भय का प्रहरी

“रात 2:17।अनजान नंबर।मैंने उठाया।चुप्पी।फिर एक औरत की आवाज़—‘तुम जाग रहे हो…’मैं जम गया।‘कौन?’उसने कहा—‘तुम्हें डर लग रहा है ना?’फोन कट गया।लेकिन मेज़ पर एक काग़ज़ था—जो पहले नहीं था।उस पर लिखा था:‘अब आगे क्या?’📞💀”

रात 1:47 AM—उस रात मैं सो नहीं पा रहा था।
कमरे की लाइट बंद थी।लेकिन अंधेरा पूरी तरह अंधेरा नहीं होता—उसमें हमेशा कुछ आकार तैरते रहते हैं।खिड़की से बाहर की हल्की रोशनी।पंखे की छाया।कोने में रखी कुर्सी का धुंधला रूप।
घड़ी की टिक-टिक बहुत साफ़ सुनाई दे रही थी।
मैं छत की तरफ़ देख रहा था।आँखें खुली थीं।लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था—सिवाय अपने विचारों के।

मेरे भीतर कई कमरे हैं।
हर कमरे में एक मुखौटा टंगा है।
लेकिन उस रात—एक मुखौटा खुद चलकर बाहर आ गया।

“तुम जाग रहे हो।”
यह आवाज़ मेरे भीतर से आई थी।लेकिन मेरी नहीं थी।
मैंने आँखें नहीं खोलीं।(वे पहले से खुली थीं।)
“नहीं,”मैंने धीरे से कहा।
वह हल्का-सा हँसा।
“झूठ बोलने से डर कम नहीं होता।”
मैंने करवट बदली।चादर कसकर पकड़ी।
“कौन हो तुम?अंदर कैसे आये?क्या चाहिए तुम्हें?”
वह मेरे बिस्तर के पास बैठ गया।मुझे दिखा नहीं—लेकिन महसूस हुआ।जैसे हवा का दबाव बदल गया हो।
“कुछ नहीं।मैं तो हमेशा यहीं रहता हूँ।बस—आज तुमने मुझे नोटिस कर लिया है।”

कमरे में सन्नाटा था।
सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक।
फिर अचानक—
टक्।
कुछ गिरने की हल्की आवाज़ आई।
मैंने तुरंत आँखें खोल दीं।(वे पहले से खुली थीं—लेकिन अब देखना शुरू किया।)
कमरे के कोने में कुर्सी पर एक बैग रखा था।
वह थोड़ा हिला हुआ था।
“देखा?”भय ने कहा।
“कुछ है वहाँ।”
मैंने खुद से कहा—“हवा होगी।”
भय मेरे करीब झुक आया।उसकी साँस मेरे कान के पास महसूस हुई।
“या शायद—कोई और।”
दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

तभी फोन बजा।
रात के 2:17।
स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था।
+91 98XXXXXXXX
मैंने कुछ सेकंड देखा।फिर—बिना सोचे—उठा लिया।
“हेलो?”
कुछ सेकंड तक चुप्पी।
फिर एक धीमी-सी महिला आवाज़—
“तुम जाग रहे हो…”
मैं सन्न रह गया।
“कौन?”मैंने पूछा।
कुछ पल चुप्पी।
फिर उसने कहा—
“तुम्हें डर लग रहा है ना?”
मेरी उंगलियाँ ठंडी हो गईं।
भय ने धीरे से फुसफुसाया—
“देखा?मैं अकेला नहीं हूँ।”
मैंने फोन काट दिया।

कुछ सेकंड बाद—
वही नंबर फिर कॉल करने लगा।
स्क्रीन चमक रही थी।अंधेरे में—एक नीली रोशनी।
इस बार मैंने नहीं उठाया।
लेकिन फोन बजता रहा।और बजता रहा।और बजता रहा।
फिर—रुक गया।

कमरे का अंधेरा अब पहले जैसा नहीं था।
वह गहरा हो गया था।जैसे किसी ने उसे और काला कर दिया हो।
मैंने धीरे-से उठकर लाइट ऑन की।
क्लिक।
पीली रोशनी फैल गई।
कमरा खाली था।
बैग वहीं था—कुर्सी पर।
सब कुछ सामान्य।

लेकिन तभी मेरी नज़र मेज़ पर गई।
वहाँ एक काग़ज़ रखा था।
जो पहले वहाँ नहीं था।

मैंने उसे उठाया।
सफ़ेद काग़ज़।थोड़ा पुराना।किनारे मुड़े हुए।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—काली स्याही में,साफ़ अक्षरों में:
“अब आगे क्या?”
मेरे हाथ काँप गए।
भय ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“मैंने कहा था ना—मैं हमेशा यहीं हूँ।”
मैंने धीमे से पूछा—“पर तुम हो कौन?”
वह मेरे बिल्कुल पास आ गया।इतना पास कि मैं उसकी गर्मी महसूस कर सकूँ।या शायद—ठंडक।
और फुसफुसाया—
“मैं भविष्य हूँ।”

कमरे में फिर से सन्नाटा पसर गया।
फोन फिर बजा।
इस बार मैंने उठाया नहीं।बस देखता रहा—स्क्रीन को।
वही नंबर।
लेकिन अब—caller ID में एक नाम दिख रहा था।
“YOU”
मेरा खुद का नाम।

मैं बस उस काग़ज़ को देखता रहा।
और पहली बार मुझे समझ आया—
भय अंधेरे में नहीं रहता।
वह उन सवालों में रहता है जिनका जवाब हमारे पास नहीं होता।

“अब आगे क्या?”
यह सवाल मेरा था।मेरे भीतर का।मेरे भविष्य का।
मुझे नहीं पता था—अगले महीने क्या होगा।
मुझे नहीं पता था—मेरी नौकरी टिकेगी या नहीं।
मुझे नहीं पता था—मैं जिस इंसान से प्यार करता हूँ,वह मेरे साथ रहेगा या नहीं।
मुझे नहीं पता था—मैं खुद कौन बनूँगा।

और यही डर था।

लाइट अब भी जल रही थी।
लेकिन अंधेरा कहीं गया नहीं था।
भय वापस अपने कमरे में नहीं गया।
वह अब भी मेरे बगल में बैठा था।चुपचाप।

मैंने काग़ज़ मोड़ा।जेब में रख लिया।
फोन silent कर दिया।
और फिर—लाइट बंद कर दी।
अंधेरे में लेट गया।

भय ने पूछा—“अब सोओगे?”
मैंने कहा—“हाँ।”
उसने हँसकर कहा—“झूठ।”

और वह सही था।
क्योंकि कुछ मुखौटे ऐसे होते हैं—
जो कभी उतरते नहीं।

सुबह जब मैं उठा—सब सामान्य था।
बैग वहीं था।फोन वहीं था।काग़ज़—जेब में।
मैंने उसे फिर से देखा।
“अब आगे क्या?”

और तभी मुझे लगा—
शायद यह सवाल डर नहीं था।
शायद यह निमंत्रण था।

क्योंकि भय हमें रोकता नहीं।
वह हमें याद दिलाता है—
कि हम जीवित हैं।
कि कुछ दाँव पर है।
कि अभी भी—चुनाव बाकी है।

—रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश

 

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