← सभी रचनाएँ

एक अच्छी हिंदी बोलने वाला युवा कहाँ पहुँच सकता है

आज कैमरा सबके पास है। AI भी सबके पास पहुँच रहा है। लेकिन प्रभावशाली भाषा अभी भी सबके पास नहीं है। यही वह जगह है जहाँ भाषा प्रतिभा को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदल सकती है।

कल्पना कीजिए एक ऐसे युवा की जो हिंदी पर असाधारण कमांड रखता है। वह किसी विषय को सिर्फ समझाता नहीं- समझा देता है। वह किसी कहानी को सिर्फ सुनाता नहीं- दृश्य बना देता है। वह किसी भावना को केवल व्यक्त नहीं करता- दूसरे व्यक्ति को वह भावना महसूस करा देता है। वो क्या नहीं कर सकता वो क्या नहीं बन सकता

ऐसा युवा मीडिया में जा सकता है। वह टेलीविजन या डिजिटल पत्रकारिता में एंकर बन सकता है। वह पॉडकास्ट होस्ट हो सकता है।

वह यूट्यूब एजुकेटर बन सकता है। वह स्टैंड-अप, स्टोरीटेलिंग की दुनिया में जा सकता है। वह कॉपीराइटर हो सकता है। वह साहित्य लिख सकता वगैरह वगैरह …

हिंदी का अर्थ कठिन शब्द नहीं है यहीं हिंदी के सामने एक दूसरी चुनौती भी है। अगर हम हिंदी को संस्कृतनिष्ठ, कठिन और परीक्षा-कक्ष वाली भाषा बना देंगे तो Gen Z उससे दूर जाएगा।उसे “अनुप्रेषणीयता” नहीं चाहिए; उसे यह जानना है कि वह किसी कठिन बात को साफ-साफ कैसे कहे। उसे “परिस्थितिजन्य प्रतिकूलता” नहीं चाहिए; वह जानना चाहता है कि “मुश्किल वक्त में भी मैं कैसे खड़ा रहूँ।” भाषा की ताकत कठिन शब्दों की संख्या से नहीं आती। भाषा की ताकत विचार की स्पष्टता, शब्दों की सटीकता और भाव की प्रामाणिकता से आती है। इसलिए हमें Gen Z को “शुद्ध हिंदी” नहीं, समृद्ध हिंदी देनी चाहिए।

ऐसी हिंदी जिसमें कबीर भी हों और मीम भी।

जिसमें प्रेमचंद भी हों और पॉडकास्ट भी।

जिसमें गालिब भी हों और इंस्टाग्राम कैप्शन भी।

जिसमें संस्कृत के शब्द भी हों, उर्दू की नजाकत भी, अंग्रेजी के जरूरी शब्द भी और सड़क की जीवंत बोलचाल भी।

भाषा कोई संग्रहालय नहीं है। वह जीवित चीज है। भाषाविद् जी.एन. डेवी भी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि भारतीय भाषाओं का इतिहास ही पारस्परिक आदान-प्रदान का इतिहास है। उनके अनुसार भारत में भाषाओं ने संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करते हुए विकास किया है। वे भारत की बहुभाषिकता को भारतीयता की मूल विशेषताओं में देखते हैं।

इसलिए हिंदी की रक्षा करने का अर्थ उसे कांच के भीतर रखना नहीं है। उसे नए समय में काम करने लायक बनाना है।इसलिए Gen Z से यह कहना जरूरी नहीं कि – “अंग्रेजी छोड़ो, हिंदी अपनाओ।” बल्कि कहना चाहिए-“अंग्रेजी सीखो, एआई सीखो, कोडिंग सीखो, दुनिया की हर भाषा से सीखो; लेकिन अपनी हिंदी को इतना मजबूत करो कि जब तुम्हें अपने विचार की सबसे सटीक, सबसे मानवीय और सबसे प्रभावशाली आवाज चाहिए- तो तुम्हारे पास वह भाषा मौजूद हो।”

इस हिंदी दिवस पर हिंदी से यह मत पूछिए कि-“तुम्हें कैसे बचाऊँ?”

हिंदी से पूछिए-“तुम्हारे सहारे मैं कितना आगे जा सकता हूँ?” और हिंदी बतायेगी तुम्हें कैसे और कितना …

रविकान्त राऊत

जबलपुर,मध्यप्रदेश

9425611243

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *