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धरती माँ, थोड़ा और एडजस्ट कर लो

सोसाइटी के पार्क में सुबह-सुबह भारी हलचल थी। ढोल नहीं था, पर उसका शोर मौजूद था – माइक से बार-बार गूँजती आवाज़, “आज पर्यावरण दिवस के अवसर पर, ग्रीनवुड एन्क्लेव सोसाइटी की ओर से वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।” मंच पर एक बैनर टंगा था, जिस पर हरे रंग की पृष्ठभूमि में लिखा था – “धरती बचाओ, पेड़ लगाओ” — और बैनर के ठीक नीचे, ज़मीन पर, उस पेड़ का कटा हुआ तना अब भी पड़ा था, जिसे दो हफ्ते पहले “पार्किंग की जगह बढ़ाने” के लिए काटा गया था।

सोसाइटी के सेक्रेटरी अग्रवाल जी, सफेद कुर्ता पहने, माइक पकड़कर बोल रहे थे – “आज हम सब मिलकर पाँच पौधे लगाएँगे। यह हमारी पृथ्वी के प्रति, हमारे बच्चों के भविष्य के प्रति, एक छोटा-सा कर्तव्य है।”

पार्क के एक कोने में, छाया में बैठे रिटायर्ड प्रोफेसर वाधवा जी यह सब देख रहे थे। उनकी निगाह बार-बार उस कटे हुए तने पर जा रही थी, जो किसी पुराने नीम का था – वही नीम, जिसकी छाँव में वह तीस सालों से शाम की सैर के बाद बैठते रहे थे।

उनके पास आकर शर्मा जी (जो सोसाइटी की ‘इन्वायरनमेंट कमिटी’ के सदस्य थे, और जिनके घर के बाहर तीन गाड़ियाँ खड़ी थीं) बोले – “वाधवा जी, आइए, आपको भी एक पौधा लगाना है। फोटो के लिए सबको लाइन में खड़ा होना है।”

“कौन सा पौधा?” वाधवा जी ने पूछा।

“यह… मनी प्लांट जैसा कुछ है, गमले में लगा है। फोटो खिंचवाकर वापस गमले में रख देंगे, अगले साल फिर इस्तेमाल हो जाएगा।”

वाधवा जी ने चश्मा ठीक किया, और धीरे से पूछा — “वह नीम का पेड़ कहाँ गया, जो यहाँ था?”

शर्मा जी का चेहरा एक पल के लिए सख्त हुआ, फिर मुस्कान में बदल गया – वही मुस्कान, जो हर कमेटी मेंबर के पास “मुश्किल सवालों” के लिए तैयार रहती है। “वो तो… उसकी जड़ें पार्किंग की दीवार को नुकसान पहुँचा रही थीं। इंजीनियर ने रिपोर्ट दी थी, हमने बोर्ड में पास किया, सब प्रोसेस से हुआ।”

“और आज जो पौधे लगाए जा रहे हैं, वो भी नीम के हैं?”

“नहीं नहीं, यह तो… गुलमोहर और चम्पा है। दिखने में अच्छे लगते हैं, और जड़ें कम फैलती हैं।”

वाधवा जी ने सिर हिलाया, जैसे कोई गणित का सवाल हल हो गया हो – काटा गया पेड़ छाया देता था, जड़ें फैलाता था, पंछियों को घर देता था; लगाया जा रहा पेड़ “दिखने में अच्छा” था, और जड़ें “कम फैलती” थीं। यानी समस्या पेड़ नहीं थी, समस्या पेड़ का “ठीक से पेड़ होना” थी।

कार्यक्रम शुरू हुआ। बच्चों को आगे बुलाया गया, हाथों में छोटे-छोटे पौधे थमाए गए, और हर बच्चे के पीछे एक अभिभावक खड़ा हो गया, मोबाइल लेकर। गड्ढा खोदा गया, पौधा रखा गया, मिट्टी डाली गई – और जैसे ही फोटो खिंची, अगला पौधा निकालकर वही गड्ढा फिर इस्तेमाल हो गया। तीन पौधे, एक गड्ढा, पंद्रह फोटो।

इसी बीच एक बुज़ुर्ग महिला, जो पास के घर से चाय लेकर निकली थीं, रुक गईं और बोलीं – “अरे, यह तो वही जगह है जहाँ पिछले महीने जेसीबी आई थी, सात पेड़ काटे थे। अब यहाँ पौधे लग रहे हैं?”

अग्रवाल जी ने माइक पर तुरंत जवाब दिया, जैसे यह सवाल भी “एजेंडा” में पहले से शामिल हो – “जी, बिल्कुल सही कहा आपने। पुराने पेड़ों की जगह पर अब हम नए, बेहतर पेड़ लगा रहे हैं। यह विकास और पर्यावरण के बीच का ‘संतुलन’ है – बैलेंस है।”

“बैलेंस”। वाधवा जी के मन में यह शब्द कहीं अटक गया। उन्होंने सोचा – सात बड़े पेड़, जो तीस-चालीस साल में बने थे, ऑक्सीजन देते थे, पंछियों के घोंसले संभालते थे – उनके बदले पाँच नए पौधे, जो गमले में फोटो के लिए लगाए जा रहे हैं, और कल शायद सूख भी जाएँ। यह ‘बैलेंस’ नहीं था, यह तो वैसा ही था जैसे कोई किसी का घर तोड़कर, मलबे पर एक खिलौने का घर बना दे, और कहे – “देखो, घर तो बना दिया, बैलेंस है।”

कार्यक्रम के बाद चाय-नाश्ते का इंतज़ाम था। पेपर प्लेट्स में समोसे, और हर प्लेट के साथ एक प्लास्टिक का चम्मच, एक पेपर नैपकिन जिस पर हरे रंग में लिखा था – “सेव अर्थ-गो ग्रीन”। कार्यक्रम खत्म होने के आधे घंटे बाद, सफाई कर्मचारी एक बड़े थैले में सारी पेपर प्लेट्स, चम्मच, और वो बैनर जिसे “धरती बचाओ” लिखा था – सब इकट्ठा करके पार्किंग के पास रखे कचरे के ढेर में डाल रहा था, जहाँ पहले से प्लास्टिक की बोतलें और थैलियाँ जली हुई पड़ी थीं, धुआँ अब भी उठ रहा था।

वाधवा जी उठे, धीरे-धीरे चलते हुए उस जगह पहुँचे जहाँ कभी नीम का पेड़ था। उन्होंने देखा – तने के पास से एक नई कोंपल निकल रही थी, बिना किसी की मदद के, बिना किसी समारोह के, बिना किसी फोटो के। उन्होंने उस कोंपल को थोड़ा पानी दिया, अपनी पानी की बोतल से, और मुस्कुराए।

पीछे से शर्मा जी की आवाज़ आई – “वाधवा जी, आपकी फोटो रह गई थी, चलिए ग्रुप फोटो में आ जाइए।”

वाधवा जी ने बिना पीछे मुड़े कहा-“जाइए, मेरी जगह वो कोंपल खड़ी कर दो फोटो में – वो ज़्यादा हकदार है इस दिन की।”

और दूर कहीं, माइक पर अभी भी अग्रवाल जी की आवाज़ गूँज रही थी – “…तो दोस्तों, आज का कार्यक्रम सफल रहा। अगले महीने हम ‘विश्व जल दिवस’ पर स्विमिंग पूल का उद्घाटन भी करने वाले हैं!”

रविकांत राऊत

जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

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