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प्यार को पलों में मत तौलिये

उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था कणाद, पूरे पैंतालीस मिनट गाड़ी चलाकर, भीगते हुए, हाथ में गरमागरम सूप का थर्मस लिए। एक घंटा बैठा रहा। मेरी बॉटल में पानी भरा, दो चुटकुले सुनाए, मेरी हंसी लौटाई… और चला गया।
फिर? फिर दो महीने की खामोशी।
अब आप सोचिए, क्या कणाद बुरा इंसान था? नहीं। उस शाम वो सच में मौजूद था, सच में फ़िक्रमंद था। पर यहीं वो सवाल छिपा है, जिसे हम अक्सर पूछना भूल जाते हैं, क्या इंसान की नीयत उतनी ही काफी है, जितनी उसकी निरंतरता?
हम इंसान अजीब हिसाब लगाते हैं। हम किसी की परख एक चमकते हुए पल से करते हैं, जैसे वो पल पूरी किताब का सार हो। कणाद की गीली शर्ट, उसका हांफना, उसका “बस पहुंच रहा हूं” वाला मैसेज, ये सब इतना असली लगा कि मैंने उसे तुरंत अपने दिल के सबसे ऊपर वाले खाने में रख दिया। “ये है असली दोस्त” मैंने खुद से कहा
पर फ़लसफ़ा कुछ और कहता है। अरस्तू ने एक बार कहा था कि एक कली के खिल आने से बहार नहीं आती। किसी के साथ का एक अच्छा पल, एक अच्छा इंसान होने का सबूत नहीं। वो सिर्फ एक अच्छा पल है और हम अक्सर इसी भूल में जीते हैं , पल को चरित्र समझ बैठते हैं।
सोचिए, कितनी बार आपने भी किसी को सिर्फ इसलिए माफ़ किया, क्योंकि एक बार उसने आपको ठीक वक़्त पर बचाया था? कितनी बार आपने किसी की चुप्पी को नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि आपकी यादों में उसकी एक झलक अब भी चमकती रहती है?
यही वो जगह है जहां प्यार और आदत का फ़र्क़ धुंधला हो जाता है। प्यार एक एहसास है , पल भर का, तीव्र, गर्मजोशी से भरा हुआ। पर रिश्ता? रिश्ता एक अनुशासन है। एक रोज़ की चुनी हुई मौजूदगी। बेशक कोई , एक दिन आपके लिए तूफ़ान से लड़ सकता है, और अगले साठ दिन आपको भूल भी सकता है, क्योंकि इंसानी दिल जज़्बात में जीता है, पर रिश्ते वादों में जीते हैं।
तो सवाल ये नहीं कि कणाद ने सूप लाकर क्या साबित किया। सवाल ये है , क्या वो पल एक आदत बना, या सिर्फ एक अपवाद रह गया?
निरंतरता… यही वो पैमाना है जिससे हमें सच में इंसान को नापना चाहिए। किसी की मौजूदगी का हिसाब उसके सबसे शानदार पल से मत लगाइए, उसके सबसे मामूली, सबसे उबाऊ, सबसे “कुछ खास नहीं हुआ” वाले दिनों से लगाइए। क्या वो उन दिनों में भी है? जब कोई तूफ़ान नहीं, कोई बुखार नहीं, कोई इमरजेंसी नहीं , सिर्फ एक साधारण मंगलवार है?
क्योंकि यही वो सच है जो कोई नहीं बताता , एक शानदार पल, हज़ार खामोश हफ़्तों को छुपाने की सबसे खूबसूरत आड़ बन जाता है। वो पल हमारी याददाश्त में इतनी रोशनी भर देता है कि हम बाकी के अंधेरे को देख ही नहीं पाते।
तो अगली बार जब कोई आपके लिए बारिश में भीगकर सूप लाए, उसकी तारीफ़ ज़रूर कीजिए। पर उसे तुरंत “सच्चा” घोषित मत कीजिए। बस चुपचाप एक सवाल अपने भीतर रख लीजिए, और वक़्त को जवाब देने दीजिए।
कणाद की उस दो महीने की चुप्पी के बाद, तीसरे महीने की एक शाम, दरवाज़े की घंटी फिर बजी…
सामने एक अजनबी लड़की खड़ी थी उसने कहा, “मैं कणाद की बहन हूं।
मेरे मन में हज़ार सवाल उमड़े, पर ज़ुबान पर सिर्फ एक आया , “कणाद कैसा है? दो महीने से कोई खबर नहीं…”
वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “उसी रात, आपके घर से लौटते वक़्त, उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था। रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट। तब से अस्पताल और फिर घर पर बिस्तर पर है। बोल नहीं पाता ठीक से, फ़ोन पकड़ नहीं पाता। पर हर हफ़्ते पूछता है ,’उसे बता देना मैं ठीक हूं, बस अभी मिल नहीं सकता।'”
मैं वहीं दरवाज़े पर खड़ा रह गया। जो चुप्पी मुझे बेवफ़ाई लगी थी, वो असल में एक जिस्म की खामोशी थी , मजबूरी की, न कि दिल की। जिस “अनुपस्थिति” को मैंने उसके चरित्र का पैमाना बना लिया था, वो असल में उसी रात के प्यार की कीमत थी, जो उसने मेरे लिए चुकाई। मैंने सोचा मैं भी तो एकतरफ़ा कयास लगाने का ही काम किया था, मैंने खुद भी कहां उसकी कोई खोजखबर लेने की कोशिश की थी भला ।
अब सोचिए , मैंने अभी-अभी जो दर्शन आपको सुनाया, कि “पल को आदत से मत तौलो, निरंतरता देखो” , क्या वो अब भी उतना ही सच है?
हां। और यहीं इस कहानी की सबसे गहरी परत खुलती है।
निरंतरता का मतलब हमेशा “रोज़ मौजूद रहना” नहीं होता। कभी-कभी निरंतरता उस नीयत में होती है जो हमें दिखती ही नहीं, किसी के दिल में, किसी की मजबूरी के पीछे, किसी की खामोशी की तह में दबी रहती है। हम अक्सर किसी की ग़ैर-मौजूदगी को धोखा समझ बैठते हैं, जबकि हक़ीक़त में वो सिर्फ हमारी नज़र की सीमा होती है।
तो सबक अब दोगुना गहरा हो जाता है। मेरी कही पहली बात कि प्यार को पलों में मत तौलिए, निरंतरता में देखिए , ये सच है। पर ये भी उतना ही सच है कि किसी की खामोशी को भी फ़ौरन फ़ैसला मत बनाइए। क्योंकि कभी-कभी जो इंसान सबसे ज़्यादा चुप होता है, वो सबसे ज़्यादा जूझ रहा होता है।
रिश्तों की असली परीक्षा सिर्फ ये नहीं कि दूसरा कितनी बार लौटा। असली परीक्षा ये है, जब जवाब न मिले, तब हम कौन सी कहानी खुद को सुनाना चुनते हैं? गुस्से की, शक की या भरोसे और सब्र की?
तो अगली बार जब कोई अचानक ग़ायब हो जाए तो उससे पूछिए ज़रूर, गुस्सा भी कीजिए अगर उस पर आपका हक़ है तो , पर एक पल के लिए ये भी सोचिए – क्या हो अगर उनकी खामोशी के पीछे कोई ऐसी वजह हो, जो अभी आपको नहीं दिखती?
क्योंकि रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा ये नहीं कि हम कितना प्यार पाते हैं। सबसे बड़ी परीक्षा ये है कि हम बिना पूरी कहानी जाने, कितना इंसाफ़ करना चुनते हैं।
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Ravikant Raut
9425611243

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