
उस सुबह मैं बस अड्डे पर खड़ा था।
छोटे शहर का बस अड्डा था।
वहीं जहाँ चाय की भाप,धूल,पसीना और इंतज़ार—सब एक ही हवा में घुल जाते हैं।
लाइन लगी हुई थी।
कोई अख़बार पढ़ रहा था।
कोई मोबाइल पर बात कर रहा था।
कोई बस की दिशा में ऐसे देख रहा था जैसे आँखों से ही उसे जल्दी बुला लेगा।
मैं भी उसी लाइन में खड़ा था।
धीरे-धीरे।
चुपचाप।
तभी एक आदमी आया।
वह सीधे लाइन के आगे जाकर खड़ा हो गया।
बस इतना ही हुआ।
कोई धक्का नहीं।
कोई लड़ाई नहीं।
बस वह आगे खड़ा हो गया।
और उसी क्षण मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुल गया।
क्रोध बाहर आया।
उसने मेरी तरफ देखा।
और मुस्कुराया।
“देखा?”उसने कहा।
“तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है।”
मैंने कहा,“शायद उसे जल्दी होगी।”
क्रोध हँसा।
“तुम हमेशा से ऐसे ही हो।
दुनिया तुम्हारे ऊपर चढ़कर चलती है,और तुम कारण खोजते रहते हो।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्रोध ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“सुनो,”उसने कहा,
“यह सिर्फ़ लाइन का मामला नहीं है।
यह सम्मान का मामला है।”
मैंने पूछा,“सम्मान?”
वह बोला,“हाँ।
अगर तुम अभी चुप रहे,तो सब समझेंगे कि तुम कमजोर हो।”
मैंने उस आदमी को फिर देखा।
वह आराम से खड़ा था।
जैसे उसने कोई अपराध नहीं किया।
तभी क्रोध ने अपनी जेब से एक अदृश्य तराज़ू निकाला।
वह हमेशा ऐसा करता है।
वह छोटी-सी घटनाओं को तराज़ू में रखकर उन्हें अपनी बाज़ीगरी से बड़ा बना देता है।
उसने कहा,
“देखो—
यह सिर्फ़ लाइन नहीं है।
यह न्याय है।
यह व्यवस्था है।
यह तुम्हारी गरिमा है।”
मैंने महसूस किया कि मेरा दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा है।
क्रोध ने कहा,
“जाओ।
उसे बोलो—लाइन में लगो।”
मैंने पूछा,“और अगर वह नहीं माने तो?”
क्रोध मुस्कुराया।
“तो फिर…
तुम्हारी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो जानी चाहिए,चेहरा तमतमाना चाहिए।”
उस पल मुझे अचानक एक अजीब बात याद आई।
कहीं पढ़ा था कि मनुष्य का दिमाग दो हिस्सों में काम करता है।
एक हिस्सा सोचता है।
दूसरा तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
क्रोध हमेशा उसी दूसरे तेज़ हिस्से का दोस्त होता है।
वह सोचने का समय नहीं देता।
वह कहता है—
“अभी फैसला करो।”
मैंने फिर उस आदमी को देखा।
वह अब भी बस का इंतज़ार कर रहा था।
जैसे पूरी दुनिया सामान्य हो।
क्रोध ने धीरे से कहा,
“तुम्हें पता है…
दुनिया में सबसे आसान व्यापार क्या है?”
मैंने पूछा,
“क्या?”
वह बोला,
“क्रोध।
क्योंकि इसमें पूँजी नहीं लगती।
बस किसी को थोड़ा-सा अपमान महसूस करा दो।”
मैं कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर मैंने देखा—
मेरे पीछे खड़े लोग भी चुप थे।
किसी ने कुछ नहीं कहा था।
शायद वे भी अपने-अपने मुखौटों से बात कर रहे थे।
तभी बस आ गई।
भीड़ थोड़ी हिली।
वह आदमी भीड़ में गुम हो गया।
लाइन वैसे ही टूट गई जैसे हर बस अड्डे पर टूटती है।
क्रोध ने मेरी तरफ देखा।
“तो तुमने कुछ कहा क्यों नहीं?”
मैंने कंधे उचकाए।
“क्योंकि अब इसकी ज़रूरत नहीं थी।”
क्रोध ने थोड़ी देर मुझे देखा।
फिर बोला,
“तुम्हें पता है…
अगर तुम चाहते तो आज एक छोटी-सी लड़ाई जीत सकते थे।”
मैंने कहा,
“शायद।”
“फिर क्यों नहीं लड़े?”
मैंने बस इतना कहा—
“क्योंकि मैं समझ गया कि तुम क्या बेच रहे थे।”
क्रोध ने पूछा,
“क्या?”
मैंने जवाब दिया—
“तुम न्याय नहीं बेच रहे थे।
तुम अपना माल बेचकर,बदले में बस मेरी शांति खरीदना चाहते थे।”
क्रोध कुछ देर चुप रहा।
फिर वह वापस अपने कमरे में चला गया।
दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया।
बस चल पड़ी।
खिड़की के बाहर शहर पीछे छूट रहा था।
और मैं सोच रहा था—
क्रोध शायद दुनिया का सबसे सफल व्यापारी है।
क्योंकि उसका माल बहुत सस्ता होता है।
और उसकी कीमत बहुत महँगी।
उस दिन मैंने उसका माल नहीं खरीदा।
लेकिन मुझे पता है—
वह फिर आएगा।
क्योंकि मेरे भीतर अभी भी कई कमरे हैं।
और हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है।
—रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
