जिस रात मुझे वह मिला जो मैं चाहता था —
उस रात मैं बहुत देर तक छत की सफ़ेद दीवार देखता रहा।
कोई उत्सव नहीं था भीतर। कोई ढोल नहीं बज रहा था। बस एक अजीब सी ख़ामोशी थी — वैसी ख़ामोशी जो तब होती है जब घड़ी की टिक-टिक अचानक बंद हो जाए और आपको पहली बार एहसास हो कि वह आवाज़ कितनी ज़रूरी थी।
मैंने सोचा था — मिलेगा तो रोऊँगा।
नहीं रोया।
मैंने सोचा था — मिलेगा तो हँसूँगा।
नहीं हँसा।
बस लेटा रहा। और छत देखता रहा।
बरसों पहले की बात है।
एक सपना था। एक पद। एक पहचान। एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचकर लगे — हाँ, अब मैं वह हूँ जो होना चाहता था।
उस सपने ने मुझे बहुत कुछ दिया। सुबह जल्दी उठने की वजह दी। रात देर तक जागने का हौसला दिया। हर तकलीफ़ को झेलने की एक वजह दी।
वह सपना मेरा ईंधन था।
और जिस रात वह पूरा हुआ — मैं पहली बार ईंधन के बिना था।
दफ़्तर में उस दिन तालियाँ बजी थीं।
लोगों ने हाथ मिलाए। कुछ ने गले लगाया। मेरी पत्नी की आँखें भरी थीं। उसने कहा — “तुमने कर दिखाया।”
मैंने मुस्कुराकर कहा — “हाँ।”
और उस मुस्कुराहट के पीछे एक सवाल था जो मैं किसी से नहीं पूछ सका —
“यह सब पाकर भी यह जो ख़ालीपन है — यह कहाँ से आया?”
पहले हफ़्ते सब ठीक था।
दूसरे हफ़्ते मैंने महसूस किया —
सुबह उठने की वजह बदल गई है।
पहले उठता था क्योंकि कुछ पाना था। अब उठता हूँ क्योंकि उठना होता है।
यह फ़र्क़ शब्दों में बहुत छोटा लगता है।
लेकिन जो इसे महसूस करे — वह जानता है कि यह फ़र्क़ पहाड़ जितना बड़ा है।
एक शाम पुराने दोस्त मिले।
वही — जो अभी भी उस पुरानी दौड़ में हैं। जिनकी आँखों में अभी भी वह चमक है। जो अभी भी किसी कुर्सी की तरफ़ देख रहे हैं जो उनकी नहीं है।
मैंने उनकी आँखें देखीं।
और पहली बार — मुझे उनसे रश्क हुआ।
वे अभी भी खोज रहे थे।
मैं पा चुका था।
और इन दोनों में — खोजना ज़्यादा ज़िंदा लग रहा था।
मेरी पत्नी ने एक रात पूछा — “खुश हो?”
मैंने कहा — “हाँ।”
उसने कहा — “सच में?”
मैं रुक गया।
पहली बार उसके इस सवाल का जवाब देने में वक़्त लगा।
वह चुप रही। मैं चुप रहा।
उस ख़ामोशी में हम दोनों ने कुछ समझा — जो शायद बोलने से टूट जाता।
बचपन में पतंग उड़ाते थे।
घंटों। छत पर। धूप में।
पतंग जितनी ऊँची जाती — धागे में उतना ज़्यादा खिंचाव होता। वह खिंचाव — वही असली मज़ा था। हाथ में वह कशिश, वह जीवंत धड़कन —
एक दिन पतंग कट गई।
आज़ाद हो गई — आसमान में, बिना किसी बंधन के।
हम सब ख़ुश हुए।
लेकिन एक पल बाद —
हाथ में सिर्फ़ खाली धागा था।
और वह ख़ुशी — कहीं चली गई थी।
उस रात समझ आया —
पतंग का मज़ा उड़ने में नहीं था।
धागे के खिंचाव में था।
अब हर सुबह दफ़्तर जाता हूँ।
वही कुर्सी है। वही पहचान है।
लेकिन एक चीज़ नहीं है —
वह बेचैनी जो मुझे सुबह जल्दी उठाती थी। वह भूख जो हर रात सोने से पहले कहती थी — “कल और अच्छा होगा।” वह तड़प जो मेरी सबसे पुरानी, सबसे वफ़ादार साथी थी।
वह साथी चली गई।
और उसके जाने का कोई मातम नहीं मनाया जाता।
क्योंकि दुनिया को लगता है — यह तो ख़ुशी का वक़्त है।
मेरे पुराने उस्ताद कहते थे —
“जो चीज़ मिल जाए — वह तुम्हारी नहीं रहती। जो न मिले — वह हमेशा तुम्हारी रहती है।”
तब हँसा था इस बात पर।
अब रात को यही बात याद आती है।
एक अजीब बात हुई पिछले हफ़्ते।
रास्ते में एक लड़का मिला। नया था शहर में। आँखों में वह पुरानी चमक थी — वही जो कभी मेरी थी।
वह मुझसे रास्ता पूछ रहा था — दफ़्तर का, शहर का, कामयाबी का।
मैंने उसे रास्ता बताया।
और जब वह चला गया — मैं देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।
मन में एक ख़याल आया जिसे कहीं लिखना ज़रूरी था —
वह लड़का अभी सबसे अमीर है। उसके पास सपना है। मेरे पास सिर्फ़ उसकी यादें हैं।
अब भी हर रात छत पर बैठता हूँ।
लेकिन अब एक नया सवाल है —
“अब क्या?”
आज मैं उतना प्यासा नहीं रहा जितना था।
पानी मिले पर तब तक प्यास चली जाए, इससे ज़्यादा तकलीफ़देह कुछ नहीं होता है।
शायद यही सबसे भारी मुखौटा है।
“अब क्या?” का मुखौटा।
जो बाहर से देखने पर सबसे चमकदार लगता है।
और भीतर से — बिल्कुल खोखला।
“पूर्णता का सबसे बड़ा धोखा — वह आती है। और तब पता चलता है कि हम उसके लिए नहीं, उसकी तलाश के लिए बने थे।”
