आठ सितंबर आता है और गुज़र जाता है, ठीक वैसे ही जैसे साल के तीन सौ चौंसठ और दिन गुज़रते हैं। बहुत कम लोगों को याद रहता है कि यह तारीख यूनेस्को ने उन्नीस सौ छियासठ में तय की थी, और इस बरस यह परंपरा साठ बरस पूरे कर रही है। इस बार की थीम है “साक्षरता, लोगों, धरती और समृद्धि के लिए” तीन शब्द जो एक साथ पढ़े जाएं तो अजीब लगते हैं, आदमी, ज़मीन और पैसा भला एक अक्षर की माला में कैसे पिरोए जा सकते हैं? पर ग़ौर करें तो यही तीनों किसी एक हस्ताक्षर के मोहताज होते हैं।
मुझे अपने गांव का वह बूढ़ा किसान याद आता है जो बैंक की कतार में हर बार अंगूठा लगाता, और हर बार उसकी आंखों में वही शर्म तैरती जिसे शब्द नहीं मिलते। एक दिन उसने पूछा था – “मास्टर जी, मेरा नाम कैसा दिखता है?” यह सवाल किसी दर्शनशास्त्र की किताब से बड़ा था। एक आदमी जो सत्तर बरस जी चुका है, उसने कभी अपना नाम आंखों से नहीं देखा, सिर्फ उसकी ध्वनि जानी है। साक्षरता दरअसल इसी फांक को पाटने का नाम है- आवाज़ और आकार के बीच की दूरी को मिटाना।
आंकड़े देखें तो भारत की तस्वीर उलझी हुई लगती है। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के मुताबिक देश की साक्षरता दर अब अस्सी फीसदी के आसपास पहुंच चुकी है, पुरुषों में अठासी और महिलाओं में इक्यासी फीसदी के करीब। यह फासला हर दशक में सिकुड़ता ज़रूर है, पर मिटता नहीं। शहर नब्बे फीसदी पढ़े-लिखे हैं तो गांव सतहत्तर पर अटके हैं। मिज़ोरम अट्ठानबे फीसदी के साथ देश में सबसे आगे खड़ा है, केरल पिछले कई दशकों से इस दौड़ में अव्वल रहा है, जबकि आंध्र प्रदेश और बिहार अब भी पीछे छूटे राज्यों में गिने जाते हैं। दुनिया भर में आज भी करीब चौहत्तर करोड़ युवा और वयस्क अक्षर नहीं पहचानते, और सत्ताईस करोड़ से ज़्यादा बच्चे स्कूल की दहलीज़ तक नहीं पहुंच पाए। यह संख्याएं किसी रिपोर्ट के पन्नों पर सूखी लग सकती हैं, पर इनमें से हर एक अंक किसी न किसी का चेहरा है, जिसे हमने कभी नहीं देखा।
समृद्धि की परिभाषा अक्सर हम रुपए-पैसे से नापते हैं, पर असल समृद्धि उस दिन शुरू होती है जब कोई अपनी दवा की पर्ची पर लिखे अनुदेश खुद पढ़ पाता है, अपने खेत का पट्टा खुद समझ पाता है, अपने बच्चे की मार्कशीट पर लिखे अंक खुद गिन पाता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में एक नई विडंबना भी जन्मी है, पढ़ना-लिखना न आने वाला आदमी अब सिर्फ किताबों से नहीं, क्यूआर कोड से, ओटीपी से, ऐप के भीतर छिपे कोनों से भी बाहर कर दिया गया है। जिस देश में डिजिटल भुगतान क्रांति की बात हर मंच से होती है, वहीं करोड़ों हाथ अब भी सिर्फ अंगूठा लगाना जानते हैं। साक्षरता अब सिर्फ किताब पढ़ने भर की योग्यता नहीं रही, यह एक नागरिक अधिकार बन चुकी है, जिसके बिना बाकी सारे अधिकार अधूरे रह जाते हैं।
पर्यावरण की भाषा में भी यही सच झलकता है – जो समाज पढ़ना जानता है, वही अपनी नदी, अपने जंगल, अपनी हवा के बारे में सवाल पूछ सकता है, चुनौती दे सकता है। अनपढ़ समाज सिर्फ सुनता है, सवाल नहीं करता। इसलिए यह दिन सिर्फ स्कूलों में पट्टी-बस्ता बांटने का उत्सव नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का मौका है कि हर वह हाथ जो सिर्फ अंगूठा लगाता है, उसे कभी न कभी अपना नाम लिखने का हक़ मिलना चाहिए। उस बूढ़े किसान का सवाल आज भी मेरे भीतर गूंजता है, और शायद तभी तक गूंजता रहेगा जब तक हर हाथ अपना नाम खुद लिख न ले।
