महत्वाकांक्षा का जुआरी

उस शाम मैं एक छोटे से कमरे में बैठा था।कमरा किराए का था।
दीवारों पर कोचिंग संस्थानों के पोस्टर लगे थे—
“सफलता अब दूर नहीं”
“आपका चयन हमारा लक्ष्य”
टेबल पर किताबों का ढेर था।
इतिहास।
अर्थशास्त्र।
राजनीति।
समसामयिक घटनाएँ।
कमरे की खिड़की से शहर का शोर आ रहा था।
पर कमरे के भीतर…बस पन्नों की फड़फड़ाहट की आवाज़ थी।
तभी मेरे भीतर के एक कमरे का दरवाज़ा खुला।
वह बाहर आया।
महत्वाकांक्षा।
उसने बहुत चमकदार कपड़े पहने थे।
आँखों में अजीब-सी चमक।
उसने मेरी किताबों को देखा और मुस्कुराया।
“अच्छा है,”उसने कहा।
“तुम खेल में शामिल हो चुके हो।”
मैंने पूछा,
“कौन सा खेल?”
वह कुर्सी खींचकर बैठ गया।
“भविष्य का खेल।”
मैंने कहा,
“मैं बस परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ।”
वह हँसा।
“यही तो खेल है।
लोग इसे तैयारी कहते हैं।
मैं इसे दाँव कहता हूँ।”
उसने कमरे की ओर इशारा किया।
“तुमने अपना समय लगाया है।
अपनी नींद।
अपनी युवावस्था।
दोस्त।
त्योहार।
सब कुछ।”
फिर उसने कहा—
“और बदले में क्या मिलेगा?”
मैंने जवाब दिया,
“सफलता।”
महत्वाकांक्षा ने सिर हिलाया।
“नहीं।
संभावना।”
मैं कुछ देर चुप रहा।
उसने धीरे से कहा,
“जुआ हमेशा संभावना पर खेला जाता है।निश्चितता पर नहीं।”
मैंने खिड़की से बाहर देखा।सड़क पर लोग चल रहे थे।कोई चाय पी रहा था।
कोई हँस रहा था।कोई बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा था।
वे सब सामान्य जीवन जी रहे थे।
महत्वाकांक्षा ने मेरी नज़र का पीछा किया।
“तुम सोच रहे हो कि वे लोग स्वतंत्र हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वह बोला,
“पर सच यह है कि वे भी खेल में हैं।
बस उनके दाँव छोटे हैं।”
फिर उसने मेरी किताबों पर हाथ रखा।
“तुम्हारा दाँव बड़ा है।”
मैंने पूछा,
“और अगर मैं हार गया?”
महत्वाकांक्षा ने कंधे उचकाए।
“जुआरी यह सवाल नहीं पूछते।”
कुछ देर कमरे में चुप्पी रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
“तुम जानते हो मनुष्य की सबसे अजीब आदत क्या है?”
मैंने पूछा,
“क्या?”
वह बोला—“वह भविष्य के लिए वर्तमान गिरवी रख देता है।”
मुझे अचानक याद आया—कहीं पढ़ा था कि हमारे पूर्वज,जो जंगलों में घूमते थे,शायद भविष्य के बारे में इतना नहीं सोचते थे।
वे आज का भोजन खोजते थे।
आज की आग जलाते थे।
आज की रात सोते थे।
पर आधुनिक मनुष्य…
वह दस साल आगे का सपना देखता है।
और उसी सपने के लिए अपना आज का दिन बेच देता है।
महत्वाकांक्षा ने कहा,
“और इसी वजह से मनुष्य इतना आगे आया है।”
फिर वह थोड़ा झुका।
“लेकिन इसी वजह से वह इतना बेचैन भी है।”
मैंने उससे पूछा,
“तो क्या महत्वाकांक्षा बुरी चीज़ है?”
वह मुस्कुराया।
“नहीं।
अगर महत्वाकांक्षा न होती…
तो तुम अभी भी पेड़ों पर बैठे होते।”
मैंने कहा,
“तो फिर समस्या क्या है?”
वह कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“समस्या तब होती है…
जब खेल तुम्हें खेलने लगता है।”
मैंने पूछा,
“उसका क्या मतलब?”
महत्वाकांक्षा ने धीरे से कहा—
“जब तुम यह भूल जाओ कि जीवन एक यात्रा है…
और उसे सिर्फ़ एक परीक्षा बना दो।”
कमरे की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
मैंने किताब बंद कर दी।
महत्वाकांक्षा उठकर दरवाज़े की ओर जाने लगा।
फिर वह रुका।
और बोला—

“याद रखना…
जुआ खेलने में कोई बुराई नहीं है।
बस इतना हमेशा ध्यान रखना कि…
तुम दाँव पर क्या लगा रहे हो।”

वह वापस अपने कमरे में चला गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
मैं फिर मेज़ पर बैठ गया।
किताब खोली।
और पढ़ने लगा।
क्योंकि सच यह है—
हर मनुष्य किसी न किसी खेल में शामिल है।
और शायद जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि
तुम जीतोगे या हारोगे।
बल्कि यह है कि—तुमने दाँव पर क्या लगाया था।
कमरे की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
मैंने किताब बंद कर दी।
कुछ देर तक मैं खिड़की से बाहर देखता रहा।
सड़क पर वही लोग थे।
कोई चाय पी रहा था।
कोई हँसते हुए फोन पर बात कर रहा था।
कोई बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा था।
उनमें से किसी के पास शायद बड़ी महत्वाकांक्षाएँ नहीं थीं।
लेकिन उनके पास“आज का दिन”था।

मैंने धीरे से अपनी किताब फिर खोली।
क्योंकि अब मुझे खेल थोड़ा बेहतर समझ आ गया था।
समस्या यह नहीं है कि मनुष्य महत्वाकांक्षी क्यों होता है।
समस्या यह है कि कभी-कभी वह जीतने के लिए इतना बेचैन हो जाता है कि उसे याद ही नहीं रहता—
वह असल में क्या जीतना चाहता था।
पर इस बार मुझे साफ़ पता था—
मैं सिर्फ़ एक परीक्षा नहीं दे रहा।
मैं अपने जीवन के कुछ साल एक संभावना पर लगा रहा हूँ।
और अब मुझे यह भी पता था—
अगर कभी यह खेल मुझे पूरी तरह निगलने लगे…
तो मुझे याद करना होगा—
जीवन सिर्फ़ जीतने का नाम नहीं है।
जीवन जीने का नाम भी है।

उस रात मैंने पढ़ाई जारी रखी।
क्योंकि जुआरी होना गलत नहीं है।
पर समझदार जुआरी वही होता है जो समय रहते यह पहचान ले—
“उसके लिए असली जीत क्या है,उसे कितना बड़ा दाँव लगाना है और कब फड़ छोड़कर उठ जाना है,निर्भ्रांत,बेझिझक।”

——रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश

 

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