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बहुध्रुवीयता का दिल्ली संस्करण

बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात साल में पहली बार भारत की धरती पर कदम रखते हुए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामफोसा, ये सब एक ही मेज़ पर बैठे, और मेज़बानी भारत के हाथ में थी। अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर सहमति बनवाई, उसे कूटनीतिक हलकों में पहले ही मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी बहुपक्षीय उपलब्धियों में गिना जाने लगा है। मगर तालियों की गूंज थमते ही एक सवाल खड़ा हो गया है, जो शायद घोषणापत्र के एक सौ चालीस बिंदुओं से कहीं ज्यादा अहम है: भारत बहुध्रुवीय दुनिया के नेतृत्व का दावा तो कर रहा है, पर क्या वह उस दावे की कीमत चुकाने को तैयार है?

सतह पर देखें तो यह भारत के लिए संतोष की घड़ी है। ग्यारह देशों वाला यह समूह दुनिया की करीब उनचास प्रतिशत आबादी और चालीस प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिनिधित्व करता है यानी कमरे में बैठे नेता कोई हाशिए के देश नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग आधा हिस्सा थे। भारत ने ‘रेज़िलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन ऐंड सस्टेनेबिलिटी’ की थीम के तहत इस अध्यक्षता को जिस तरह संभाला, उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यही थी कि क्या रूस और चीन जैसे देशों को, जो पश्चिम के साथ सीधे टकराव में हैं, और भारत को, जो अभी भी अमेरिका के साथ एक बड़ी व्यापार डील की उम्मीद पाले बैठा है, एक ही घोषणापत्र पर राज़ी किया जा सकता है। यह हो गया संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग, पश्चिम एशिया में नागरिक ठिकानों पर हमलों को लेकर चिंता, फिलिस्तीन के राष्ट्र     दर्जे का समर्थन, आतंकवाद की निंदा सब कुछ एक साथ, बिना किसी एक सदस्य को खुलकर अमेरिका   विरोधी खेमे में धकेले।

यहीं भारत की चतुराई भी झलकती है और उसकी दुविधा भी। साझा मुद्रा का कोई एलान नहीं हुआ, यह अटकल पहले से थी कि ब्रिक्स डॉलर को चुनौती देने वाली मुद्रा ला सकता है, पर भारत ने इसे सायास टाला। इसके बजाय राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और सीमा पार भुगतान तंत्र को मजबूत करने पर सहमति बनी। यह फर्क मामूली नहीं है। भारत जानता है कि डॉलर विरोधी किसी भी कदम का सीधा निशाना अमेरिका के गुस्से के रूप में उसी पर आ गिरेगा, ठीक उसी वक्त जब वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल बाईस सितंबर को वाशिंगटन जाकर तरजीही शुल्क दर पर बातचीत करने वाले हैं। यानी एक हाथ से भारत बहुध्रुवीयता का झंडा बुलंद कर रहा है, दूसरे हाथ से वही भारत उसी अमेरिका की चौखट पर रियायत मांग रहा है जो ब्रिक्स को खुलेआम ‘अमेरिका     विरोधी’ करार दे चुका है। ट्रंप प्रशासन का यह रुख कोई ढकी छुपी बात नहीं और भारत की पूरी रणनीति इसी विरोधाभास को साधने पर टिकी है कि वह बिना किसी को नाराज़ किए दोनों तरफ बना रहे।

इस सम्मेलन का सबसे भावुक क्षण शायद मोदी-शी मुलाकात रही, जहां सात साल के अंतराल और गलवान की कड़वाहट के बाद दोनों नेता एक साथ दिखे। मोदी ने साफ कहा कि सीमा पर शांति ही रिश्तों की असली कुंजी है, एक वाक्य जितना कूटनीतिक रूप से सही, उतना ही उन ज़ख्मों की याद भी दिलाता है जो अभी भरे नहीं हैं। असल सवाल यह है कि क्या एक शिखर सम्मेलन की गर्मजोशी सीमा पर तैनात सेनाओं के बीच के अविश्वास को पिघला सकती है, या यह सिर्फ कैमरों के लिए बनाई गई एक तस्वीर है जिसकी उम्र अगले टकराव तक ही है। भारत का अतीत इस मामले में सतर्क रहना सिखाता है , डोकलाम से पहले भी और तिआनजिन की मुलाकात के बाद भी बड़े वादे हुए थे, और हर बार ज़मीन पर हकीकत कुछ और निकली।

आलोचकों का यह कहना गलत नहीं कि भारत की यह ‘न पश्चिम -विरोधी, न पश्चिम -समर्थक’ वाली संतुलन- रेखा दिन ब दिन पतली होती जा रही है। ईरान सऊदी अरब और ईरान, यूएई के बीच की तल्खी, चीन-भारत का पुराना अविश्वास, यह सवाल कि ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी मंच बनना चाहिए या सिर्फ बहुध्रुवीयता का पक्षधर ये सारे मतभेद घोषणापत्र की स्याही सूखते ही फिर सतह पर आ सकते हैं। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति इसलिए सराहनीय है कि वह किसी एक खेमे की बंधक नहीं बनना चाहती, लेकिन इस नीति की असली परीक्षा सम्मेलन कक्ष में नहीं, बल्कि उन पलों में होगी जब वाशिंगटन टैरिफ को हथियार बनाकर भारत से झुकने को कहेगा, या बीजिंग सीमा पर यथास्थिति बदलने की कोशिश करेगा।

यहीं भारत को साफ नज़र से देखना होगा: बहुध्रुवीय दुनिया की मेज़बानी कर लेना नेतृत्व नहीं है, नेतृत्व तब बनता है जब आपके पास इतनी आर्थिक और सामरिक ताकत हो कि कोई भी बड़ी शक्ति आपकी शर्तों को नज़रअंदाज़ न कर सके। इसके लिए घोषणापत्रों से ज्यादा ज़रूरत घरेलू विनिर्माण को मज़बूत करने की है, निर्यात बाज़ारों में विविधता लाने की है, और तकनीक व रक्षा में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की है ताकि अगली बार जब कोई देश तरजीही शुल्क का लालच दिखाए या सीमा पर आंख दिखाए, भारत को झुकना नहीं, बस अपनी बात दोहरानी भर पड़े।

दिल्ली में इस हफ्ते जो तस्वीरें खिंचीं, वे प्रभावशाली थीं। लेकिन कूटनीति तस्वीरों से नहीं, ताकत के संतुलन से चलती है। भारत ने मेज़बानी की परीक्षा पास कर ली है; असली इम्तिहान अब शुरू होता है- जब मेज़ से उठकर हर देश अपने हितों की तरफ लौट जाएगा, और भारत को अकेले तय करना होगा कि वह किस कीमत पर, कितनी दूर तक, यह संतुलन साध पाएगा।

रविकान्त राऊत

जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

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