जिस देश में हज़ारों गाँवों के स्कूलों में आज भी बिजली कभी आती है कभी चली जाती है, जहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज से निकले लाखों नौजवान हर साल अपनी डिग्री के अनुरूप कोई नौकरी न मिलने पर सरकारी क्लर्क की परीक्षा की कतार में लग जाते हैं, उसी देश की सरकार अब दुनिया को चिप्स बेचने का सपना दिखा रही है। बात हवाई नहीं है। दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण का बजट 8 अरब डॉलर से बढ़ाकर 13.5 अरब डॉलर करने का ऐलान किया। पाँचवें संस्करण के इस आयोजन में 600 से ज़्यादा कंपनियाँ, 52 देशों के 400 से अधिक शीर्ष अधिकारी शामिल हुए, और मंच से यह भी घोषणा हुई कि सूरत में सूचि सेमीकंडक्टर और मोहाली में सीडीआईएल नाम के दो नए कारखाने अब व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर चुके हैं। नारा दिया गया — “सिलिकॉन से सिस्टम तक: एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण।”
यह ख़बर उत्साहजनक है, और होनी भी चाहिए। लेकिन इसके पीछे जो असली सवाल छुपा है, वह घोषणा की चमक से कहीं ज़्यादा गहरा है – क्या यह अरबों डॉलर का निवेश उस आम भारतीय युवा तक पहुँचेगा जो आज बेरोज़गारी की सबसे बड़ी कीमत चुका रहा है, या यह फिर एक ऐसी औद्योगिक क्रांति बनकर रह जाएगी जिसका फ़ायदा मुट्ठी भर कुशल इंजीनियरों, बड़ी कंपनियों और चुनिंदा राज्यों तक सिमट जाएगा?
चिप यानी सेमीकंडक्टर आज की दुनिया में वही जगह रखती है जो कभी तेल रखता था। मोबाइल फ़ोन से लेकर मिसाइल तक, कार से लेकर एटीएम मशीन तक — हर जगह चिप है, और भारत इसका लगभग पूरा हिस्सा आयात करता है। कोविड के दौर में जब वैश्विक आपूर्ति शृंखला टूटी और चिप की कमी से गाड़ियों के कारखाने महीनों बंद पड़े रहे, तभी भारत समेत कई देशों को एहसास हुआ कि यह सिर्फ़ एक इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्ज़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता का सवाल है। ताइवान की एक ही कंपनी दुनिया की सबसे उन्नत चिप्स का बड़ा हिस्सा बनाती है, और चीन-ताइवान तनाव किसी भी दिन इस आपूर्ति को ठप कर सकता है। इसी असुरक्षा से अमेरिका, जापान, यूरोप और भारत – सबने अपने-अपने चिप मिशन शुरू किए। भारत का पहला चरण 2021 में शुरू हुआ था, आठ अरब डॉलर के साथ, और अब चार-पाँच साल में यह आँकड़ा दोगुने से भी ज़्यादा हो चुका है।
लेकिन यहीं से सावधानी की ज़रूरत शुरू होती है, क्योंकि भारत के पास बड़ी घोषणाओं का एक पुराना इतिहास है जो ज़मीन पर उतरते-उतरते अक्सर धीमा पड़ जाता है। “मेक इन इंडिया” से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर तक, कई योजनाएँ कागज़ पर जितनी बड़ी दिखीं, ज़मीन पर उतनी ही धीमी साबित हुईं। सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन एक ऐसा उद्योग है जिसकी माँगें असाधारण हैं -चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली, अल्ट्रा-प्योर पानी की भारी मात्रा, धूल-कण रहित क्लीनरूम, विशेष गैसें, और सटीक तापमान नियंत्रण। एक आधुनिक फैब में पानी की खपत किसी मंझोले शहर की रोज़ की ज़रूरत के बराबर हो सकती है। भारत के जिन राज्यों में ये कारखाने लग रहे हैं – गुजरात, पंजाब, असम, उत्तर प्रदेश – वहाँ बिजली और पानी की आपूर्ति पहले से ही खेती और आम नागरिकों की ज़रूरतों से जूझ रही है। ज़मीन का अधिग्रहण एक विभाग के हाथ में है, बिजली दूसरे के, पानी तीसरे के, पर्यावरण मंज़ूरी चौथे के, और कुशल कामगार तैयार करने की ज़िम्मेदारी शिक्षा और कौशल विकास मंत्रालयों की – यह प्रशासनिक बिखराव किसी भी बड़ी परियोजना की रफ़्तार को धीमा करने के लिए काफ़ी है।
रोज़गार का सवाल तो और भी पेचीदा है। सरकार का दावा है कि दूसरे चरण से एक लाख कुशल तकनीशियन, क्लीनरूम कर्मी और फ़ैक्ट्री-फ़्लोर कामगार सीधे तौर पर नियुक्त होंगे, और उद्योग जगत के अनुमान कहते हैं कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मिलाकर यह आँकड़ा डेढ़ से दो लाख तक जा सकता है। सुनने में यह बड़ी संख्या लगती है, लेकिन इसे भारत के हर साल श्रम बाज़ार में उतरने वाले करोड़ों युवाओं के पैमाने पर रखकर देखिए तो यह सागर में एक बूँद जैसा दिखता है। सेमीकंडक्टर उद्योग पूँजी-प्रधान है, श्रम-प्रधान नहीं – यानी यहाँ अरबों डॉलर का निवेश होता है, लेकिन नौकरियाँ उस अनुपात में पैदा नहीं होतीं जितनी कपड़ा, निर्माण या खेती जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में होती हैं। और जो नौकरियाँ बनेंगी भी, उनके लिए पॉलिटेक्निक और आईटीआई स्तर पर विशेष प्रशिक्षित कामगार चाहिए, जो आज देश के ज़्यादातर सरकारी आईटीआई में उपलब्ध बुनियादी ढाँचे और पाठ्यक्रम से मेल नहीं खाता। यानी नौकरियाँ भले भारत में बनें, उन्हें भरने वाला कुशल हाथ अभी तैयार नहीं है – और यह ख़ाई पाटने में सालों लगेंगे।
फिर भी इस तस्वीर को सिर्फ़ निराशा के चश्मे से देखना भी ईमानदारी नहीं होगी। आलोचकों की बात अपनी जगह सही है, पर आशावादियों का पक्ष भी उतना ही ठोस है। यह पहली बार है कि भारत की धरती पर बने कारखाने – सूरत और मोहाली वाले – व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर चुके हैं और असेंबली-टेस्टिंग से आगे बढ़कर असली फैब्रिकेशन की दिशा में कदम बढ़ रहा है। दूसरे चरण में विदेशी कंपनियों को भारतीय स्टार्टअप्स और डिज़ाइन हाउसों के साथ साझेदारी की छूट दी गई है, जिससे 200 नई चिप-डिज़ाइन स्टार्टअप कंपनियाँ बनाने का लक्ष्य रखा गया है – और डिज़ाइन ही वह क्षेत्र है जहाँ भारत का सॉफ्टवेयर-इंजीनियरिंग कौशल पहले से मज़बूत है। बड़ी वैश्विक कंपनियाँ अब सिर्फ़ आउटसोर्सिंग के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी के इरादे से भारत आ रही हैं। यह निवेश आगे चलकर सड़क, बिजली ग्रिड, जलापूर्ति और स्थानीय शिक्षा ढाँचे में भी सुधार खींच लाता है, भले उसकी रफ़्तार धीमी हो। और सबसे बड़ी बात – किसी भी दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता की नींव एक दिन में नहीं, दशकों में पड़ती है। दक्षिण कोरिया और ताइवान ने भी अपने चिप उद्योग को खड़ा करने में तीस-चालीस साल लगाए थे, वह भी तब जब उनके पास आज के भारत जितनी वैश्विक भू-राजनीतिक हवा अनुकूल नहीं थी।
मेरी अपनी राय इन दोनों पक्षों के बीच के किसी सरल समाधान में नहीं, बल्कि एक स्पष्ट माँग में है — सरकार को यह निवेश ज़रूर करना चाहिए, क्योंकि चिप-निर्भरता से मुक्ति भारत की आर्थिक और रणनीतिक संप्रभुता के लिए अनिवार्य है, लेकिन उसे जनता से ईमानदार भाषा में बात करनी होगी। यह घोषणा तुरंत रोज़गार की सुनामी नहीं लाएगी, यह मिशन अगले दस-पंद्रह साल की तैयारी है, और इसकी असली परीक्षा किसी उद्घाटन समारोह में नहीं बल्कि इस बात में होगी कि क्या हर राज्य में बिजली-पानी की योजना समय से पूरी होती है, क्या आईटीआई और पॉलिटेक्निक पाठ्यक्रम फैब्रिकेशन की ज़रूरतों के हिसाब से समय रहते बदले जाते हैं, और क्या ज़मीन-बिजली-पानी-पर्यावरण की मंज़ूरियाँ एक ही खिड़की से मिलने लगती हैं। घोषणाओं की चमक आसान होती है, क्रियान्वयन की मेहनत कठिन – और भारत का आधुनिक इतिहास यही सिखाता है कि दोनों के बीच की खाई में ही ज़्यादातर बड़े सपने दम तोड़ देते हैं।
इसका असर सिर्फ़ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। अगर यह मिशन सचमुच सफल हुआ, तो यह भारत के युवाओं की आकांक्षाओं की दिशा ही बदल सकता है – इंजीनियरिंग पढ़ने वाला हर तीसरा छात्र जो आज कोडिंग या सिविल सेवा की तरफ़ भागता है, कल हार्डवेयर और चिप-डिज़ाइन को भी उतनी ही गंभीरता से देख सकता है। और अगर यह असफल हुआ, या आधा-अधूरा रह गया, तो यह सिर्फ़ एक और योजना की नाकामी नहीं बल्कि उस भरोसे को और कमज़ोर करेगा जो नागरिक बड़ी सरकारी घोषणाओं पर बचाकर रखते हैं।
चिप बहुत छोटी होती है - नाखून के बराबर, कभी उससे भी छोटी। लेकिन उसे बनाने के लिए जिस अनुशासन, धैर्य और ईमानदार तैयारी की ज़रूरत होती है, वह किसी भी देश के चरित्र की परीक्षा ले लेती है। भारत ने सपना सही देखा है। अब देखना यह है कि क्या वह उस सपने को पूरा करने की उतनी ही मेहनत, उतनी ही बारीकी और उतना ही धैर्य दिखा पाता है, जितना एक चिप की एक-एक परत बनाने में लगता है - या फिर यह भी उन बड़ी घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगा जो मंच पर तालियाँ बटोरकर इतिहास की फ़ाइलों में दब जाती हैं। रविकान्त राऊत जबलपुर,मध्यप्रदेश 9425611243
