधूरा।
क्योंकि यही तो है न — जीवन।
एक लंबी श्रृंखला अधूरी चीज़ों की।
और हम उन्हें पकड़ते हैं,
छोड़ते हैं,
फिर पकड़ते हैं —
बार-बार।
