
आज मैंने जो मुखौटा पहना है, उसका नाम है—सफलता का कैदी। सुबह के अख़बार में मेरा नाम छपा था। राज्य सेवा परीक्षा की चयनित अभ्यर्थियों की सूची में मेरा नाम था। घर में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं। फोन लगातार बज रहा था—”बधाई हो!”, “हम जानते थे तुम कर लोगे!”, “अब तो ज़िंदगी सेट है!” हर आवाज़ में उत्साह था, हर शब्द में एक निश्चितता। मैं मुस्कुरा रहा था—वही मुस्कान, जो ऐसे मौकों पर पहनी जाती है। तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला। वह बाहर आई—सफलता। उसने बहुत महंगे कपड़े पहने थे। चेहरे पर एक स्थिर, भारी-सी शांति थी। वह मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गई। “बधाई हो,” उसने कहा। मैंने सिर हिलाकर धन्यवाद दिया। कुछ क्षण तक वह मुझे देखती रही, फिर बोली—”तो… अब कैसा लग रहा है?” मैंने कहा, “अच्छा…”, लेकिन शब्द अधूरा रह गया। वह मुस्कुराई—”अजीब है ना? तुमने सालों तक इस दिन का इंतज़ार किया। सोचा था, जब यह मिलेगा तब सब ठीक हो जाएगा… और अब?” मैं चुप रहा। उसने कमरे में नज़र दौड़ाई। दीवार पर वही पुराने पोस्टर थे। मेज़ पर वही किताबें। बस एक चीज़ बदली थी—अब मुझे उन किताबों की ज़रूरत नहीं थी। उसने कहा, “तुम जानते हो सबसे दिलचस्प बात क्या है? लोग सोचते हैं कि मैं दरवाज़ा खोलती हूँ, पर सच यह है… मैं सिर्फ़ एक कमरे से दूसरे कमरे में ले जाती हूँ।” तभी मुझे महसूस हुआ कि कुछ भी नहीं बदला था। बस खेल का स्तर बदल गया था।
फोन फिर बजा—”अब आगे क्या?”, “पोस्टिंग कहाँ लोगे?”, “आगे की योजना क्या है?” मैंने फोन काट दिया। सफलता ने कहा—”देखा? खेल खत्म नहीं हुआ।” मैंने धीरे से पूछा—”तो क्या मैं अब भी… उसी दौड़ में हूँ?” वह मुस्कुराई—”अब तुम दौड़ में नहीं हो… अब तुम ट्रैक का हिस्सा हो।” मैंने खिड़की से बाहर देखा। सड़क वही थी, लोग वही थे, बस इस बार मैं अलग महसूस कर रहा था। तभी मेरी नज़र मेज़ पर रखे एक काग़ज़ पर गई। वह मेरा पुराना रिपोर्ट कार्ड था, जिस पर लिखा था—’अनुत्तीर्ण’। मैं उसे कुछ देर तक देखता रहा। सफलता ने पूछा—”क्या देख रहे हो?” मैंने कहा—”यह… जब मैं असफल था।” उसने पूछा—”और अब?” मैंने वह काग़ज़ वापस मेज़ पर रख दिया और कहा—”अब मैं सफल हूँ… लेकिन फर्क उतना बड़ा नहीं है जितना मैंने सोचा था।” उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी। वह बोली—”यही मेरा रहस्य है।” मैंने पूछा—”क्या?” उसने उत्तर दिया—”मैं मंज़िल नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ एक और शुरुआत हूँ।”
कमरे में चुप्पी फैल गई। सफलता उठी और अपने कमरे की ओर जाने लगी। दरवाज़े पर रुककर उसने पीछे मुड़कर कहा—”याद रखना… लोग मुझे पाने के लिए सब कुछ दे देते हैं। लेकिन जब मैं मिल जाती हूँ, तो उन्हें समझ आता है कि उन्होंने मुझे पाने के लिए जो खोया था, उसका हिसाब तो किसी सूची में नहीं था।” दरवाज़ा बंद हो गया। मैं कुर्सी पर बैठा रहा। फोन फिर बजा, लेकिन मैंने नहीं उठाया। मैंने खिड़की से बाहर देखा, फिर मेज़ पर रखा वह एडमिट कार्ड उठाया। एक तरफ़ ‘अनुत्तीर्ण’ था, दूसरी तरफ़ आज का अख़बार, जिसमें मेरा नाम छपा था। दोनों काग़ज़ मेज़ पर साथ रखे थे। और पहली बार मुझे लगा—मैं उन दोनों के बीच कहीं बैठा हूँ। शायद यही सफलता का सच है। वह तुम्हें ऊपर नहीं ले जाती, वह बस तुम्हें एक ऐसी जगह खड़ा कर देती है, जहाँ से तुम्हें फिर पूछना पड़ता है—”अब आगे क्या?” और उसी क्षण मुझे समझ आया—सफलता दरअसल एक इनाम नहीं है, वह एक नया प्रश्न है।
_रविकान्त राऊत
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243


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