← सभी रचनाएँ

विरासत से व्यवस्था तक टाटा की अगली परीक्षा

एन. चंद्रशेखरन ने टाटा संस के चेयरमैन पद पर अपने अगले कार्यकाल की पेशकश न करने का निर्णय लिया है। उनका वर्तमान कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना है। उन्होंने कहा कि पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को बोर्ड में एक सदस्य का समर्थन नहीं मिला और छह महीने तक इस पर कोई समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद उन्होंने नेतृत्व में स्पष्टता की आवश्यकता को देखते हुए स्वयं को अगले कार्यकाल से अलग कर लिया।

बाजार ने इसे तुरंत महसूस किया। टाटा समूह की कई सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई और टीसीएस पर विशेष दबाव दिखा। लेकिन शेयर बाजार की एक दिन की प्रतिक्रिया इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है। असली कहानी कहीं गहरी है।

टाटा नाम भारत में केवल एक कारोबारी समूह का नाम नहीं है। यह एक ऐसी कारोबारी परंपरा का प्रतीक है जिसमें उद्योग के साथ प्रतिष्ठा, परोपकार और सार्वजनिक विश्वास भी जुड़ा रहा है। इसीलिए टाटा संस में नेतृत्व का प्रश्न केवल यह नहीं है कि अगला चेयरमैन कौन होगा। सवाल यह है कि अगली टाटा किस तरह की टाटा होगी?

टाटा समूह आज उस दौर में है जहाँ उसे एक साथ कई कठिन मोर्चों पर काम करना है। विमानन से लेकर वाहन, इस्पात से लेकर सूचना-तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसी नई औद्योगिक दिशाओं तक समूह का विस्तार हो रहा है। दूसरी ओर, टीसीएस जैसे पुराने मजबूत व्यवसायों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलती वैश्विक तकनीकी मांग का दबाव है। एयर इंडिया का पुनर्निर्माण अपनी अलग चुनौती है। ऐसे समय में नेतृत्व का सवाल स्वाभाविक रूप से रणनीति का सवाल बन जाता है। लेकिन यही वह जगह है जहाँ भारत के बड़े कारोबारी समूहों के सामने एक पुरानी और कठिन समस्या खड़ी होती है कि क्या विरासत रणनीति तय करेगी या रणनीति विरासत को नया आकार देगी?

टाटा समूह की सबसे बड़ी ताकत उसका नाम है। लेकिन बड़े संस्थानों की सबसे बड़ी कमजोरी भी कभी-कभी वही नाम बन जाता है। क्योंकि जब किसी संस्था का नैतिक और सामाजिक मूल्य किसी व्यक्ति या परिवार की छवि से बहुत गहराई से जुड़ जाता है, तो नेतृत्व परिवर्तन सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाता। वह भावनात्मक घटना बन जाता है और भावनात्मक संस्थाओं को भी अंततः संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होती है।

टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दूसरी ओर, समूह की विभिन्न कंपनियों में अलग-अलग शेयरधारक और सार्वजनिक निवेशक हैं। यानी यहाँ केवल मालिक और प्रबंधक का संबंध नहीं है। यह ट्रस्ट, बोर्ड, प्रबंधन, निवेशक और व्यापक सार्वजनिक हित के बीच संतुलन का प्रश्न भी है। इसीलिए चंद्रशेखरन का निर्णय एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। उन्होंने टकराव को अंतहीन खींचने के बजाय यह कहा कि संस्था को आगे के नेतृत्व को लेकर स्पष्टता चाहिए।

यह बात छोटी लग सकती है, लेकिन बड़े संस्थानों के लिए यही सबसे कठिन अनुशासन है। किसी पद पर बने रहने की इच्छा से बड़ी संस्था के भविष्य की जरूरत को मानना। लेकिन दूसरी तरफ का सवाल भी उतना ही जरूरी है क्या केवल यह मान लेना पर्याप्त होगा कि बोर्ड में सर्वसम्मति नहीं थी, इसलिए नेतृत्व परिवर्तन हो गया? नहीं।

किसी भी बड़ी संस्था में असहमति बुरी चीज नहीं है। बल्कि स्वस्थ बोर्ड की पहचान ही असहमति है। समस्या तब पैदा होती है जब असहमति निर्णय को रोक दे और संस्था महीनों तक यह तय न कर पाए कि उसका नेतृत्व कौन करेगा। यहीं से सुशासन का प्रश्न पैदा होता है। बोर्ड में मतभेद होना लोकतंत्र है। मतभेद के कारण निर्णयहीनता पैदा होना शासन की कमजोरी है। टाटा के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण काम नया चेयरमैन चुनना नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया बनाना है जिसमें अगला उत्तराधिकार विवाद का विषय न बने।

भारत की कंपनियाँ बदल रही हैं यह घटना केवल टाटा समूह की नहीं है। भारत में अनेक कंपनियाँ उस आकार तक पहुँच रही हैं जहाँ उनका प्रभाव किसी एक परिवार या संस्थापक से कहीं बड़ा हो गया है। कंपनी में काम करने वाले हजारों कर्मचारी हैं। करोड़ों ग्राहकों की निर्भरता है। पेंशन फंड और छोटे निवेशकों की बचत जुड़ी है। आपूर्तिकर्ताओं और छोटे कारोबारियों की आजीविका जुड़ी है। ऐसी स्थिति में कंपनी का शासन निजी मामला भर नहीं रह जाता। वह अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।

इसलिए भारत को अब कॉरपोरेट सुशासन को केवल नियमों और अनुपालन की भाषा में नहीं देखना चाहिए। उसमें उत्तराधिकार की स्पष्टता भी होनी चाहिए। बोर्ड की स्वतंत्रता भी। मालिकाना और प्रबंधन के बीच स्वस्थ दूरी भी और सबसे बढ़कर,  निर्णय लेने की ऐसी व्यवस्था भी जिसमें किसी महान नाम की प्रतिष्ठा संस्था की संस्थागत क्षमता का विकल्प न बन जाए।

रतन टाटा के दौर में टाटा नाम ने एक असाधारण नैतिक पूंजी अर्जित की। उनके बाद स्वाभाविक रूप से हर नेतृत्व की तुलना उस विरासत से होगी। लेकिन किसी संस्था को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके अतीत को दोहराना नहीं होता। उसे उस अतीत से मिले मूल्यों को नए समय के लिए उपयोगी बनाना होता है।

यही कारण है कि चंद्रशेखरन के बाद का नेतृत्व केवल “कौन” का प्रश्न नहीं होना चाहिए, वह “किस तरह” का प्रश्न होना चाहिए। ये पूछा जाना भी ज़रूरी होगा कि क्या अगला नेतृत्व अधिक तकनीकी होगा? क्या वह अधिक जोखिम लेने वाला होगा? क्या वह नए उद्योगों पर अधिक जोर देगा? क्या वह समूह के कुछ कारोबारों को अलग करेगा? क्या वह ट्रस्ट और कंपनी के संबंधों को नए ढंग से परिभाषित करेगा? इन सवालों का उत्तर केवल नया चेयरमैन नहीं देगा। टाटा संस की शासन-व्यवस्था देगी।

भारत अब उस अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुका है जहाँ कुछ निजी संस्थाएँ कई राज्यों की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी हो सकती हैं। इसलिए उनकी आंतरिक स्थिरता भी राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता से जुड़ने लगी है। टाटा समूह की वर्तमान स्थिति बाजार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें एक सरल लेकिन अक्सर भुला दिया गया सत्य याद दिलाती है – महान संस्थाएँ महान व्यक्तियों से बन सकती हैं, लेकिन महान संस्थाएँ केवल व्यक्तियों के भरोसे चल नहीं सकतीं।

व्यक्ति इतिहास बनाते हैं। संस्थाएँ भविष्य बनाती हैं। टाटा की अगली परीक्षा शायद यही है कि वह अपनी महान विरासत को किसी एक व्यक्ति के नाम से आगे ले जाकर ऐसी व्यवस्था में बदल पाए, जहाँ नेतृत्व बदल जाए, लेकिन संस्था का भरोसा न बदले। आखिर किसी भी बड़े कारोबारी समूह की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी फैक्ट्रियाँ, तकनीक या बाजार हिस्सेदारी नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी संपत्ति यह भरोसा होता है कि कल भी यह संस्था उतनी ही स्थिर रहेगी, भले ही आज उसका चेहरा बदल गया हो और शायद यही आज के टाटा प्रसंग का सबसे बड़ा सबक है । अच्छे नेता संस्था को आगे ले जाते हैं; महान संस्थाएँ अच्छे नेताओं के जाने के बाद भी आगे बढ़ती रहती हैं।

रविकान्त राऊत

जबलपुर, मध्यप्रदेश

9425611243

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *