जहां दीवारें याद रखती हैं

मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ,
लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है।
यह छोटा कमरा है — एक खिड़की जो हमेशा आधी खुली रहती है, एक मेज़ जिसके तीन पैर बराबर हैं और चौथा थोड़ा छोटा, एक कुर्सी जो मेरे दादा की थी, और एक बिस्तर जो रात को बिस्तर है, दिन में सोफा, और कभी-कभी एक गवाह।
जब मैं पहली बार आया था, तो मकान मालकिन ने — एक बूढ़ी औरत जिसकी आँखें हरी थीं और जो हमेशा सूखे गुलाब की खुशबू से भरी रहती थी — मुझसे कहा था, “इस कमरे में पहले एक कवि रहता था। उसने यहाँ एक किताब लिखी और फिर गायब हो गया। फिर एक चित्रकार आया, उसने दीवारों पर कुछ बनाना शुरू किया लेकिन कभी पूरा नहीं किया। फिर एक पागल आदमी आया, वह रोज़ दीवारों से बातें करता था। अब तुम आए हो।”
उसने मुझे देखा, गहराई से, जैसे मेरे चेहरे के भीतर कुछ ढूँढ रही हो, फिर बोली, “देखते हैं — तुम क्या बनते हो, या तुम्हें क्या बनाया जाता है।”
मैंने उस समय हँस दिया था। अब मुझे लगता है वह चेतावनी दे रही थी।
मेरे पास एक मुखौटा है जो मेरी दादी ने दिया था।
दादी कहती थीं, “बेटा, चेहरा दो तरह का होता है — एक जो तुम पहनते हो, एक जो तुम छिपाते हो। अक्सर लोग दूसरे को इतना गहरे दबा देते हैं कि वह दीवारों में उग आता है।”
उस समय मुझे समझ नहीं आया था। अब समझ आ रहा है।
यह “सामान्यता का मुखौटा” है — इस पर कोई विशेष रेखा नहीं, बिल्कुल वैसा जैसा एक आदमी का चेहरा होना चाहिए, न बहुत खुश, न बहुत दुखी, न बहुत जीवित, न बिल्कुल मरा हुआ। बस सामान्य।
और मैं रोज़ सुबह उठता हूँ, दांत ब्रश करता हूँ, चाय बनाता हूँ, मेज़ पर बैठता हूँ, काम करता हूँ, खाना खाता हूँ, फिर सोता हूँ। सब कुछ जैसा होना चाहिए।
लेकिन पिछले हफ़्ते से कुछ बदल रहा है।
पहला दिन — सुबह जब मैं उठा, तो दीवार पर, ठीक खिड़की के बगल में, एक छोटा-सा दाग था। काला। गोल। जैसे किसी ने गीली उंगली से छू दिया हो।
मैंने सोचा रात को मैंने कहीं हाथ लगा दिया होगा।
मैंने उसे पोंछा, नहीं गया।
मैंने रगड़ा, और यह अजीब बात हुई — जितना मैं रगड़ता, दाग उतना ही गहरा होता जाता, जैसे वह बाहर से नहीं, अंदर से आ रहा हो, दीवार के भीतर से।
दूसरा दिन — दाग बड़ा हो गया था।
अब यह सिर्फ़ एक बिंदु नहीं था, यह फैल रहा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई जीवित चीज़ बढ़ती है।
मैंने फिर से साफ़ करने की कोशिश की, इस बार साबुन से, गर्म पानी से, लेकिन दाग के भीतर से एक बूँद पानी निकली। दीवार के अंदर से।
मैंने छुआ — ठंडा था, असली पानी।
लेकिन मेरे कमरे के ऊपर कोई और मंज़िल नहीं है, सिर्फ़ छत है।
तो यह पानी कहाँ से आया?
तीसरा दिन — दाग अब एक आकार ले रहा था।
जब मैं सुबह देखता तो वह अलग दिखता, शाम को और अलग, रात को कुछ और।
लेकिन एक बात साफ़ थी — यह किसी चेहरे जैसा बन रहा था।
और वह चेहरा मेरे जैसा लग रहा था, लेकिन थोड़ा पुराना, जैसे मैं बीस साल बाद दिखूँगा।
चौथा दिन — आज दाग के भीतर कुछ लिखा था। बहुत धुंधला, लेकिन पढ़ा जा सकता था: “तुम कब तक यहाँ रहोगे?”
मैंने चारों तरफ़ देखा। कमरे में कोई नहीं था। मैं अकेला था। फिर भी किसी ने लिखा था। या कुछ ने लिखा था।
पाँचवाँ दिन — आज जब मैं काम कर रहा था, तो अचानक कुर्सी हिली। मैंने सोचा शायद मैंने ही हिलाई होगी, लेकिन फिर मेज़ भी हिली, फिर खिड़की धीरे से बंद हुई, फिर खुली, फिर बंद, जैसे कमरा साँस ले रहा हो।
मैंने दादी की एक और बात याद की: “चीज़ें बोलती नहीं, लेकिन सुनती ज़रूर हैं। और जो बहुत देर तक सुनती रहती हैं, वे एक दिन बोलने भी लगती हैं। और जब वे बोलती हैं तो तुम्हें वही सुनाती हैं जो तुमने छिपाया था।”
उस रात मैंने कमरे से बात करने की हिम्मत की। “तुम क्या चाहते हो?”
कमरे ने जवाब नहीं दिया, लेकिन दाग थोड़ा और फैल गया, और अब उसमें दो शब्द थे: “अपना चेहरा।”
छठा दिन — आज एक पीली तितली खिड़की से आई। वह सीधे दाग पर बैठी, और जैसे ही वह बैठी, दाग जीवित हो गया। उसमें से एक हाथ निकला, धीरे-धीरे, दीवार के भीतर से। वह हाथ मेरे हाथ जैसा था, लेकिन पुराना, सूखा हुआ। उसने हवा में कुछ टटोला, जैसे कुछ ढूँढ रहा हो, फिर वापस चला गया, दीवार के भीतर।
मैं डर गया। मैं भागना चाहता था, लेकिन कहाँ? हर जगह कमरे हैं, हर जगह दीवारें हैं। और अगर दादी सही थीं, तो हर दीवार कुछ न कुछ याद रखती है।

सातवाँ दिन — मैंने अपने दोस्त को बुलाया। उसने कमरा देखा, मुस्कुराया। “बढ़िया जगह है यार। शांत। अच्छी रोशनी।” मैंने कहा, “लेकिन यह दाग —” उसने पूछा, “कौन-सा दाग?” मैंने दिखाया। दाग अब इतना बड़ा था कि उसमें एक पूरा चेहरा, दोनों हाथ, और कुछ शब्द दिख रहे थे। लेकिन मेरा दोस्त कुछ नहीं देख पा रहा था। “तू बहुत काम कर रहा है,” उसने कहा। “थोड़ा सो ले।” फिर वह चला गया। और तभी मुझे समझ आया — यह दाग सिर्फ़ मुझे दिखता है। क्योंकि यह मेरा है। यह मेरे उस चेहरे का दाग है जिसे मैंने इतने साल छिपाया।
आठवाँ दिन — रात को मैंने सपना देखा, या शायद यह सपना नहीं था। मैं अपने कमरे में था, लेकिन कमरा उल्टा हो गया था। फर्श छत पर, छत फर्श पर। और बीच में दो लोग खड़े थे — एक मैं था मुखौटे के साथ, दूसरा भी मैं था बिना मुखौटे के। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। और फिर बिना मुखौटे वाले ने बोलना शुरू किया: “मैं वह हूँ जो तुम बनना चाहते थे। लेकिन डर गए। तो तुमने मुझे यहाँ छोड़ दिया, इस दीवार में, इस कमरे में। लेकिन कमरा भूलता नहीं, वह सब याद रखता है।”
नौवाँ दिन — आज मैंने हिम्मत करके दाग को छुआ। वह गर्म था, जीवित, जैसे किसी की त्वचा हो। और जैसे ही मैंने छुआ, पूरा कमरा बदल गया। दीवारें नीली हो गईं, फिर हरी, फिर काली। फर्श घास से भर गया, फिर पानी से, फिर आग से। छत गायब हो गई, उसकी जगह आसमान आ गया। और मेरे सामने एक दरवाज़ा खुल गया, दीवार के भीतर।
मैंने अंदर झाँका। वहाँ एक पूरी दुनिया थी — हज़ारों कमरे, हज़ारों दीवारें, हज़ारों लोग। कोई पेंटिंग बना रहा था दीवार पर अपना चेहरा, कोई गाना गा रहा था जो कभी खत्म नहीं होता था, कोई सिर्फ़ रो रहा था बिना आवाज़ के, कोई हँस रहा था बिना किसी वजह के। और सबके चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं था।
एक आदमी मेरी तरफ़ आया। वह मेरे जैसा दिखता था, लेकिन उसकी आँखों में शांति थी। उसने कहा, “यह वह जगह है जहाँ वे चेहरे रहते हैं जिन्हें लोग छिपा देते हैं। हर दीवार एक दरवाज़ा है। हर दाग एक रास्ता। तुम यहाँ रह सकते हो, लेकिन फिर तुम बाहर नहीं जा पाओगे।”
मैंने पूछा, “और अगर मैं बाहर रहूँ?”
उसने मुस्कुराते हुए कहा, “तो यह दाग बढ़ता रहेगा। और एक दिन तुम्हारा पूरा कमरा इसमें समा जाएगा। और तुम भी।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। मेरा कमरा अब बहुत छोटा लग रहा था — मेज़, कुर्सी, बिस्तर, खिड़की, सब सिकुड़ रहे थे। और दाग फैल रहा था।

दसवाँ दिन — मुझे निर्णय लेना था। या तो मैं दीवार के भीतर चला जाऊँ और अपना असली चेहरा पा लूँ, या फिर बाहर रहूँ और धीरे-धीरे इस दाग में समा जाऊँ। मैंने सोचा — दादी ने क्या कहा था? “बेटा, दुनिया में दो तरह के कमरे होते हैं — जो तुम्हें बंद करते हैं, और जो तुम्हें खोलते हैं। और कभी-कभी एक ही कमरा दोनों होता है।”
ग्यारहवाँ दिन — आज मैंने अपना मुखौटा उतारा, धीरे-धीरे। और जैसे ही मैंने उतारा, दाग एकदम से फट गया। एक बड़ा दरवाज़ा बन गया, और उसके भीतर से रोशनी आने लगी — गर्म, सुनहरी। मैंने एक गहरी साँस ली और अंदर चला गया।
बारहवाँ दिन — अगली सुबह मैं फिर से अपने कमरे में था। दाग गायब था। कुर्सी अपनी जगह पर, मेज़ अपनी जगह पर। सब कुछ सामान्य।
लेकिन अब जब मैं आईने में देखता हूँ, तो मुझे दो चेहरे दिखते हैं — एक मुखौटे वाला, एक असली। और कभी-कभी रात को, जब कमरा बिल्कुल शांत होता है, मुझे दीवार के पीछे से आवाज़ें सुनाई देती हैं — गाने, हँसी, रोना, साँसें। और मुझे पता है कि वह दुनिया अब भी वहाँ है।
आज मैंने फिर से दीवार को छुआ। गर्म थी, जीवित। और मुझे पता है कि जब भी मैं तैयार होऊंगा, दरवाज़ा फिर से खुलेगा।
लेकिन अब सबसे डरावनी बात यह नहीं है कि दाग था। सबसे डरावनी बात यह है — मुझे अब पता नहीं कि मैं कौन-सा चेहरा पहन रहा हूँ। असली वाला या मुखौटे वाला। और कभी-कभी, जब मैं अकेला होता हूँ, मुझे लगता है शायद दोनों एक ही हैं। और असली डर यही है।

क्योंकि सबसे खतरनाक कमरा वह नहीं है जो तुम्हें कैद करे। सबसे खतरनाक कमरा वह है जो तुम्हें इतना आरामदायक बना दे कि तुम भूल जाओ — तुम असल में कौन हो। और जब दीवारें याद रखने लगती हैं, तो वे तुम्हें याद दिलाती हैं — चाहे तुम तैयार हो या नहीं।


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