← सभी रचनाएँ

जिनके पास कागज़ नहीं, क्या लोकतंत्र में उनकी जगह भी नहीं?

दिल्ली की एक बस्ती में रहने वाला मज़दूर, जो पिछले पंद्रह बरसों से हर चुनाव में वोट डालता आया है, अचानक पाता है कि उसका नाम मतदाता सूची से ग़ायब है। कोई अपराध नहीं, कोई शिकायत नहीं -बस एक फ़ॉर्म में उसकी जानकारी “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” या “अनमैप्ड” की श्रेणी में डाल दी गई। उसे पता भी नहीं कि इसका मतलब क्या होता है, फिर भी उसे साबित करना होगा कि वह मौजूद है, कि वह नागरिक है, कि वह मतदाता है। यह किसी एक आदमी की कहानी नहीं है। यह लाखों लोगों की कहानी है, और यही वजह है कि यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक ख़बर नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की एक गहरी परीक्षा बन गई है।

पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण – यानी एसआईआर – को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। दिल्ली की मसौदा सूची से करीब 47 लाख नाम हटाए जा चुके हैं, और लगभग 33 लाख लोगों को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” और “अनमैप्ड” जैसी तकनीकी वजहों से नोटिस भेजे गए हैं। कोर्ट में 22 सितंबर को इस पर सुनवाई तय हुई है। यह अकेला मामला नहीं है – पश्चिम बंगाल में हाल के पुनरीक्षण में करीब 90 लाख नाम, यानी वहां की मतदाता सूची का करीब बारह फ़ीसदी हिस्सा, सूची से बाहर हो चुका है। झारखंड और पंजाब में नाम जुड़वाने की तारीख़ें बार-बार बढ़ानी पड़ी हैं, जो अपने आप में बताता है कि पहली बार में कुछ ठीक नहीं बैठा।

चुनाव आयोग का तर्क सीधा है – मतदाता सूची में मृत लोगों के नाम, दोहरे नाम, स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम बरसों से जमा हैं, और एक स्वच्छ, भरोसेमंद सूची लोकतंत्र की बुनियादी ज़रूरत है। यह तर्क ग़लत नहीं है। कोई भी लोकतंत्र ऐसी मतदाता सूची पर टिका नहीं रह सकता जिसमें फ़र्ज़ी नाम भरे हों या जो दशकों से अपडेट ही न हुई हो। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सफ़ाई ज़रूरी है या नहीं। असली सवाल यह है: यह सफ़ाई किसकी क़ीमत पर हो रही है, और क्या हमने यह तय करने का बोझ सही तरीक़े से बाँटा है कि कौन नागरिक है और कौन नहीं?

भारत में दस्तावेज़ होना अब भी एक तरह का विशेषाधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं। जिस मज़दूर ने गांव से शहर की तरफ़ पलायन किया, जिस महिला की शादी के बाद पते बदल गए और जिसके नाम पर कोई संपत्ति दस्तावेज़ नहीं है, जिस बुज़ुर्ग के पास आधार तो है पर जन्म प्रमाण पत्र नहीं – इन सबके लिए “अपने होने का सबूत” देना उतना आसान नहीं जितना एक शहरी, पढ़े-लिखे, स्थायी पते वाले नागरिक के लिए होता है। यही वजह है कि आलोचक बार-बार यही आरोप दोहराते रहे हैं कि दस्तावेज़ी सख़्ती की सबसे भारी मार ग़रीबों, प्रवासी मज़दूरों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर पड़ती है – उन्हीं समूहों पर, जो पहले से ही व्यवस्था के हाशिए पर खड़े हैं।

यह पहली बार नहीं है कि यह बहस उठी है। बिहार में हुए पहले एसआईआर से लेकर पश्चिम बंगाल और अब दिल्ली तक, हर बार वही पैटर्न दोहराया गया है — बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाते हैं, विपक्षी दल हंगामा करते हैं, अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जाता है, और अंत में कुछ राहत के साथ मामला अगली सुनवाई तक टल जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मई में एक अहम फ़ैसले में कहा था कि एसआईआर चुनाव आयोग के संवैधानिक दायरे में आता है और यह मुक्त व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की उसकी ज़िम्मेदारी से मेल खाता है। यानी प्रक्रिया की वैधता पर कोर्ट ने मुहर लगा दी। लेकिन कोर्ट ने साथ ही यह भी साफ़ किया कि नाम कटने से किसी की नागरिकता या सरकारी योजनाओं के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता, सिर्फ़ वोट देने का अधिकार प्रभावित होता है। यह बात सुनने में तसल्ली देने वाली लगती है, पर ठहर कर सोचें तो उतनी ही चिंताजनक भी है – क्योंकि जिस अधिकार को “सिर्फ़” कहकर बात टाली जा रही है, वही अधिकार लोकतंत्र में नागरिक होने का सबसे ठोस प्रमाण है। वोट का अधिकार कोई सुविधा नहीं है जिसे प्रक्रिया की भेंट चढ़ाया जा सके।

यहीं यह मामला उतना सीधा नहीं रह जाता जितना पहली नज़र में लगता है। एक तरफ़ यह सही है कि चुनाव आयोग को कोई भी सूची बनाने से पहले पुरानी गड़बड़ियां दूर करने का अधिकार है, और बार-बार यह मांग भी उठती रही है कि फ़र्ज़ी मतदाताओं पर लगाम लगे। दूसरी तरफ़ यह भी उतना ही सच है कि जब किसी बड़ी प्रशासनिक मशीनरी को थोड़े समय में करोड़ों नामों की पुष्टि करनी होती है, तो ग़लतियां असाधारण नहीं, बल्कि तय होती हैं और वे ग़लतियां किसी अमीर के दरवाज़े पर कम, किसी झुग्गी या गांव के दरवाज़े पर ज़्यादा दस्तक देती हैं। यह किसी एक पार्टी या सरकार की साज़िश कहकर टाल देने वाला मसला नहीं है – यह व्यवस्था की बनावट का सवाल है।

निष्पक्ष होकर देखें तो सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक अरब चालीस करोड़ की आबादी वाले देश में मतदाता सूची को समय-समय पर दुरुस्त करना कोई विलासिता नहीं, ज़रूरत है। अगर सूची में मृत या स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम बने रहें, तो वह भी लोकतंत्र के लिए उतना ही ख़तरनाक है जितना असली मतदाताओं का नाम कट जाना। आलोचना करने वाले दल भी, जब सत्ता में होते हैं, अक्सर उसी सूची और उसी प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं जिसका विरोध वे विपक्ष में रहते हुए करते हैं। यानी यह मसला जितना सैद्धांतिक दिखता है, उतना ही राजनीतिक सुविधा का भी है।

फिर भी, इन दोनों पक्षों को साथ रखकर देखने के बाद जो बात साफ़ उभरती है, वह यह है कि प्रक्रिया की मंशा चाहे कितनी भी नेक हो, उसका बोझ जिस तरह बंटा है वह अनुचित है। जब किसी नागरिक को अपने वोट के अधिकार को बचाने के लिए ख़ुद दफ़्तरों के चक्कर काटने पड़ें, दस्तावेज़ जुटाने पड़ें, और साबित करना पड़े कि वह मौजूद है  जबकि ग़लती व्यवस्था की बनाई हुई हो  तो यह ज़िम्मेदारी का उल्टा बंटवारा है। एक सभ्य लोकतंत्र में सबूत का बोझ नागरिक पर नहीं, राज्य पर होना चाहिए। यानी अगर किसी नाम को हटाना है तो यह साबित करने का काम प्रशासन का होना चाहिए कि वह नाम फ़र्ज़ी है, न कि नागरिक पर यह साबित करने की ज़िम्मेदारी डाल देना कि वह असली है। यही फ़र्क़ शासन और लोकतंत्र के बीच की महीन रेखा तय करता है।

इसका असर सिर्फ़ इस चुनाव या उस चुनाव तक सीमित नहीं रहने वाला। अगर हर कुछ बरस में लाखों नाम “प्रशासनिक सफ़ाई” के नाम पर सूची से बाहर होते रहे, और हर बार सबसे कमज़ोर तबका सबसे ज़्यादा प्रभावित होता रहा, तो धीरे-धीरे लोकतंत्र में भरोसे की जगह डर ले लेगा। लोग वोट डालने से पहले यह सोचने लगेंगे कि कहीं उनका नाम पहले ही तो नहीं कट गया, और यह डर, यह अनिश्चितता, अपने आप में मतदाता को व्यवस्था से दूर कर देती है। जो लोकतंत्र नागरिक की भागीदारी पर टिका है, वह उसी नागरिक को प्रक्रिया से डराकर मज़बूत नहीं हो सकता।

तो अंत में सवाल यह नहीं रह जाता कि मतदाता सूची साफ़ होनी चाहिए या नहीं  इस पर शायद ही किसी को एतराज़ हो। असली सवाल यह है कि हम सफ़ाई की क़ीमत किससे वसूल रहे हैं। जिस देश ने आज़ादी के फ़ौरन बाद, अनपढ़, ग़रीब और अभावग्रस्त जनता को वयस्क मताधिकार देकर दुनिया को चौंका दिया था, उसी देश में सत्तर बरस बाद अगर एक मज़दूर या एक बुज़ुर्ग महिला को अपने वोट के लिए काग़ज़ों का पुलिंदा लेकर दफ़्तरों में भटकना पड़े, तो यह प्रगति नहीं, एक तरह की चूक है। सूची से मिटा हुआ नाम सिर्फ़ काग़ज़ पर मिटी हुई इबारत नहीं होता  वह किसी के लोकतंत्र में होने के एहसास का मिटना होता है, और यही एहसास बचा पाना, किसी भी दस्तावेज़ी सफ़ाई से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।

रविकान्त राऊत , 
जबलपुर, मध्य प्रदेश 
9425611243

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *