कल्पना कीजिए एक ऐसा घर, जिसे बिजली दो पड़ोसियों से मिलती है – एक सस्ती लेकिन विवादित, दूसरी महंगी लेकिन ‘सम्मानजनक’। अब वह पड़ोसी जो महंगी बिजली बेचता है, धमकी देता है कि सस्ती बिजली लेना बंद करो, वरना घर का सामान बाज़ार में बेचने नहीं दूंगा। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि पिछले हफ़्ते अमेरिकी संसद में पारित हुए एक क़ानून ने भारत के सामने ठीक यही स्थिति खड़ी कर दी है।
17 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 262 के मुक़ाबले 159 वोटों से ‘सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ पारित कर दिया। सीनेट पहले ही अगस्त में इसे 86-11 के भारी बहुमत से पास कर चुकी थी। अब यह क़ानून राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर का इंतज़ार कर रहा है। इसका सबसे तीखा प्रावधान यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस ख़रीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार मिल जाएगा। इस सूची में भारत और चीन सबसे ऊपर हैं। भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय हित में फ़ैसला लेने का अधिकार रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अधिकार अब सिर्फ़ काग़ज़ी बयान बनकर रह गया है, या भारत के पास इसे बरक़रार रखने की असली ताक़त भी है?
यही वह असली सवाल है जो इस पूरे प्रकरण के पीछे छिपा है — क्या रणनीतिक स्वायत्तता, यानी अपनी विदेश नीति ख़ुद तय करने की आज़ादी, आज के आपस में गुंथे हुए आर्थिक संसार में एक व्यावहारिक नीति रह गई है, या यह अब सिर्फ़ एक भावनात्मक नारा बनकर रह गया है जिसे बड़ी ताक़तों के दबाव में झुकना पड़ता है? यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इसका जवाब सिर्फ़ रूस से तेल ख़रीदने या न ख़रीदने तक सीमित नहीं है – यह तय करेगा कि आने वाले दशकों में भारत दुनिया में किस हैसियत से खड़ा होगा।
इस बहस को समझने के लिए थोड़ा पीछे लौटना ज़रूरी है। भारत की विदेश नीति का पूरा इतिहास ही इस तनाव पर टिका रहा है — शीत युद्ध के दौर में नेहरू का गुटनिरपेक्ष आंदोलन, 1971 में सोवियत संघ के साथ मित्रता संधि, और 1991 के बाद अमेरिका की ओर धीरे-धीरे झुकाव। हर दौर में भारत ने यह दावा किया कि वह किसी एक खेमे का पिछलग्गू नहीं बनेगा। लेकिन हर दौर में यह भी सच रहा कि यह स्वतंत्रता तभी तक चली जब तक बड़ी शक्तियों को उससे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता था। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस संतुलन को पहली बार इतनी बुरी तरह हिलाया है कि अब यह सिद्धांत की नहीं, नीतिगत अस्तित्व की लड़ाई बन गई है।
आंकड़े इस दुविधा की गहराई साफ़ दिखाते हैं। वित्त वर्ष 2026 में रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा जुटा चुका है – युद्ध शुरू होने से पहले यह आंकड़ा दो प्रतिशत से भी कम था। छूट पर मिलने वाले इस तेल ने भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की है और महंगाई को क़ाबू में रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। दूसरी तरफ़ अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है – कपड़ा, रत्न-आभूषण, दवाइयाँ और आईटी सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा वहीं जाता है। ट्रंप प्रशासन पहले ही इस साल की शुरुआत में भारतीय सामान पर टैरिफ़ को दस से पचास प्रतिशत तक बढ़ा चुका है, और अब सौ प्रतिशत तक की धमकी सामने है। यानी एक तरफ़ ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई पर नियंत्रण है, दूसरी तरफ़ लाखों निर्यातकों की रोज़ी-रोटी और डॉलर की कमाई। यह कोई सीधा गणित नहीं है जिसे एक झटके में सुलझाया जा सके।
और यहीं यह मामला इतना उलझा हुआ हो जाता है। अगर भारत रूसी तेल छोड़ भी दे, तो वैकल्पिक आपूर्ति – खाड़ी देशों या अमेरिका से – तुरंत उतनी सस्ती नहीं मिलेगी, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। दूसरी ओर, अगर भारत झुकता नहीं और अमेरिका सच में सौ प्रतिशत टैरिफ़ लगा देता है, तो निर्यात उद्योग में लाखों नौकरियाँ ख़तरे में पड़ सकती हैं, ख़ासकर सूरत के हीरा कारोबार, तिरुपुर के कपड़ा उद्योग और छोटे-मंझोले निर्यातकों में। दोनों रास्तों की क़ीमत आम नागरिक को ही चुकानी है, चाहे वह पेट्रोल पंप पर हो या फैक्ट्री की तनख़्वाह में।
इस पूरे मसले को सिर्फ़ ‘अमेरिका बनाम भारत’ के चश्मे से देखना भी ईमानदार नहीं होगा। अमेरिकी पक्ष का तर्क यह है कि रूस जिस युद्ध को यूक्रेन में लड़ रहा है, उसका बड़ा हिस्सा तेल-गैस की कमाई से ही चल रहा है, और जो देश छूट पर यह तेल ख़रीद रहे हैं, वे परोक्ष रूप से उस युद्ध को लंबा खींचने में मदद कर रहे हैं। यह तर्क नैतिक रूप से पूरी तरह ग़लत नहीं ठहराया जा सकता। यह भी दिलचस्प है कि विधेयक पर वोटिंग में पार्टी लाइन साफ़ नहीं थी — कई डेमोक्रेट सांसदों ने इसका विरोध किया, जबकि भारतीय मूल के सांसद राजा कृष्णमूर्ति समेत कुछ ने समर्थन किया। यानी यह मामला अमेरिका के भीतर भी उतना सीधा नहीं है जितना बाहर से दिखता है। साथ ही यह भी सच है कि अमेरिका ख़ुद रूस से यूरेनियम और कुछ अन्य उत्पाद ख़रीदना जारी रखे हुए है, जिससे यह आरोप लगना स्वाभाविक है कि यह क़ानून सिद्धांत से ज़्यादा सौदेबाज़ी का हथियार है।
यहीं वह जगह है जहाँ मुझे लगता है कि भारत की असली परीक्षा शुरू होती है। स्वतंत्र विदेश नीति का दावा करना आसान है, उसे बनाए रखना कठिन। असली रणनीतिक स्वायत्तता किसी एक पल में लिए गए साहसी फ़ैसले से नहीं आती, बल्कि वर्षों पहले की गई तैयारी से आती है। अगर भारत ने पिछले तीन-चार वर्षों में ऊर्जा के स्रोत सच में विविध किए होते, अपने निर्यात बाज़ारों को यूरोप, आसियान और खाड़ी देशों तक और गहराई से फैलाया होता, और अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमता को इतना मज़बूत किया होता कि किसी एक बाज़ार पर निर्भरता कम हो, तो आज यह धमकी उतनी असरदार नहीं होती। सच यह है कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारे जितनी तेज़ी से गूंजे, उतनी गहराई से ज़मीन पर नहीं उतरे। स्वायत्तता कोई भावना नहीं, एक बुनियादी ढांचा है – और वह ढांचा खड़ा करने में अभी काफ़ी काम बाक़ी है।
इसका असर सिर्फ़ आज के तेल या टैरिफ़ तक सीमित नहीं रहेगा। यह घटना आने वाले वर्षों के लिए एक मिसाल बनेगी कि बहुध्रुवीय होती दुनिया में मझोली ताक़तें – भारत जैसे देश – किस तरह बड़ी शक्तियों के बीच अपनी जगह तय करेंगी। अगर भारत इस दबाव में झुक जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि आर्थिक निर्भरता के आगे संप्रभुता की बात सिर्फ़ भाषण तक सीमित है। और अगर भारत बिना तैयारी के अड़ जाता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिक को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। असली सयानापन इन दोनों के बीच का रास्ता खोजने में है – बातचीत की मेज़ पर मज़बूती से खड़े रहना, लेकिन साथ ही उस मज़बूती को सच में सहारा देने वाली आर्थिक बुनियाद पर भी उतनी ही गंभीरता से काम करना।
टैरिफ़ की यह लड़ाई शायद कुछ हफ़्तों या महीनों में किसी समझौते पर ख़त्म हो जाए, जैसा कूटनीति में अक्सर होता है। लेकिन जो सवाल यह घटना पीछे छोड़ जाएगी, वह उतनी आसानी से ख़त्म नहीं होगा - क्या हम एक ऐसी अर्थव्यवस्था और विदेश नीति बना रहे हैं जो सच में अपने फ़ैसले ख़ुद ले सके, या हम हर कुछ वर्षों में किसी नई महाशक्ति की शर्तों पर अपनी स्वतंत्रता का मोल-भाव करते रहेंगे? इसका जवाब किसी संसद में पारित होने वाले बिल से नहीं, बल्कि भारत अपने भीतर आज से क्या तैयारी शुरू करता है, उससे तय होगा। रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243
