सबका चहेता

दुनिया अक्सर सच से ज़्यादा presentation पर भरोसा करती है।असली अपराधी डरावने नहीं,भरोसेमंद दिखते हैं और अक्सर वही होते हैं जिन्हें हम“सबसे अच्छा इंसान”घोषित कर चुके होते हैं।
यहीं से कहानी शुरू होती है,क्योंकि हम अपराधी को पहचानना चाहते हैं चेहरे से।हम चाहते हैं कि वह डरावना लगे।लेकिन असली अपराधी अक्सर dinner guest जैसे दिखते हैं—सभ्य,आकर्षक,भले आदमी।
2015 में जब राहुल मेरे साथ join हुआ,लंच टेबल पर आया जैसे सालों का दोस्त हो।बातूनी,मिलनसार,हर किसी के काम का।फाइल गिरे तो उठा दे,किसी का birthday हो तो cake ले आए।धीरे-धीरे वह सिर्फ़ सबका नहीं,मेरा भी चहेता बन गया।
2017 में एक दिन मेरी सहयोगी प्रिया ने कहा,“राहुल से दूर रहा करो।”आवाज़ में डर था,शब्दों में झिझक।मैं हँस पड़ा जैसे यह कोई गलतफहमी हो।इस मामले पर पूछने पर राहुल ने मीठी हँसी,साफ-सुथरी कहानी दी और एक सवाल पूछा,“तुम तो मुझ पर भरोसा करते हो ना?”मैंने किया।यही मेरी पहली गलती थी।
2018 में एक-एक कर तीन लड़कियाँ नौकरी छोड़ गईं।सबने अपने त्यागपत्र पर लिखा—“Personal Reasons।”जैसे परेशानी कोई निजी चीज़ हो जिसका अपराधी सार्वजनिक रूप से सबका चहेता बना रहे।अनु ने फुसफुसाकर बताया—देर रात के मैसेज,असहज शब्द,बढ़ता दबाव।Inquiry हुई—दिखाने भर की।HR का जवाब तैयार था—“Proof नहीं है और राहुल तो अच्छा लड़का है।”
अच्छा लड़का—यह एक ऐसा प्रमाणपत्र है जो समाज बिना जाँच-पड़ताल के बाँट देता है,खासकर तब जब सामने वाला मुस्कुराना जानता हो।
2019 में राहुल की शादी रिया से हुई।रिया शांत थी,मुस्कुराती थी और धीरे-धीरे कम बोलने लगी।छह महीने बाद उसकी आँखों के नीचे काले घेरे उभर आये और आवाज़ में एक नई आदत आ गई—थरथराहट की,काँपने की।
2020 के lockdown में राहुल ने फोन पर कहा,“कभी-कभी मुझे चिल्लाना पड़ता है।”फिर तुरंत हँसकर जोड़ दिया—“अरे normal है।”लेकिन जो normal कहा जाए वह अक्सर सबसे बड़ा झूठ होता है।
2021 की एक रात,2 बजे।फोन बजा।
रिया रो रही थी।
मैं बीस मिनट में पहुँचा।दरवाज़ा खुला था।
राहुल बाहर बैठा था—शांत,सिगरेट के धुएँ में इतना सहज,जैसे कुछ हुआ ही न हो।मुझे देखकर मुस्कुराया।
अंदर रिया कोने में थी—नीले निशान,फटा होंठ,टूटती साँसें।
राहुल ने कहा—“वह चीख रही थी…मैंने तो उसे बस शांत करवाया।”
और तभी रिया ने पहली बार वह शब्द बोला—
“झूठ।”
आगे उसने बताया—“उसने मेरा सिर दीवार पर दे मारा था।”
उस रात मेरे भीतर कुछ टूट गया और कुछ साफ़ हो गया।यह कोई गुस्सा नहीं था,यह pattern था,यह control था।यह वही चेहरा था जो दिन में मुस्कुराता है और रात में दीवार बन जाता है।
हमने शिकायत दर्ज कराई।राहुल गिरफ्तार हुआ।और अगली सुबह वही पुराना chorus शुरू हो गया—
“राहुल??नहीं यार…”
“Misunderstanding होगी…”
“रिया ही कुछ…”
क्योंकि समाज को सपाट कहानियाँ पसंद हैं।वह चाहता है—villain है तो उसे डरावना दिखना चाहिए,पीड़ित देवदूत लगना चाहिए।लेकिन असली पीड़ित अक्सर गुस्से में होती है,आक्रोशित,टूटी हुई,झगड़ालू लगती हुई।और असली अपराधी बेहद convincing।
Court में रिया से पूछा गया—“पहले क्यों नहीं बताया?”“फिर रुकी क्यों?”
यानी मार का हिसाब नहीं,पीड़ित का चरित्र जाँचा जाता है।
राहुल ने कहा—“मैंने हाथ नहीं उठाया।मैं तो प्यार करता हूँ।”
और कुछ लोग मान भी गए।
क्योंकि राहुल बोलना जानता था।
और दुनिया अक्सर सच से ज़्यादा presentation पर भरोसा करती है।
पर इस बार सबूत थे।
Medical report।
पड़ोसियों की गवाही।
पुराने messages।
Office की शिकायतें।
फैसला आया—दोषी।सज़ा।
जेल जाने से पहले उसने मुझसे कहा—
“तुमने मेरा साथ क्यों नहीं दिया?”
मैंने कहा—
“क्योंकि तुम गलत थे।”
वह हँसा।एक हल्की बेपरवाह हँसी।
“यार सब करते हैं…बस पकड़े नहीं जाते।”
उस पल मुझे समझ आया—उसे अफसोस नहीं था।उसे सिर्फ़ यह दुख था कि मुखौटा उतर गया।
और आज पीछे देखकर लगता है—राहुल ने मुखौटा नहीं पहना था।
मुखौटा हमने पहना था।
सबसे डरावनी सच्चाई यही है—असल villain अक्सर वही होता है जिसे हम सबसे पहले“सबसे अच्छा इंसान”घोषित कर देते हैं।

———रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top