
मिथक के बाद मनुष्य देखिए,
चेहरों की भीड़ सजी,
सच पर आवरण है,
क्यों उसमें कोई दाग नहीं।
मनुष्य है मंचों पर,
जीवन अभिनय करता है,
भाग्य भरोसे भावनाएँ,
शब्दों में सत्य मरता है,
और विचारशील मनुष्य को तो,
प्रश्न करने का अधिकार नहीं।
चालाकियाँ करके विचार,
आगे ही बढ़ते जाते हैं,
और सरल मनुष्य बेचारा,
अपने अर्थ को तरस जाता है,
खोज रहा बस अस्तित्व को अपने,
टूट रहे उसके सपने,
पूछ रहा समय से अपने —
क्या मेरे जीवन का कोई
अभिप्राय नहीं।
लोकतंत्र अब अभिनय है,
जहाँ शक्ति गिरवी रखी गई,
तालियों के शोर तले,
चुप्पी भी बिकती दिखी।
स्मृतियाँ अब वस्तु बनीं,
भावनाएँ संग्रह हो गईं,
जब हर अनुभव संग्रहालय हो,
तो जीवित रहना भी शेष नहीं।
सत्य यहाँ निर्माण हुआ है,
झूठ को सम्मान मिला है,
जब हर नक़ल खुद को पहली कहे,
तो असल भी भ्रम बना है।
अब आत्मा नहीं, पहचान बिकती है,
अमरता भी सदस्यता बनती है,
जहाँ मनुष्य स्वयं से दूर खड़ा,
अपने ही प्रतिबिंब से डरता है।
क्योंकि शायद —
अब सत्य शेष नहीं,
बस उसकी गूँज बची है,
जो कलयुग के शोर में भी
अर्थ खोजती खड़ी है।
रविकांत राऊत
जबलपुर (म.प्र.)
