आज मैंने तय किया कि मैं कम बोलूँगा।
यह कोई संकल्प नहीं था। कोई आध्यात्मिक प्रयोग भी नहीं। बस सुबह उठते समय लगा कि शब्द आज भारी हैं। जैसे हर वाक्य को उठाने के लिए अतिरिक्त ताकत चाहिए।
मैंने दिन की शुरुआत बिना संगीत के की। चाय बनाई। कप से उठती भाप को कुछ सेकंड देखा।
ध्यान आया — मैं अक्सर चाय पीता हूँ, उसे देखता नहीं।
शायद जीवन की ज़्यादातर चीज़ें हम इस्तेमाल करते हैं, अनुभव नहीं।
फोन पर कई संदेश थे। मैंने जवाब टाल दिए। किसी से नाराज़ नहीं था।
बस भीतर एक हल्की थकान थी — वह थकान जो काम से नहीं, लगातार उपस्थित रहने से आती है। हर बातचीत में एक संस्करण बनना पड़ता है। हर जगह थोड़ा अलग आदमी।
चुप रहना उस दिन एक तरह की छुट्टी थी अपने ही व्यक्तित्व से।
दोपहर में बाहर गया। सड़क पर वही शोर था जो रोज़ होता है। लेकिन जब आप कम बोलते हैं, दुनिया ज़्यादा सुनाई देती है। कदमों की आवाज़। दूर से आती हँसी। हवा में पत्तों की हल्की रगड़।
मुझे लगा — शांति अनुपस्थिति नहीं है। वह सूक्ष्म ध्वनियों की उपस्थिति है।
आईने में चेहरा देखा।,जब हम बोलते नहीं, चेहरा ढीला पड़ जाता है। अभिनय हट जाता है। वहाँ एक सादा मनुष्य खड़ा रहता है — बिना प्रस्तुति के।
मुझे वह आदमी थोड़ा अजनबी लगा। और थोड़ी देर बाद — परिचित।
शायद हम अपने असली चेहरे से कम मिलते हैं। हम उसे सामाजिक अवसरों के लिए बचाकर रखते हैं, जैसे कोई महँगा कपड़ा
जिसे रोज़ पहनना ठीक न हो।
एक दोस्त मिलने आया। वह बोलता रहा। मैं सुनता रहा। बीच-बीच में सिर हिलाता। उसने अपनी परेशानियाँ बताईं, अपने संदेह, अपने छोटे-छोटे क्रोध।
जब वह जाने लगा तो बोला, “तुम्हारे साथ बात करके हल्का लग रहा है।”
मैंने सोचा — मैंने तो कुछ कहा ही नहीं।
शायद सुनना भी एक भाषा है। और हम उसे भूलते जा रहे हैं।
शाम तक चुप्पी डरावनी नहीं रही। वह एक कमरा बन गई थी। ऐसा कमरा जहाँ मैं बैठ सकता था बिना किसी भूमिका के। बिना यह तय किए कि मुझे कौन होना है।
कभी-कभी आदमी बोल-बोलकर खुद को इतना भर लेता है कि भीतर जगह नहीं बचती। चुप्पी वह जगह वापस करती है।
रात को खिड़की के पास बैठा था। शहर दूर से चमक रहा था। रोशनी हमेशा शोर का संकेत लगती है, लेकिन उस दूरी से वह सुंदर थी। शांत।
मुझे लगा — शायद शांति बाहर खोजने की चीज़ नहीं है। वह दूरी का अभ्यास है।
शोर से दूरी। भूमिका से दूरी। अपेक्षाओं से दूरी।
और उस दूरी में चेहरा अपने आप स्थिर हो जाता है।
शांत चेहरा। यह मुखौटा नहीं छुपाता। यह बचाता है।
दुनिया के बीच एक छोटा सुरक्षित स्थान बनाता है
जहाँ आदमी थोड़ी देर के लिए सिर्फ आदमी रह सके।
सोते समय लगा — आज मैंने कम नहीं जिया। आज मैंने पहली बार थोड़ा साफ़ जिया।
शायद नायक वह नहीं जो सबसे अधिक करता है। शायद वह है जो कभी-कभी रुककर अपने भीतर की आवाज़ सुन लेता है
और उसे भागने नहीं देता।
