मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे हैं, हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है। कुछ मुखौटे मुझे दुनिया से बचाते हैं और कुछ मुझे दुनिया के भीतर ले जाते हैं। जब मैं सफ़र में होता हूँ, मैं एक अलग ही मुखौटा पहन लेता हूँ। आज मैंने जो मुखौटा पहना है, उसका नाम है सफ़री का रसायन।
मैं उस शहर में पहली बार आया था। नाम ज़रूरी नहीं है। हर शहर की एक आत्मा होती है, नाम तो बस नक्शे के लिए होता है।
स्टेशन से बाहर निकला तो ऑटो वाले घेरने लगे। कहाँ जाना है साहब, अच्छा होटल दिखा दूँ। मैं मुस्कुराया। होटल नहीं, कोई आँगन मिलेगा क्या। वे हँस पड़े जैसे मैंने कोई पुराना शब्द बोल दिया हो।
आख़िरकार एक बूढ़ा ऑटोवाला मिला। उसने मेरी तरफ देखा, थोड़ा गौर से। फिर बोला, तुम रहने नहीं आए, घुलने आए हो। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसके ऑटो में बैठ गया।
वह मुझे एक पुराने से घर के सामने उतार गया। भीतर मिट्टी का आँगन था। एक औरत चूल्हे पर कुछ पका रही थी। दो बच्चे नंगे पाँव दौड़ रहे थे। रह लोगे, बूढ़े ने पूछा। मैंने कहा, यही तो ढूँढ रहा था।
मैंने अपना बैग रखा, जूते उतारे। और पहली बार लगा, मैं कहीं पहुँचा नहीं हूँ, मैं कहीं शामिल हुआ हूँ।
मैंने वही पहना जो उन्होंने पहनाया। ढीला-सा कुर्ता, हल्की-सी गंध मिट्टी, धूप और पसीने की। मैंने वही खाया जो उन्होंने खिलाया। रोटी जिसमें आकार से ज़्यादा इतिहास था। सब्ज़ी जिसमें स्वाद से ज़्यादा विरासत थी। मैंने पूछा, ये क्या है। औरत ने मुस्कुराकर कहा, हमारा। मैंने सिर हिलाया और खा लिया।
अगले दिन मैं गली में निकला। एक टपरी थी, चाय उबल रही थी। मैंने कहा, भाई एक चाय। वह बोला, कटिंग या फुल। मैंने हँसकर कहा, जितनी तुम पीते हो उतनी। वह मुस्कुराया।
धीरे-धीरे मैंने उनके शब्द पकड़ने शुरू किए, उनका लहजा, उनकी हँसी। का हाल बा, मैंने एक दिन पूछा। सब हँस पड़े। अरे अब तो अपना आदमी हो गया, किसी ने कहा। मुझे समझ आया, भाषा दरवाज़ा नहीं होती, वह चाबी होती है।
मैंने फोटो नहीं खींचे, फोन सारा समय जेब में ही रहा। क्योंकि मुझे समझ आ गया था, कुछ चीज़ें कैद नहीं की जातीं, उन्हें बस जीया जाता है।
वहाँ का पान खाया किमाम वाला, इत्र लगाया, टपरी की चाय पी। पूरा दिन बिना वजह के खुश रहा। लोग भाग रहे थे, स्पॉट्स गिन रहे थे, खंभे छू रहे थे। मैं बस बैठा था चाय के साथ। मैं समय नहीं भर रहा था, मैं अनुभव को साँस दे रहा था।
एक दिन बहस भी हो गई एक आदमी से। वह बोला, तुम बाहर वाले लोग समझते क्या हो। मैं मुस्कुराया। कुछ नहीं समझते, मैंने कहा, इसलिए तो सीखने आए हैं। वह थोड़ा शांत हो गया। मैंने उस दिन सीखा, हर शहर में पहले अपना अहंकार उतारना पड़ता है।
एक शाम भूख लगी, सच में लगी। पेट खाली था, जेब में पैसे थे। पर उस क्षण पहली बार लगा, मैं ज़िंदा हूँ। जब तक सब भरा रहता है जीवन पता नहीं चलता। कमी ही बताती है कि कुछ चाहिए। मैंने खाना खाया, धीरे-धीरे। और हर कौर में एक अजीब-सी सच्चाई थी।
कुछ दिनों बाद जाने का समय आया। मैंने बैग उठाया। आँगन में वही औरत खड़ी थी, बच्चे अब भी दौड़ रहे थे। मैंने कहा, चलता हूँ। वह बोली, फिर आना। मैंने सिर हिलाया।
स्टेशन की तरफ लौटते हुए मैंने सोचा, क्या मिला। कुछ नहीं और शायद सब कुछ। यही तो रसायन है।
मैं ट्रेन में बैठ गया। इस बार मैं एक शहर से लौट नहीं रहा था। मैं अपने भीतर एक नया शहर लेकर जा रहा था। और शायद यही यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है, तुम दुनिया को नहीं बदलते, तुम अपने भीतर जगह बनाते हो जहाँ दुनिया आकर बस जाती है।
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