

मेहताजी ने पूरी ज़िंदगी एक ही सपना देखा —
“रेटायरमेंट के बाद आराम करूँगा।”
नौकरी में — “अभी थोड़ा और।” त्योहार में — “रिटायर होने दो, फिर मनाएँगे।” बच्चों के साथ — “अभी टाइम नहीं। रिटायर होने दो।” पत्नी के साथ — “अभी टेंशन है। रिटायर होने दो।”
रेटायरमेंट आई।
पहला दिन — चाय पी। अख़बार पढ़ा। अच्छा लगा।
पहला हफ़्ता — फिर चाय। फिर अख़बार। थोड़ा कम अच्छा लगा।
पहला महीना — बेटे ने कहा, “पिताजी, आप घर पर रहते हो तो काम वाली बाई काम नहीं करती — आप टोकते रहते हो।”
तीसरा महीना — बहू ने कहा, “पिताजी, आपकी कोई हॉबी नहीं है क्या?”
छठा महीना — पड़ोसी ने कहा, “रिटायर्ड हो? बड़े लकी हो।”
मेहताजी ने सोचा — लकी ?
एक साल बाद — मेहताजी सुबह चार बजे उठते हैं।
इसलिए नहीं कि काम है।
इसलिए कि नींद नहीं आती।
बैठे रहते हैं अँधेरे में।
उस आराम का इंतज़ार करते हुए —
जो आया था।
पर जिसका वे कभी अभ्यास नहीं किया था।
रविकांत राऊत
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243
