
पांच सितंबर की सुबह देश के हर स्कूल में एक जैसा दृश्य दोहराया जाता है, बच्चों के हाथों में फूल, गले में मालाएं, और मंच से गूंजता वही श्लोक, गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः। यह तारीख डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की है, जो अठारह सौ अठासी में जन्मे थे और उन्नीस सौ बासठ में जब भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ शिष्यों और मित्रों ने उनका जन्मदिन बड़े स्तर पर मनाने की इच्छा जताई। राधाकृष्णन ने उस प्रस्ताव को यह कहकर लौटा दिया कि उनका जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, ताकि देश के हर उस व्यक्ति का सम्मान हो जो कक्षा में खड़ा होकर किसी और के भविष्य को गढ़ता है। यह विनम्रता आज याद करने लायक है, क्योंकि हमने उस दिन को उत्सव तो बना लिया, पर उसकी आत्मा कहीं पीछे छूट गई।
इसी हफ्ते राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दिल्ली के विज्ञान भवन में अड़तालीस शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित करेंगी, देश भर से चुने गए वे शिक्षक जिन्होंने अपने स्कूल और अपने विद्यार्थियों के लिए कुछ असाधारण किया। यह सम्मान अपनी जगह जायज़ है, पर सवाल यह भी उठता है कि जिस देश में शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक स्कूली शिक्षकों की संख्या अब एक करोड़ के पार पहुंच चुकी है, वहां अड़तालीस चेहरे पूरे तंत्र की तस्वीर कैसे बन सकते हैं? बाकी करोड़ों शिक्षकों की कहानी उस मंच तक कभी नहीं पहुंचती।
वह कहानी उन अतिथि शिक्षकों की है जिन्हें कर्नाटक के कुछ ज़िलों में महीने के साढ़े सात हज़ार रुपये पर पढ़ाने भेजा जाता है, या दिल्ली और पंजाब की उन बाईस हज़ार अतिथि शिक्षिकाओं की, जो दिहाड़ी मज़दूर जितनी अनिश्चितता में हर साल अपनी नौकरी बचाने के लिए सड़क पर उतरती हैं। वह कहानी उन एक लाख से ज़्यादा एकल-शिक्षक स्कूलों की भी है, जहां सिर्फ़ एक ही शिक्षक है यह एक ही व्यक्ति चालीस लाख से अधिक बच्चों को अकेले पढ़ाता है, मिड-डे मील का हिसाब रखता है, जनगणना और चुनाव ड्यूटी निभाता है, और फिर शाम को थका हुआ घर लौटता है, अगले दिन फिर वही भूमिका निभाने के लिए।
फिर भी अगर किसी से पूछा जाए कि उसके जीवन को किसने सबसे ज़्यादा गढ़ा, तो अधिकतर जवाब किसी नेता या अफसर का नाम नहीं लेंगे, वे किसी मास्टर जी या मैडम का नाम लेंगे। मुझे भी अपनी कक्षा पांच वाली उस अध्यापिका की याद आती है, जिसने मेरी लिखावट पर इतना समय दिया जितना शायद मेरे अपने घर में किसी ने नहीं दिया, और आज जब मैं अपना नाम लिखता हूं, उस हस्ताक्षर में कहीं न कहीं उनकी उंगलियों का दबाव अब भी बचा है। यह ऋण किसी वेतन-भत्ते या पेंशन से नहीं चुकता, यह ऋण सिर्फ इस बात से चुकता है कि हम अगली पीढ़ी को भी उतनी ही ईमानदारी से गढ़ने वाला कोई हाथ दे सकें।
शिक्षक दिवस हर साल आकर यह याद दिलाता है कि गुरु दक्षिणा सिर्फ एक दिन माला पहनाने से पूरी नहीं होती। असली गुरु दक्षिणा तब चुकती है जब उस अतिथि शिक्षिका को स्थायी नौकरी मिले, जब उस एकल-शिक्षक स्कूल में दूसरा शिक्षक भेजा जाए, और जब देश के करोड़ों मास्टर जी और मैडम को सिर्फ एक दिन नहीं, बाकी के तीन सौ चौंसठ दिन भी उतना ही सम्मान मिले। तब तक यह पांच सितंबर एक अधूरा कर्ज़ ही बना रहेगा।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243
