पांच सितंबर की सुबह प्रिंसिपल साहब खुद स्टाफ रूम में मिठाई बांटने आए, वही प्रिंसिपल जो बाकी तीन सौ चौंसठ दिन शाला के अतिथि शिक्षकों को यह याद दिलाते नहीं थकते कि “आपकी कोई हैसियत नहीं, चाहें तो अभी छुट्टी कर दें।” आज उन्होंने हर अध्यापक के गले में माला डाली, हाथ जोड़े, और मंच से घोषणा की, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं, इनके चरणों में हमारा नमन है।” पीछे खड़े गणित के मास्टर तिवारी जी मन ही मन हिसाब लगा रहे थे कि पिछले तीन महीने से जो वेतन नहीं आया, वह किस खाते में नमन कर रहा है।
मंच पर बच्चों ने भाषण दिए, “गुरु बिन ज्ञान नहीं”, “गुरु गोविंद दोऊ खड़े”, तालियां बजीं, फोटो खिंचे, वही फोटो शाम तक स्कूल के व्हाट्सएप ग्रुप और स्थानीय अखबार में छप गई, कैप्शन था – “हमारे विद्यालय में गुरुजनों का भव्य सम्मान।” उसी अखबार के अगले पन्ने पर एक खबर और थी, जिसे किसी ने नहीं पढ़ी – ज़िले के बहत्तर स्कूलों में अतिथि शिक्षकों को पिछले पांच महीने से मानदेय नहीं मिला।
शाम होते-होते माला मुरझाने लगी, और छह सितंबर की सुबह प्रिंसिपल साहब फिर पुराने ढंग पर लौट आए। तिवारी जी को बुलाकर कहा गया, “आपकी ड्यूटी वोटर लिस्ट सुधार में लगी है, कल से बूथ पर जाना है।” विज्ञान वाली मैडम को थमाया गया मिड-डे मील का हिसाब, और भूगोल वाले मास्टर साहब से कहा गया कि चार्ट पेपर स्कूल के बजट में नहीं आता, अपनी जेब से मंगवा लें। किसी ने माला की याद नहीं दिलाई, न किसी ने पूछा कि “राष्ट्र निर्माता” की तनख्वाह किस महीने आएगी।
सच पूछिए तो यह देश शिक्षकों का सबसे बड़ा भक्त है, बशर्ते भक्ति साल में एक दिन तक सीमित रहे। बाकी दिन भक्त अपनी श्रद्धा बचाकर रखता है, ताकि अगले पांच सितंबर को फिर से नई मालाएं खरीदी जा सकें। कहते हैं गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा है, पर भगवान के मंदिर का चढ़ावा फिर भी हर हफ्ते चढ़ता है, गुरु की तनख्वाह का चढ़ावा साल में एक दिन के नमन में ही निपटा दिया जाता है।

