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वंदे मातरम :एक गीत जिसे अनुमति नहीं, बराबरी चाहिए थी

15 अगस्त की सुबह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर पर पहुँचेंगे, तो पहली आवाज़ जन गण मन की नहीं होगी। आज़ादी के अस्सी बरस में पहली बार, उनके भाषण से ठीक पहले वंदे मातरम् गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान अपनी तय जगह पर रहेगा। रक्षा मंत्रालय ने इसे वंदे मातरम् के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने का सम्मान बताया है। लेकिन इस घोषणा के ठीक भीतर एक दूसरी, कम चर्चित खबर छिपी है, जो असल में ज़्यादा वज़नदार है: जुलाई में संसद ने प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट – 1971 (राष्ट्रीय सम्मान के अपमान के रोकथाम अधिनियम- 1971) में संशोधन कर वंदे मातरम् को कानूनी तौर पर राष्ट्रगान के बराबर संरक्षण दे दिया है। अब इसका जानबूझकर अनादर भी उतना ही दंडनीय अपराध होगा।
असली सवाल यह नहीं है कि लाल किले पर एक और गीत गाया जाएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि एक राष्ट्रीय प्रतीक को औपचारिक बराबरी देना समाज को जोड़ता है, या किसी पुराने घाव को दोबारा हवा देता है?
यह गीत भारत के इतिहास में कभी तटस्थ नहीं रहा। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे 1876 में लिखा, रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में यह पहली बार सार्वजनिक रूप से गूँजा। इसके बाद के पचास वर्षों में यह उन हज़ारों लोगों की आवाज़ बना जिन्होंने इसे गाते हुए जेल की सज़ा काटी, औपनिवेशिक सत्ता ने कई बार इसके सार्वजनिक गायन पर पाबंदी तक लगाई। लेकिन यही गीत 1937 में कांग्रेस के भीतर एक कठिन बहस का विषय भी बना। मुस्लिम लीग ने इसमें दुर्गा-स्तुति की छवि पर आपत्ति जताई, और नेहरू की अध्यक्षता वाली कार्यसमिति ने एक व्यावहारिक समझौते के तहत केवल पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक अवसरों के लिए मान्य किया। यह कोई नैतिक सहमति नहीं थी बल्कि यह एक बंटते हुए देश को किसी तरह साथ रखने की कोशिश थी और यही वजह है कि आज की घोषणा को केवल संगीत या प्रोटोकॉल की खबर मानना उसकी पूरी परत को नज़रअंदाज़ करना होगा।
दुनिया में दो राष्ट्रगीतों को बराबर दर्जा देने की मिसाल बिल्कुल नई नहीं है। न्यूज़ीलैंड और डेनमार्क ऐसे इकलौते दो देश हैं जिनके पास औपचारिक रूप से समान दर्जे के दो राष्ट्रगान हैं। न्यूज़ीलैंड में “गॉड डिफेंड न्यूज़ीलैंड” को पहले 1940 में, अपने स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष में, राष्ट्रगीत का दर्जा मिला और फिर 1977 में जनता की मांग पर इसे “गॉड सेव द किंग” के बराबर औपचारिक मान्यता दी गई। डेनमार्क में एक गीत राजपरिवार और सैन्य अवसरों के लिए है, दूसरा नागरिक जीवन के लिए – दोनों साथ-साथ चलते हैं, बिना किसी टकराव के। यह पैटर्न दिलचस्प है: राष्ट्र अक्सर किसी बड़े वर्षगांठ के मौके पर ही अपने प्रतीकों को नई औपचारिक हैसियत देते हैं, जैसा भारत आज वंदे मातरम् के डेढ़ सौवें वर्ष में कर रहा है।
लेकिन यहीं यह तुलना अपनी सीमा भी दिखा देती है। न्यूज़ीलैंड या डेनमार्क के दोनों गीतों के बीच कोई धार्मिक विभाजन-रेखा कभी नहीं थी – वहाँ फर्क सिर्फ अवसर और औपचारिकता का था। भारत में मामला संरचनात्मक रूप से अलग है। वंदे मातरम् की छवियाँ मातृभूमि को देवी के रूप में देखती हैं, और यही बात 1937 में भी विवाद की जड़ थी और आज भी कुछ वर्गों के लिए असहजता का कारण बनी रहती है। इसलिए इसे केवल “एक और राष्ट्रगीत जुड़ गया” कहकर टाल देना उस ऐतिहासिक जटिलता के साथ अन्याय होगा जिससे यह गीत होकर गुज़रा है।
जो लोग इस कदम का समर्थन करते हैं, उनका तर्क वाजिब है कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा था, इसके लिए लोग जेल गए, और 1937 की कटौती एक मजबूरी थी, सहमति नहीं। डेढ़ सौ साल पूरे होने पर इसे उसका पूरा सम्मान लौटाना किसी को हाशिए पर धकेलना नहीं, बल्कि एक अधूरे कर्ज़ को चुकाना है और जिससे संविधान में राष्ट्रगान की सर्वोच्चता पर कोई आँच नहीं आई, बस इतना हो रहा है कि वंदे मातरम् केवल पहले प्रस्तुत हो रहा है, उसे प्रतिस्थापित नहीं कर रहा। दूसरी तरफ यह चिंता भी उतनी ही ठोस है कि इस समय जब देश की राजनीति पहले से ध्रुवीकृत है, ठीक उसी समय एक धार्मिक रूप से संवेदनशील प्रतीक को कानूनी दंड के दायरे में लाना उसे साझा विरासत से बदलकर अनिवार्य निष्ठा-परीक्षा में तब्दील कर सकता है , वही जोखिम जिसे टालने के लिए 1937 का समझौता हुआ था।
गीत के ऐतिहासिक कद को नकारना बेईमानी होगी- बंकिम की कलम, टैगोर का स्वर, और उन गुमनाम कैदियों की याद जिन्होंने इसे गाते हुए सज़ा भुगती, यह सब वाकई डेढ़ सौवें वर्ष के उत्सव का हक़दार है। लेकिन जिस पल यह उत्सव कानूनी दंड की भाषा से जुड़ जाता है, उसी पल एक साझा स्मृति एक अनिवार्य वफादारी-परीक्षण में बदलने का खतरा उठाने लगती है। किसी राष्ट्र के प्रतीकों में उसकी ताकत तब सबसे ज़्यादा दिखती है जब उन्हें कानून के सहारे की ज़रूरत ही न पड़े।

आज़ादी के अस्सी साल बाद भी हम यह तय कर रहे हैं कि हमारे राष्ट्रीय प्रतीक हमें किस तरह याद दिलाएं कि हम कौन हैं , बिना यह भुलाए कि हम कितने अलग-अलग रास्तों से यहाँ तक पहुँचे हैं। 15 अगस्त की सुबह जब लाल किले की प्राचीर से वह पुराना गीत गूँजेगा, तो असली परीक्षा यह नहीं होगी कि वह कितने लाउडस्पीकरों तक पहुँचा बल्कि यह होगी कि उसे सुनने वाला हर नागरिक उसमें अपनी ही आवाज़ पहचानता है, या किसी और की अनुमति या ज़बरदस्ती से बजता हुआ एक गीत भर।

Ravikant Raut

9425611243

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