निराशा का व्याकरण

एक वैश्विक दर्शन : जब दुनिया के महान मन अंधेरे में उतरे

एक रात काफका ने अपनी डायरी में लिखा, “मेरे भीतर एक विशाल संसार है। और में नहीं जानता कि इसे कैसे मुक्त करूं और यदि मुक्त न कर सका, तो यह मुझे नष्ट कर देगा।”

यह वाक्य पढ़कर मैं बहुत देर तक बैठा रहा। इसलिए नहीं कि यह किसी महान लेखक का वाक्य था। बल्कि इसलिए कि यह वाक्य ऐसा लगा, जैसे किसी ने मेरे भीतर झांककर लिख दिया हो।

और तब मुझे पहली बार समझ आया कि निराशा कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है। यह मनुष्य की सबसे पुरानी, सबसे साझा भाषा है। हर सभ्यता ने इसे जिया है। हर महान लेखक, दार्शनिक, फिल्मकार इसके सामने खड़ा हुआ है और उसने जो देखा, वह हमें बताया।

यह आलेख उन्हीं की बातें हैं। पर असल में यह आपकी कहानी है।

उन्नीसवीं सदी के डेनमार्क में एक दार्शनिक था सोरन कीर्केगार्ड। न घर बसाया, न नौकरी की, न किसी दल में शामिल हुआ। बस सोचता रहा। और एक दिन उसने एक किताब लिखी, द सिकनेस अन्दु डेथ (मृत्यु तक बीमार) नाम से डर लगता है। पर भीतर जो लिखा था, वह अद्भुत था। कीर्केगार्ड ने कहा निराशा कोई भावना नहीं। यह एक आत्मिक अवस्था है। और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि निराश इंसान मरना चाहता है, पर मर नहीं सकता। जिंदगी उसे छोड़ती नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी सजा है और यही उसकी सबसे बड़ी संभावना भी। क्योंकि जो निराशा के भीतर से सच में गुजरता है, उससे आंखें नहीं चुराता… वही विश्वास की छलांग लगाने में सक्षम होता है।

यानि निराशा एक परीक्षा है और परीक्षा से भागने वाला कभी उत्तीर्ण नहीं होता। इस विचार से ठीक आगे बढ़कर, दूसरी तरफ फ्रांस में एक और दार्शनिक था, अलबर्त कामू जिसने एक पुरानी ग्रीक कहानी उठाई: सिसिफस की। देवताओं ने उसे श्राप दिया था, ‘एक विशाल चट्टान को पहाड़ की चोटी तक चढ़ाने का। वह जैसे ही चोटी के पास पहुंचता, चट्टान नीचे लुढ़क जाती। और वह फिर नीचे उतरता। फिर उठाता। फिर चढ़ाता। अनंत काल तक।

हम इसे देखें तो कहेंगे कि यह तो निराशा का सबसे क्रूर रूप है। पर कामू ने कहा, “हमें सिसिफस को सुखी मानना होगा।

यह वाक्य पढ़कर पहले हंसी आती है। फिर रुककर सोचते हैं और भीतर कुछ हिलता है। सिसिफस जानता है कि उसकी मेहनत व्यर्थ जाएगी। पर इसे जानते हुए भी वह चट्टान उठाता है। यही विद्रोह है। यही मनुष्य की गरिमा है। और यही वह सत्य है जो न धर्म में है, न दर्शन में वह सिर्फ उस क्षण में है, जब तुम जानते हो कि सब व्यर्थ है, और फिर भी उठते हो।

रूस के महान उपन्यासकार फियोदोर दोस्तोवस्की ने एक छोटी-सी किताब लिखी, नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड उसका नायक कोई नाम नहीं रखता। वह बस एक भूमिगत से। व्यक्ति है जमीन के नीचे रहने वाला।

वह कहता है, “में एक बीमार आदमी हूं। एक बुरा आदमी। मेरा लीवर दर्द करता है। पर में डॉक्टर के पास नहीं जाता-इसलिए नहीं कि में अंधविश्वासी हूं बल्कि इसलिए कि मुझे कोई परवाह नहीं।”

यह पढ़कर असहजता होती है पर यही दोस्तोवस्की का उद्देश्य है। वह दिखाना चाहते थे कि निराशा इंसान को किस तरह अपने ही विरुद्ध कर देती है। पर उनके बड़े उपन्यास “ब्रदर्स करामाजोव” में इवान करामाजोव इससे आगे जाता है। वह मानता है कि ईश्वर है ही नहीं या अगर है, तो वह अन्यायी है। यह जानकर वह टूट सकता था। पर वह टूटता नहीं। वह प्रश्न पूछता रहता है और निराशा में भी जिज्ञासा न मरने देना, यही दोस्तोवस्की की नायकता है।

इसी प्रश्न की अनुगूंज 1953 में पेरिस के एक छोटे से थिएटर में सुनाई दी, जब सेम्यूअल बेकेट लिखित “वेटिंग फॉर गोदो” का का मंचन हुआ। दो पात्र व्लादिमिर और एस्ट्रागोन, एक पेड़ के नीचे खड़े हैं। किसी गोदो के इंतजार में। वास्तव में गोदो किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, वह आशा, प्रतीक्षा और अनिश्चित भविष्य का प्रतीक है। पूरे नाटक में गोदो नहीं आता। अंत में संदेश आता है, ‘कल आएगा’। और वे दोनों फिर भी वहीं रुके रहते हैं।

दर्शक परेशान हो गए। आलोचकों ने कहा… यह कोई नाटक नहीं। पर जो समझदार थे, वे चुप रहे और सोचते रहे। क्योंकि बैकेट ने वह सच दिखाया था, जो हम सब जानते हैं पर कहते नहीं हम सब किसी न किसी ‘गोदो’ का इंतजार कर रहे हैं। कोई नौकरी। कोई इंसान। कोई पल। कोई चमत्कार। जो शायद कभी न आए। और फिर भी हम रुके रहते हैं।

‘लेखक के पास कहने को कुछ नहीं, कहने की शक्ति नहीं, कहने की इच्छा नहीं, फिर भी कहने की बाध्यता है।”

यही निराशा का सबसे गहरा उत्तरदायित्व है… जब सब कारण समाप्त हो जाएं, तब भी वह एक अदृश्य धागा बचा रहता है, जो तुम्हें बांधे रखता है। जीवन से। उम्मीद औरों से।

इसी धागे की परीक्षा फ़्रांज काफ़का ने एक लघुकथा (ली बिफोर द लॉ) में की है। एक आदमी कानून के दरवाजे पर आता है। द्वारपाल कहता है, तुम अभी अंदर नहीं जा सकते। वह रुकता है। साल बीतते हैं। वह बूढ़ा हो जाता है।

मरते वक्त पूछता है, “में तो खैर रुका रहा तुम्हारे कहने पर, पर इतने सालों में और कोई भीतर क्यों नहीं गया?

इस पर द्वारपाल कहता है, “यह दरवाजा सिर्फ तुम्हारे लिए था। अब चूंकि तुम मर रहे हो, में इसे बंद करता हूं।”

कहानी पढ़कर पहले तो क्रोध आता है। फिर उदासी। फिर एक भयानक सत्य से हमारी पहचान होती है कि ऐसे कितने ही दरवाजे हैं हमारे जीवन में जो सिर्फ हमारे लिए थे, और हम अपने डर से, समाज से, असफलता के भय से, बाहर खड़े रहे। काफ्का की निराशा यह नहीं थी कि जीवन क्रूर है। उनकी निराशा यह थी कि मनुष्य स्वयं अपने दरवाजों से डरता है।

उर्दू साहित्य ने इस निराशा को एक अलग ही आयाम दिया। मिर्जा गालिब के लिए निराशा कोई रोग नहीं थी, वह कच्चा माल था।” हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,” यहां निराशा खुद एक सौंदर्य-बोध बन जाती है। गालिब कर्ज में डूबे, पत्नी से कलह में, मुगल साम्राज्य के पतन के साक्षी बनते हुए भी कभी शायरी नहीं छोड़ी। यही उनका ‘सिसिफियन’ उत्तरदायित्व था।

फैज अहमद फैज ने इस व्यक्तिगत निराशा को सामाजिक प्रतिरोध में बदला। जेल में लिखते रहे।

– हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ यह सिर्फ प्रेम-कविता नहीं, एक घोषणापत्र है कि निजी दर्द भी सामूहिक उत्तरदायित्व में बदल सकता है।

और हिंदी की छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा ने विरह और निराशा को अपनी काव्य-शक्ति का स्रोत बनाया। में नीर भरी दुख की बदली पर वही बदली बरसती भी है। निराशा को रचना में बदलना यही महादेवी का उत्तर था।

सन 1952 में जापान के महान फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने एक फिल्म बनाई जिसका अर्थ है-जीना। नायक वातानाबे तीस साल से सरकारी दफ्तर में काम कर रहा है। फाइलें आगे सरकाता है। घर जाता है। सोता है। फिर दफ्तर। उसका बेटा उससे बात नहीं करता। उसे पता नहीं कि वह जिंदा है या नहीं।

फिर डॉक्टर बताता है उसे कैंसर है। ज्यादा से ज्यादा छह महीने।

वातानाबे टूट जाता है। पर फिर एक छोटे बच्चों के पार्क के लिए लड़ता है। नौकरशाही से। अपने ही दफ्तर से। बीमारी से। और जब वह मर जाता है तो बच्चे उस पार्क में खेल रहे होते हैं। कुरोसावा ने कुछ नहीं कहा। बस दिखाया कि निराशा का उत्तरदायित्व है मृत्यु की निराशा में भी एक सार्थक काम एक पार्क, एक कविता, एक अच्छा दिन किसी के जीवन में।

इसी के समानांतर इंगमार बर्गमैन की “द सेवेंथ सील”  में एक नाइट (योद्धा) मृत्यु  के साथ शतरंज खेलता है, पता होते हुए कि हारेगा। पर वह खेलता है। गरिमा के साथ। हारते हुए भी सीधे खड़े रहना यही मनुष्य की असली जीत है। और आंद्रेई तारकोवस्की की “स्टॉकर” में एक पथप्रदर्शक दूसरों को उस जादुई जोन तक पहुंचाता है जहां इच्छाएं पूरी होती हैं पर खुद कभी नहीं जाता। वह जानता है शायद ‘जोन’ में कुछ नहीं है। फिर भी अगली बार फिर जाएगा। क्योंकि विश्वास बनाए रखना ही उसका घर्म है।

यही कहानी भारतीय परिदृश्य में, विजय आनंद की गाइड (1968) फिल्म में दिखती है। देव आनंद अभिनीत राजू गाइड एक ऐसा इंसान है, जो झूठ, धोखे और स्वार्थ की जिंदगी जीता है। पर जब गांव में अकाल पड़ता है तो वही राजू, जो कुछ नहीं था, एक स्वामी बन जाता है। उपवास करता है। और शायद प्रकृति भी उसकी सुनती है। गाइड का ‘राजू’ वातानाबे का , देसी अवतार में। निराशा और पतन के बाद भी एक सार्थक काम। एक पार्क। एक बारिश।

और फिल्म टाइटेनिक (1997) में जैक डॉसन जानता है कि वह बचेगा नहीं। समुद्र का ठंडा पानी, टूटता जहाज, हजारों लोगों की चीखें। पर वह गुलाब ‘रोज’ को तख्ते पर चढ़ाता है। अपने लिए नहीं रखता। निराशा में भी प्रेम का उत्तरदायित्व यही जेम्स कैमरान ने करोड़ों दर्शकों को दिखाया। और दुनिया रोई इसलिए नहीं कि जैक मरा, बल्कि इसलिए कि उसने मरते हुए भी जिम्मेदारी नहीं छोड़ी।

पर टाइटैनिक की सबसे बड़ी कहानी जैक की नहीं है। वह कहानी है उन आठ संगीतकारों की वॉलेस हार्टले के नेतृत्व में जो डूबते जहाज की डेक पर खड़े थे और सिंफनी बजाते रहे। जहाज झुक रहा था। पानी पांव तक आ चुका था। लोग चीख रहे थे। लाइफबोट भर चुकी और वे बजाते रहे। उन्हें पता था यह संगीत उन्हें बचाएगा नहीं। पर शायद किसी और की आत्मा को थाम लेगा। शायद किसी मां को, किसी बच्चे को, किसी बूढ़े को, उनकी मृत्यु के उस अंतिम क्षण में, थोड़ी गरिमा दे देगा।

वे आठों भी नहीं बचे। पर उनका संगीत आज भी बजता है, उन सबके भीतर जो यह जानते हैं कि निराशा के सबसे गहरे क्षण में भी, मनुष्य का धर्म यही है। बजाते रहो। गाते रहो। रचते रहो। यही निराशा का सबसे पवित्र उत्तरदायित्व है डूबते हुए भी सुर न छोड़ना।

इसी पवित्रता का दूसरा रूप है 1997 की इटैलियन फिल्म “लाइफ इज ब्यूटिफुल” (ला विटा ए बेल्ला)। नाजी कंस्ट्रेशन कैंप में यहूदी पिता गुइडी अपने छोटे बेटे जिओसुए के साथ कैद है। और तब इस पिता ने जो किया, वह मानव इतिहास का सबसे असाधारण कार्य है। उसने बेटे को बताया यह सब एक खेल है। जो सबसे ज्यादा अंक जमा करेगा, उसे एक असली टैंक मिलेगा।

उसने भूख को खेल बताया। क्रूरता को नियम बताया। मृत्यु को अगले राउंड की प्रतीक्षा बताया। और जब नाजी सैनिक उसे मौत की तरफ ले जाने आए तो वह बेटे की नजरों से बचते हुए हंसते-हंसते गया। एक मसखरे-सा, अजीब मार्च करते हुए जैसे यह भी खेल का हिस्सा हो।

बेटा छुपकर देखता रहा। मुस्कुराता रहा। पिता मारा गया। बेटा बचा। गुइडो ने निराशा को बेटे तक पहुंचने नहीं दिया। यह जानते हुए कि वह खुद बचेगा नहीं उसने अपनी मृत्यु को भी एक उपहार में बदल दिया। निराशा का यह उत्तरदायित्व सबसे दुर्लभ है अपने टूटने को छुपाकर, किसी और के जीवन में उजाला भरते रहना ।

वातानाबे ने मरते हुए एक पार्क बनाया। गुइडो ने मरते हुए एक पूरी दुनिया बनाई अपने बेटे के लिए।

पर इन सबसे भी आगे देने की एक ऐसी मिसाल है जिसे जॉन स्टीनवेक ने 1939 में अपने उपन्यास ग्रेप्स ऑफ रेथ में एक दृश्य के रूप में रखा और जिसे विश्व साहित्य के इतिहास में अमर माना जाता है। ओक्लाहोमा से कैलिफोर्निया तक हजारों मील ‘जोड’ परिवार भूख, पलायन और मौत से जूझते हुए चलता है। रास्ते में बच्चे मरते हैं। बूढ़े गिरते हैं। सपने टूटते हैं। और इसी यात्रा में रोज ऑफ शेरोन का बच्चा जन्म लेते ही चला जाता है। वह मां बनी, पर मां का दूध पीने वाला कोई नहीं। तब वह एक झोंपड़ी में जाती है जहां एक बूढ़ा आदमी भूख से मर रहा है। और वह बिना एक शब्द कहे उसे अपना स्तन दे देती है।

स्टीनवेक ने यहां कोई दर्शन नहीं लिखा। कोई भाषण नहीं दिया। बस एक दृश्य रख दिया। और उस एक दृश्य में निराशा का पूरा व्याकरण है, जब तुम्हारा अपना सब कुछ छिन जाए, तब भी तुम्हारे भीतर देने के लिए कुछ बचा रहता है। वह ‘कुछ’ ही मनुष्यता है।

वही उत्तरदायित्व है।

रोज ऑफ शेरोन का वह मौन गुड्डो की वह मुस्कान और उन आठ संगीतकारों की वह अंतिम धुन, तीनों एक ही सत्य के तीन रूप हैं। जब अपना सब छिन जाए तब भी देना बंद मत करो। यही शायद विश्व साहित्य की सबसे बड़ी निराशा और सबसे बड़ी करुणा एक साथ है।

दूसरी तरफ हम देखें तो पाते हैं कि हिंदी सिनेमा ने निराशा का एक अजीब प्रतीक बनाया ‘देवदास’ । प्रेम में असफल। जीवन में असफल। शराब में डूबा। आंसुओं में डूबा। पूरा देश उस पर रोया। पर किसी ने नहीं पूछा क्या यह सही था?

देवदास निराशा का वह उत्तर है जो होना नहीं चाहिये भागना, डूबना, खुद को खत्म कर लेना, एक निरुद्देश्य चरित्र।

कामू होता तो कहता देवदास ने चट्टान छोड़ दी।

कीर्केगार्ड होता तो कहता वह द्वार पर खड़ा रहा और भीतर नहीं गया।

कुरोसावा होता तो कहता, उसने एक भी पार्क नहीं बनाया।

और इसीलिए हमारे साहित्य और जीवन को देवदास नहीं वातानाबे चाहिए, इवान करामाजोव चाहिए, सिसिफस चाहिए। वह जो टूटे पर बिखरे नहीं, जो निराश हो पर

जिम्मेदारी न छोड़े।

द्वितीय विश्वयुद्ध में नाजी यातना शिविरों में एक ऑस्ट्रियाई मनोचिकित्सक था विक्टर फ्रैंकल। उसने सब खोया। परिवार। घर। भविष्य। स्वतंत्रता। वहां से जिंदा बचकर निकलने के बाद उसने एक किताब लिखी, मेन्स सर्च फॉर मीनिंग । उसमें एक वाक्य है, जो कुछ भी मुझसे छीना जा सकता है, वह छीन लो पर एक चीज तुम नहीं छीन सकते मेरी प्रतिक्रिया चुनने की स्वतंत्रता ।”

यही निराशा का अंतिम और सबसे गहरा उत्तरदायित्व है। परिस्थिति हमारी नहीं होती। पर प्रतिक्रिया हमारी होती है। और यह सत्य हमारे यहां भी सिनेमा के माध्यम से व्यक्त हुआ, ‘गरम हवा’ (1973, एम.एस. सत्यु ) में। बंटवारे की त्रासदी में बलराज साहनी का किरदार सलीम मिर्जा सब खोता है, फिर भी पाकिस्तान नहीं जाता। अंत में जब वह जुलूस में शामिल होता है तो वह फ्रैंकल का वही क्षण है, में अपनी प्रतिक्रिया चुन रहा हूं। निराशा में भी अपनी मिट्टी से जुड़े रहना।

मैंने जब यह सब पढ़ा कीर्केगार्द, कामू, काफ्का, बेकेट, दोस्तोवस्की, कुरोसावा, फ्रेंकल तो मुझे एक बात समझ आई। निराशा कोई बीमारी नहीं है जिसका इलाज करना है। वह एक भाषा है जिसे समझना है।

हैं कि आप अकेले नहीं हैं। और जब आप उसे समझते हैं तो पाते हैं कि काफ्का भी यहां था। बेकेट भी। वातानावे भी। सिसिफस भी। गालिब भी। महादेवी भी। वे आठ संगीतकार भी जो डूबते जहाज पर संगीत बजाते रहे। गोदो भी, जो मृत्यु को एक खेल बना गया।

सब वही चट्टान उठा रहे थे। सब उसी ‘गोदो’ का इंतजार कर रहे थे। सब उसी दरवाजे के बाहर खड़े थे। और फिर ची उठते रहे। लिखते रहे। जीते रहे। एक-एक पार्क बनाते रहे।

निराशा तुम्हें जलाती है। पर कभी-कभी वही जलन चराग भी बन जाती है। क्योंकि जो जलता है, वही जानता है कि रोशनी क्या होती है। और जो रोशनी जानता है वही दूसरों के अंधेरे में दाखिल हो सकता है।

यही मनुष्य का सबसे पुराना, सबसे जरूरी, सबसे मानवीय धर्म है।

 

2 thoughts on “निराशा का व्याकरण”

  1. Praveen Kumar

    Since morning i read your work continuously,

    I didn’t wanted to comment, i wrote few comment didnt post them.

    The fact is i m a in despair, purposeless in life , frozen in life, कुंठाग्रस्त लेखक जो लिखना चाहता है पर कभी नहीं लिखता,

    I felt you absolutely, your मुखौटा सीरीज बेहतरीन है l

    Aur ye article mujhe hila diya

    ♥️ thanks
    I wish aapse bat ho pati 9805260535 from himachal

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