महीने की पहली तारीख़ को जब सैलरी स्लिप खुलती है, तो ज़्यादातर लोग सीधे एक ही आंकड़े पर नज़र डालते हैं — “इन-हैंड” कितना आया। बाकी की कटौतियां, चाहे वे टैक्स की हों या भविष्य निधि की, अक्सर एक धुंधली-सी लाइन भर होती हैं, जिन्हें कोई मुश्किल से पढ़ता है। लेकिन 17 सितंबर से देश के लाखों निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह धुंधली लाइन थोड़ी मोटी हो जाएगी। केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO के तहत अनिवार्य कवरेज की वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी है। बारह साल में पहली बार यह सीमा बदली है, और इसके दायरे में अब 51 लाख से ज़्यादा नए कर्मचारी आ जाएंगे।
सरकार इसे एक बड़ा कल्याणकारी कदम बता रही है — रिटायरमेंट सुरक्षा, पेंशन और बीमा का दायरा बढ़ाने वाला फैसला। कैबिनेट के मुताबिक इस पर सालाना करीब 11,339 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। अखबारों और सरकारी बयानों में यह खबर वैसी ही चमक के साथ छपी है जैसे कोई तोहफा दिया गया हो। लेकिन जिस दिन यह खबर आई, उसी दिन कई फाइनेंस सलाहकारों और श्रमिक संगठनों ने भी एक अलग सवाल उठाया — क्या इससे उन्हीं कर्मचारियों की आज की सैलरी घट जाएगी, जिन्हें यह “फायदा” दिया जा रहा है?
यही असली सवाल है, और यही वह जगह है जहां यह खबर सिर्फ एक सरकारी अधिसूचना से आगे बढ़कर एक गहरे सामाजिक प्रश्न में बदल जाती है: भारत का कामकाजी वर्ग आज जितना कमाता है, उसमें से कितना हिस्सा उसकी अपनी मर्ज़ी से खर्च होना चाहिए, और कितना हिस्सा राज्य को उसकी जगह तय करने का हक़ है — “तुम्हारे भले के लिए”?
समझना ज़रूरी है कि EPFO की व्यवस्था कैसे काम करती है। जिस कर्मचारी की मूल वेतन तय सीमा से कम होती है, उसके लिए भविष्य निधि में योगदान अनिवार्य है — कर्मचारी की तनख्वाह से 12 प्रतिशत कटता है, और उतना ही हिस्सा कंपनी की तरफ से जुड़ता है। सीमा से ऊपर वालों के लिए यह वैकल्पिक हो जाता है। 2014 में यह सीमा 6,500 से बढ़ाकर 15,000 रुपये की गई थी। तब से महंगाई काफी आगे निकल चुकी है, न्यूनतम मज़दूरी के मानक बदल चुके हैं, शहरी जीवन-यापन की लागत दोगुनी से ज़्यादा हो चुकी है — लेकिन यह सीमा बारह साल तक जस की तस रही। इस लिहाज़ से देखें तो सीमा बढ़ाना सैद्धांतिक रूप से एक ज़रूरी और देर से उठाया गया कदम लगता है।
लेकिन आंकड़ों की एक दूसरी परत भी है, जो कम चर्चा में आती है। EPFO के पास आज करीब 7.98 करोड़ अंशधारक सदस्य हैं और करीब 82 लाख पेंशनभोगी। यह संख्या बड़ी लगती है, लेकिन भारत के कुल कार्यबल — जो 55-60 करोड़ के आसपास है — के सामने यह मुश्किल से 10-12 प्रतिशत बैठती है। बाकी नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा कामगार — रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू सहायक, निर्माण मज़दूर, छोटे दुकानों के कर्मचारी, और अब तेज़ी से बढ़ता गिग-वर्कफोर्स यानी डिलीवरी और कैब चलाने वाले — इस पूरी व्यवस्था से पूरी तरह बाहर हैं। यानी जिस सुरक्षा-चक्र को आज और मज़बूत किया जा रहा है, वह पहले से ही एक संकरा दायरा है, जिसके भीतर के लोगों को थोड़ी और सुरक्षा मिल रही है, जबकि बाहर खड़े बहुसंख्यक कामगारों के लिए कुछ नहीं बदल रहा।
अब असली पेच पर आते हैं। जब कोई कर्मचारी 16,000 या 20,000 रुपये कमाता है और उसकी पूरी बेसिक सैलरी अब अनिवार्य कटौती के दायरे में आ जाती है, तो उसके वेतन ढांचे में हिस्सेदारी बदल जाती है। कई कंपनियां अपने CTC यानी कुल लागत ढांचे को इस तरह बनाती हैं कि पीएफ योगदान बढ़ने का मतलब है किसी और मद — जैसे विशेष भत्ते या बोनस — में कटौती। नतीजा यह होता है कि हाथ में आने वाली रकम घट सकती है, भले ही कागज़ पर “कुल पैकेज” वही रहे। जिस कर्मचारी के लिए महीने के आख़िरी हफ्ते में हर हज़ार रुपये का हिसाब मायने रखता है — किराया, बच्चों की फीस, दवाई का खर्च — उसके लिए यह कोई मामूली बात नहीं। यह ठीक वैसा ही विरोधाभास है जो भारत की बहुत सी कल्याणकारी नीतियों में दिखता है: दीर्घकाल में भलाई, लेकिन तात्कालिक तकलीफ़ किसी और के हिस्से।
यहीं से एक ईमानदार जवाबी तर्क भी आता है, और उसे नज़रअंदाज़ करना ग़लत होगा। भारत में बचत की आदत और वित्तीय अनुशासन को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। स्वैच्छिक पेंशन योजनाओं में भागीदारी बहुत कम है, ज़्यादातर लोग रिटायरमेंट के करीब पहुंचकर पाते हैं कि उनके पास कोई ठोस सहारा नहीं है, और परिवार पर निर्भरता ही आखिरी विकल्प बचती है। ऐसे में अनिवार्य बचत, चाहे वह कितनी भी अलोकप्रिय क्यों न लगे, एक तरह का सुरक्षा-कवच है जो व्यक्ति को उसकी अपनी अल्पकालिक सोच से बचाता है। श्रम अर्थशास्त्री अक्सर यही दलील देते हैं कि अगर बचत को विकल्प पर छोड़ दिया जाए, तो बहुसंख्यक लोग उसे टालते चले जाएंगे — और तीस साल बाद वही सरकार, वही समाज, बुज़ुर्गों की गरीबी का बोझ उठाएगा। इस नज़रिए से देखा जाए तो पीएफ सीमा बढ़ाना नासमझी नहीं, बल्कि एक ज़रूरी पितृसत्तात्मक — या कहें तो अभिभावकीय — हस्तक्षेप है।
सवाल यह नहीं है कि इनमें से कौन सा पक्ष पूरी तरह सही है। सवाल यह है कि भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया अक्सर इन दोनों सचाइयों — तात्कालिक तंगी और दीर्घकालिक सुरक्षा — के बीच के तनाव को स्वीकार ही नहीं करती। नीति एक साथ दोनों होने का दावा करती है: “तुम्हारा फायदा भी होगा और तकलीफ़ भी नहीं होगी।” जबकि हक़ीक़त यह है कि कोई भी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था मुफ्त नहीं होती — उसकी कीमत आज चुकानी पड़ती है ताकि कल का जोखिम कम हो सके। जब तक सरकार, कंपनियां और कर्मचारी संगठन इस तनाव को खुलकर स्वीकार नहीं करते और वेतन ढांचे में पारदर्शिता नहीं लाते — यानी यह साफ़ नहीं करते कि किस मद से कितना पैसा किधर जा रहा है — तब तक हर ऐसा सुधार शक और अफवाह के बीच फंसा रहेगा।
और असली चुनौती इससे भी बड़ी है। जिस देश में कार्यबल का बड़ा हिस्सा गिग इकॉनमी और असंगठित क्षेत्र की तरफ खिसक रहा है, वहां EPFO जैसी पुरानी, नौकरी-केंद्रित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की सीमाएं साफ़ दिखने लगी हैं। एक डिलीवरी पार्टनर जो तीन अलग-अलग ऐप के लिए काम करता है, उसका न कोई “नियोक्ता” तय है, न कोई बेसिक सैलरी। उसके लिए 15,000 या 25,000 की सीमा का कोई मतलब ही नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए था कि सामाजिक सुरक्षा को नौकरी से अलग करके व्यक्ति से कैसे जोड़ा जाए, ताकि वह एक कंपनी से दूसरी कंपनी, एक शहर से दूसरे शहर, एक तरह के काम से दूसरी तरह के काम में जाने पर भी अपने साथ बनी रहे। इस दिशा में सोचे बिना, सीमा को 15,000 से 25,000 करना पुरानी इमारत में एक और मंज़िल जोड़ने जैसा है, जबकि नींव खुद बदलते वक़्त के हिसाब से तैयार ही नहीं है।
आने वाले सालों में जब यह नई सीमा असर दिखाना शुरू करेगी, तो असली परीक्षा यह होगी कि क्या कंपनियां वेतन ढांचे को ईमानदारी से समायोजित करती हैं, या इसे दरकिनार करने के नए तरीके खोज लेती हैं — जैसा वेतन-सीमा से बचने के लिए बेसिक को कम और भत्तों को ज़्यादा दिखाने का पुराना खेल अक्सर होता रहा है। और यह भी देखना होगा कि क्या सरकार इसी गति और इच्छाशक्ति से उन नब्बे प्रतिशत कामगारों की तरफ भी बढ़ती है, जिनके लिए फिलहाल कोई ऐसी सीमा मायने ही नहीं रखती, क्योंकि उनके पास कोई सीमा है ही नहीं — न ऊपर, न नीचे, बस असुरक्षा की एक खुली ज़मीन। एक कर्मचारी की आज की तनख्वाह से चंद रुपये कम होना उतनी बड़ी खबर नहीं है जितनी यह बात कि सुरक्षा का यह दायरा अब भी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है जो पहले से किसी न किसी हद तक सुरक्षित हैं।
