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सही वक़्त के इंतज़ार में

कितने सालों के 365 दिन

मैं जिसके लिये खिलती रही

हर रात जिसके लिये महकती रही

करीब रह कर भी निष्ठुर बना रहा वो

किसी कांटे की तरह

“सही वक़्त के इंतज़ार में”

“सही-वक़्त”..??

कब तक कोई इंतेज़ार कर सकता है भला

एक दिन तो किसी ने जुदा करना ही था ,

मेरी अपनी शाख से मुझे

सही वक़्त के इंतेज़ार में वक़्त निकल गया

और मैं निरापद सजा दी गयी

किसी और की कांटे-रहित डाल में

किसी “गैर” के गुलदान में उसका अरमान बनाकर

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