
बारह अगस्त आते ही सरकारी विज्ञापनों, भाषणों और सामाजिक माध्यमों पर देश में युवाओं की संख्या अचानक बढ़ जाती है। बाकी दिनों में वही युवा अपने कमरे में बैठा नौकरी के आवेदन भरता रहता है ।
युवा दिवस का मौसम बड़ा सुहावना होता है। मंच पर एक विशाल बैनर लगता है – “युवा शक्ति : राष्ट्र की शक्ति।”
नीचे पचास कुर्सियाँ होती हैं। पहली पंक्ति पर वे लोग बैठते हैं जिनकी उम्र मिलाकर शायद युवा शक्ति की परिभाषा बदल सकती है। कार्यक्रम शुरू होता है। मुख्य अतिथि कहते हैं, “आज का युवा बहुत प्रतिभाशाली है।” किनारे खड़ा युवा तालियाँ बजाता है।
मुख्य अतिथि कहते हैं, “आज के युवा में अपार संभावनाएँ हैं।” वही युवा फिर तालियाँ बजाता है।
मुख्य अतिथि कहते हैं, “युवाओं को अवसर देने की आवश्यकता है।” इस बार युवा थोड़ी देर से ताली बजाता है।
उसे लगा शायद अब अवसर का नाम भी बताया जाएगा। लेकिन अवसर वहीं था जहाँ हमेशा रहता है – अगले कार्यक्रम में।
कार्यक्रम के बाद एक युवा ने मंच के पास जाकर पूछा, “सर, नौकरी कहाँ है?”
मुख्य अतिथि मुस्कुराए -“बेटा, तुम बहुत नकारात्मक सोचते हो।”
“लेकिन सर, मैंने तीन साल से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की है।”
“यही तो तुम्हारी समस्या है। तुम्हें पॉज़िटिव होना चाहिए।”
“कैसे होऊँ?”
“स्टार्टअप करो।”
“सर, पैसे?”
“ऋण लो।”
“सर, अगर व्यवसाय नहीं चला?”
“असफलता से मत डरो।”
युवा ने सिर हिलाया।
उसे लगा देश सचमुच बदल रहा है।
पहले बेरोजगारी पर डाँट पड़ती थी, अब उसे प्रेरणा मिल रही थी।
हमारे समय की यह अद्भुत उपलब्धि है कि बेरोजगार युवक को नौकरी न मिले तो उसे उद्यमी घोषित कर दिया जाता है।
जिसके पास दुकान खोलने के पैसे नहीं, वह स्टार्टअप संस्थापक है।
जिसे नौकरी नहीं मिली, वह “फ्रीलांसर” है।
जो दिन भर परीक्षा की तैयारी करता है, वह “अपस्किलिंग” कर रहा है।
जो घर पर बैठा है, वह “वर्क फ्रॉम होम” की संभावनाएँ तलाश रहा है।
शब्दावली ने बेरोजगारी को काफी सुंदर बना दिया है।
युवा भी कम चतुर नहीं है। उसने अपने कमरे में एक मेज पर लैपटॉप रखा है। सामने प्रमाणपत्र हैं। दीवार पर प्रेरक वाक्य चिपका है-“ड्रीम बिग।”
नीचे बिजली का बिल पड़ा है। उसने मोबाइल में एक आवेदन खोला। फॉर्म में पूछा गया , “आपकी अपेक्षित आय?”
उसने कुछ देर सोचा।
फिर आवेदन बंद कर दिया।
कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर मनुष्य नहीं, परिस्थितियाँ देती हैं।
इस बीच परिवार को युवा से बहुत उम्मीद है।
पड़ोसी को उससे भी अधिक।
रिश्तेदार तो उसके भविष्य पर पूरी शोध कर चुके हैं।
कहाँ तक पहुँची तैयारी?” यह भारतीय समाज का सबसे लोकप्रिय प्रश्न है।
युवा कहता है, “अभी चल रही है।” याने वो कहना चाह रहा है कि वह तो लगातार दौड़ रहा है, लेकिन मंजिल है कि मंज़िल अपना पता बदल लेती है। हमने युवाओं को प्रतियोगिताओं में इतना प्रशिक्षित कर दिया है कि अब उन्हें लगता है जीवन भी एक परीक्षा है।
युवा दिवस पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि युवा केवल रोजगार की मशीन नहीं है। वह प्रेम करता है, कविता लिखता है, यात्रा करना चाहता है, दुनिया देखना चाहता है, असफल होना चाहता है, अपनी गलतियाँ करना चाहता है। लेकिन हमारी व्यवस्था उसे पहले सफल होना सिखाती है, फिर जीना। शायद इसीलिए आज का युवा बहुत कुछ जानता है, बहुत कुछ देखता है, बहुत कुछ कर सकता है, बस कभी-कभी उसे यह समझ नहीं आता कि वह आखिर किसके लिए इतना सब कर रहा है।
फिर बारह अगस्त आता है। मंच सजता है। माइक चालू होता है। बैनर चमकता है – “युवा ही राष्ट्र का भविष्य है।”
युवा इस बार तालियाँ नहीं बजाता। वह चुपचाप मोबाइल निकालता है और नौकरी की वेबसाइट खोलता है। क्योंकि उसे भाषण नहीं चाहिए। उसे बस यह देखना है कि “भविष्य” नाम की उस नौकरी की कोई वेकेंसी निकली है या नहीं।
रविकान्त राऊत
जबलपुर मध्यप्रदेश
