

एक स्लेट थी,
फटी हथेली जितनी छोटी,
और मिट्टी सी सोंधी एक कलम,
जिसे खड़िया कहते थे बड़े लोग
मास्टर जी की उंगली मेरी मुट्ठी पर थी,
और मेरी मुट्ठी में था डर ,
फिर एक लकीर बनी,
टेढ़ी, हकलाती हुई,
जैसे कोई बच्चा
पहला कदम रखता है
बिना यह जाने कि
गिरना भी सीखने का हिस्सा है
‘अ’ बस एक अक्षर था,
पर उस दिन लगा
जैसे किसी ने मेरे नाम की
पहली ईंट रख दी हो।
घर लौटा तो आंगन की धूल में
उसी अक्षर को फिर-फिर लिखता रहा,
जैसे मैं अपने होने का सबूत गढ़ रहा होऊं
बरसों बाद आज भी जब
अपने नाम का हस्ताक्षर करता हूं,
तो कभी-कभी वही टेढ़ी लकीर याद आ जाती है
वह पहला ‘अ’,
जो डर से नहीं,
एक उम्मीद से लिखा गया था।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243
