शनिवार की शाम मेरे लिए चाय की शाम होती है। घर से थोड़ी दूर सड़क के किनारे एक छोटी-सी चाय की टपरी है। टीन की छत, लकड़ी की दो-तीन बेंचें और सामने उबलती चाय की केतली से उठती भाप। शहर की भागती हुई शाम के बीच वह जगह मुझे हमेशा थोड़ी देर ठहरने का बहाना देती है।
उस दिन भी मैं वहीं पहुंचा। लेकिन उस शाम मेरी नजर सबसे पहले चाय पर नहीं, टपरी के कोने में बैठे दो चेहरों पर गई। दोनों चुप थे। दोनों के सामने चाय के गिलास रखे थे, लेकिन दोनों की चाय ठंडी हो चुकी थी। एक को मैं करीब दस वर्षों से जानता था। पास के एक बड़े गोदाम में चौकीदार था। दुबला-पतला, हमेशा साफ कपड़े पहनने वाला आदमी। दस साल से उसी गोदाम की रातें उसकी थीं। दूसरा करीब डेढ़ साल पहले वहां बैठने लगा था। गांव से आया था और शहर के एक संपन्न परिवार के बुजुर्ग की देखभाल करता था। दादा जी के उठने-बैठने से लेकर दवा, खाना, टहलना- सब उसकी जिम्मेदारी थी।
मैंने पास जाकर पूछा – “क्या हुआ? आज दोनों इतने उदास क्यों बैठे हो?” गोदाम वाला कुछ देर चुप रहा। फिर बोला – “साहब, बड़े मालिक गुजर गए।” मैंने कहा – “अरे… यह तो दुख की बात है। लेकिन तुम इतने परेशान क्यों हो?” उसने फीकी हंसी हंसी। “मालिक के गुजरने का दुख तो है ही साहब… लेकिन अब असली चिंता अपनी है।”
“अब उनके लड़के धंधा संभाल रहे हैं।” वह थोड़ा रुका। “लड़कों ने कहा है, दस साल से यहां चौकीदारी कर रहा है। दस साल में क्या हुआ? कोई चोरी हुई? कोई घटना हुई? कुछ नहीं। फिर इसकी जरूरत ही क्या है?”
मैं चुप रहा। वह आगे बोला – “एक महीने का नोटिस दे दिया है। कहा है, कोई दूसरा काम ढूंढ लो।” उसने अपनी हथेलियों को देखा – “साहब, इस उमर में मैं कहां जाऊंगा?” उसका आखिरी वाक्य जैसे हवा में लटक गया। मैंने उसकी ओर देखा। फिर दूसरे आदमी की ओर। वह भी उदास था। मैंने पूछा – “और तुम्हें क्या हुआ?” उसने सिर उठाया। आंखों में शिकायत थी, लेकिन उससे बड़ी निराशा – “साहब, मैं गांव से आया था। बहुत जरूरत थी काम की। इन लोगों ने दादा जी की देखभाल के लिए रखा। मैंने पूरी लगन से काम किया।”
“दादा जी कैसे हैं?”
“अब तो पहले से बहुत अच्छे हैं। पहले खुद उठ नहीं पाते थे। खाना भी किसी को खिलाना पड़ता था। अब खुद उठते हैं, चलते हैं, खाना खाते हैं। अपने छोटे-मोटे काम खुद कर लेते हैं।” उसके चेहरे पर एक क्षण के लिए गर्व आया। फिर वही गर्व बुझ गया – “लेकिन परसों मैंने घरवालों को बात करते सुना।”
“क्या?”
“कह रहे थे – दादा जी तो अब बिल्कुल ठीक हो गए हैं। अब इस आदमी की क्या जरूरत? खामखा का बोझ है। एक महीने की तनख्वाह दे दो और नौकरी खत्म करो।” वह मेरी ओर देखने लगा – “साहब… मैंने तो यही सोचा था कि दादा जी ठीक हो गए, यही मेरे काम की सबसे बड़ी तारीफ है।” उसकी आवाज भर्रा गई – “लेकिन अब लग रहा है कि मैंने दादा जी को ठीक करके अपना ही काम खत्म कर दिया।”
मैंने दोनों को देखा। एक आदमी इसलिए निकाला जा रहा था क्योंकि दस साल में कोई चोरी नहीं हुई थी। दूसरे को इसलिए निकाला जा रहा था क्योंकि जिस बूढ़े को वह संभाल रहा था, वह स्वस्थ हो गया था।
मैंने चाय वाले से कहा – “भाई, दो चाय और देना।” गरम चाय के दो गिलास उनके हाथ में रखते हुए मैंने कहा – “चलो, आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं।” दोनों मेरी ओर देखने लगे। मैंने कहना शुरू किया।
बहुत पुराने समय की बात है। उस जमाने में बड़े व्यापारिक जहाज लकड़ी के बने होते थे। ऐसे ही एक बड़े जहाज पर एक बूढ़ा कारीगर काम करता था। उसकी उम्र काफी हो चुकी थी, लेकिन उसकी आंखें अब भी समुद्र की तरह चौकन्नी थीं। वह जहाज पर पिछले बीस वर्षों से था। उसका काम था – जहाज को सुरक्षित रखना — ‘प्रिवेंटिव-मैंटेनेंस’ — जहाज के ‘हल’ से होने वाले किसी भी रिसाव को समय रहते रोकना और किसी भी बड़े हादसे की आशंका को शून्य रखना। बस इतना ही। न कोई बड़ा पद। न कोई चमकदार वर्दी। न कोई विशेष सम्मान।
वह दिन-रात जहाज के कोनों में घूमता रहता। कहीं लकड़ी में महीन दरार दिखी- मरम्मत। कहीं तख्ते के जोड़ से पानी की एक बूंद रिसती मिली- मरम्मत। कहीं कील ढीली दिखी- ठोक दी। कहीं लकड़ी कमजोर लगी- बदल दी। वह छोटी-छोटी खराबियों को बड़ी दुर्घटनाओं में बदलने से पहले ही ठीक कर देता था। बीस साल गुजर गए। जहाज समुद्र में निर्बाध चलता रहा। न कोई बड़ा हादसा हुआ। न जहाज डूबा। न किसी यात्री की जान गई। लेकिन जहाज पर किसी को यह बात असाधारण नहीं लगती थी। क्योंकि कोई हादसा हुआ ही नहीं था।
एक दिन जहाज पर नया कप्तान आया। उसने बूढ़े कारीगर को देखा – “यह कौन है?” किसी ने बताया – “बीस साल से जहाज में मरम्मत का काम करता है।” कप्तान ने पूछा – “बीस साल में इसने किया क्या?” जवाब मिला – “कुछ खास नहीं।” कप्तान हंसा – “यही तो समस्या है। बीस साल में कुछ खास नहीं किया और वेतन लेता रहा!”
बूढ़े कारीगर को बुलाया गया। उसे कहा गया कि अब उसकी जरूरत नहीं है। उसकी जगह एक नया मिस्त्री रख लिया गया। जवान था। उतना सतर्क भी नहीं और ज़िम्मेदार भी नहीं था पर उसकी सबसे बड़ी बात – वो जो भी करता ऐसा करता कि वो काम सबको दिखाई दे।
कुछ ही महीने बाद समुद्र में भयंकर तूफान आया। ऊंची-ऊंची लहरें जहाज से टकराने लगीं। अचानक एक जोरदार लहर ने जहाज के पिछले हिस्से की लकड़ी का एक बड़ा तख्ता उखाड़ दिया। जहाज में पानी घुसने लगा। अफरा-तफरी मच गई। नया मिस्त्री दौड़ा। उसे कुछ समझ में नहीं आया आनन-फ़ानन में उसने लकड़ी का पट्टा उठाया, कीलें ठोंकीं और किसी तरह छेद बंद किया। जहाज बच गया। कप्तान ने राहत की सांस ली, फिर उसने उस जवान मिस्त्री को गले लगा लिया – “शाबाश! आज तुमने जहाज बचा लिया।”
उसकी पदोन्नति हुई। वेतन बढ़ा। सबने उसकी तारीफ की। कहा गया – “देखो, काम इसे कहते हैं!” किसी ने यह नहीं पूछा कि अगर जहाज में बीस साल से लगातार छोटी-छोटी दरारें भरने वाला वह बूढ़ा कारीगर न रहा होता, तो क्या यह जहाज आज तक समुद्र में सुरक्षित रहता? किसी ने यह नहीं पूछा कि जिसने बीस साल तक हादसा होने ही नहीं दिया, उसका काम दिखाई क्यों नहीं दिया? और जिसने एक हादसे को, जो कि यूं भी सतत सतर्कता से टाला जा सकता था, आखिरी क्षण में संभाल लिया, उसका काम इतना बड़ा क्यों हो गया?
जब बूढ़े कारीगर को यह बात पता चली, तो वह देर तक चुप रहा। फिर बस इतना बोला – “अपना-अपना भाग्य है।”
मैंने कहानी खत्म की। दोनों आदमी चुप बैठे थे। उनकी चाय कब खत्म हो गई, उन्हें पता ही नहीं चला। मैं भी उठ गया। हम तीनों अपने-अपने घर चले गए।
अगला शनिवार आया। मैं उसी समय चाय की टपरी पर पहुंचा। इस बार दोनों पहले से वहां बैठे थे लेकिन पिछले शनिवार के दो उदास चेहरों की जगह आज दो मुस्कुराते चेहरे थे। मैंने बैठते ही पूछा – “क्या हुआ? आज तो दोनों बड़े खुश दिखाई दे रहे हो?”
गोदाम वाले ने हंसकर कहा – “साहब, लगता है बूढ़े कारीगर की कहानी सच निकली।” मैंने पूछा – “कैसे?” वह बोला – “इसी हफ्ते की बात है।” उसने थोड़ा आगे झुककर कहा – “रात को गोदाम की पिछली दीवार के पास कुछ चोर घुसने की कोशिश कर रहे थे। शटर के ताले तोड़ रहे थे।”
“फिर?”
“आवाज सुनकर मैं दौड़ा। उनके पीछे भागा। भागते-भागते मेरा पैर किसी चीज में फंस गया और मैं गिर पड़ा।” वह हंस दिया – “चोट भी लगी।”
“चोर पकड़े?”
“नहीं। लेकिन मेरी आवाज सुनकर भाग गए।” फिर उसका चेहरा खिल गया – “सुबह जब मालिकों को पता चला तो उन्होंने कहा- अच्छा हुआ तुम थे। उन्होंने कहा कि तुमने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। मेरी तनख्वाह बढ़ा दी और बोले – अब तुम्हें नौकरी से कोई नहीं निकालेगा।”
मैं मुस्कुराया। फिर मेरी नजर दूसरे आदमी पर गई। “और तुम्हारी खुशी का राज़ ?”
वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला – “साहब, चार दिन पहले की बात है, मैं दादा जी को नीचे बगीचे में टहला रहा था। वापस ऊपर ला रहा था। सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि अचानक उनका पैर फिसल गया।”
उसका चेहरा गंभीर हो गया – “वह तीन-चार सीढ़ियां नीचे लुढ़क गए।” “मैंने दौड़कर उन्हें संभाला।” उसने धीरे से कहा – “उनके पैर की हड्डी टूट गई।”
“फिर?” “मैंने उन्हें उठाया। डॉक्टर को बुलाया। अस्पताल ले गए। प्लास्टर हुआ।” वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर मुस्कुराया। “घर वालों ने कहा – अगर आज तुम वहां नहीं होते तो शायद दादा जी की जान भी जा सकती थी।” उसने मेरी ओर देखा। “उन्होंने कहा कि अब उन्हें समझ में आया कि मैं कितने काम का हूं।”
मैंने पूछा – “फिर?” वह हंस पड़ा – “वे बोले कि तुम नौकरी नहीं छोड़ोगे। दादा जी को अभी तुम्हारी बहुत जरूरत है।”
कुछ देर हम तीनों चुप रहे। चाय की भाप हमारे बीच उठ रही थी। मैंने दोनों के चेहरों को देखा। उनकी आंखों में शरारत थी और मेरे लिये सम्मान का भाव भी। टपरी से उठते हुए मेरे मन में बस एक बात आई – उपयोगी होना और ‘उपयोगिता जताना’ – दो अलग बातें हैं। क्योंकि जो दिखता है, वही बिकता है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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