
मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर इंदौर समाचार पत्र में समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’ द्वारा दी गई पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय अनुभव है।
समीक्षा के अंश :
कविता वह विधा है जो मनुष्य के अंतर्मन की अनुभूतियों को शब्दों का स्पर्श देती है। जब कोई कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में छिपे असाधारण भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, तब उसकी रचनाएँ सीधे पाठक के हृदय तक पहुँच जाती हैं। समकालीन हिंदी कविता में रविकांत राऊत ऐसे ही संवेदनशील रचनाकार हैं। रविकांत राऊत एक ऐसे कवि हैं, जिनकी लेखनी जीवन के साधारण अनुभवों में भी असाधारण संवेदनाओं का स्पर्श खोज लेती है।
उनका कविता-संग्रह “देह रुकी, मन बह चला” इसी संवेदनशील दृष्टि और सृजनात्मक परिपक्वता का सुंदर उदाहरण है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन की यात्रा का जीवंत दस्तावेज़ है। इस संग्रह में कुल 46 कविताएँ संकलित हैं। संग्रह की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि प्रत्येक कविता आकार में अपेक्षाकृत छोटी होते हुए भी अपने भीतर गहरे अर्थ समेटे हुए है।
वास्तव में रविकांत राऊत का यह संग्रह संवेदनाओं, आत्मीयता और जीवन-दर्शन का सुंदर संगम है। इसकी सरलता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यह पुस्तक पाठक के मन में लंबे समय तक अपनी छाप छोड़ती है और यह विश्वास जगाती है कि देह चाहे थम जाए, पर मन की यात्रा कभी नहीं रुकती।कविता वह विधा है जो मनुष्य के अंतर्मन की अ न क ही अनुभूतियों को शब्दों का स्पर्श देती है। जब कोई कवि जीवन के सामान्य अनुभवों में छिपे असाधारण भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, तब उसकी रचनाएँ सीधे पाठक के हृदय तक पहुँच जाती हैं। समकालीन हिंदी कविता में रविकांत राऊत ऐसे ही संवेदनशील रचनाकार हैं।
रविकांत राऊत एक ऐसे कवि हैं, जिनकी लेखनी जीवन के साधारण अनुभवों में भी असाधारण संवेदनाओं का स्पर्श खोज लेती है। वे जटिल भावों को भी सहज और सरल भाषा में व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। उनका कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ इसी संवेदनशील दृष्टि और सृजनात्मक परिपक्वता का सुंदर उदाहरण है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन की यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।
इस संग्रह में कुल 46 कविताएँ संकलित हैं। स्पर्श से पहले, ख्वाबों का मिलन, डर लगता है, पतझड़, स्त्री के मन की राहें, अनाम ख़त, सत्य के अँधेरे में खिलते गुलाब, समय का सच, आत्मज्ञान, बोधिवृक्ष, रौशनी और कुछ तो बात रही होगी जैसी रचनाएँ जीवन के विविध रंगों को बड़ी आत्मीयता से सामने लाती हैं। हर कविता अपने भीतर एक अलग भावलोक रचती है और पाठक को कुछ देर ठहरकर स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करती है।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा है। कवि ने कहीं भी अनावश्यक शब्दाडंबर या कठिन प्रतीकों का सहारा नहीं लिया। यही कारण है कि साहित्य के नए पाठक भी इन कविताओं को बिना किसी कठिनाई के पढ़ और समझ सकते हैं। हर कविता सीधे हृदय तक पहुँचती है और पढ़ने के बाद देर तक मन में गूँजती रहती है।
जैसा कि पुस्तक का शीर्षक संकेत देता है, इसमें यह भाव बार-बार उभरकर आता है कि शरीर भले ही थककर रुक जाए, लेकिन मन कभी नहीं रुकता। वह स्मृतियों, सपनों, प्रेम, उम्मीद, प्रश्नों और आत्ममंथन के साथ निरंतर बहता रहता है। यही विचार पूरे संग्रह को एक सूत्र में बाँधता है। कवि ने मन की इसी अनवरत गति को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है।
प्रेम इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, किंतु यह केवल आकर्षण का प्रेम नहीं, बल्कि विश्वास, प्रतीक्षा, समर्पण और आत्मीयता का प्रेम है। वहीं उदासी भी यहाँ निराशा नहीं बनती, बल्कि जीवन को समझने और भीतर झाँकने का अवसर देती है। पतझड़, रंजिश, दुबकी यादें और गिरे पत्तों की गवाही जैसी कविताएँ जीवन के बदलते मौसमों का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। दूसरी ओर आत्मज्ञान, बोधिवृक्ष और प्रारब्ध जैसी रचनाएँ आत्मबोध और जीवन-दर्शन की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं।हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित इस पुस्तक समीक्षा के लिए समीक्षक नूपेंद्र अभिषेक नृप एवं समाचार पत्र के संपूर्ण संपादक मंडल का हृदय से आभार।
पुस्तक: देह रुकी, मन बह चला
लेखक: रविकान्त राऊत
प्रकाशित समीक्षा: इंदौर समाचार पत्र
दिनांक: 14 जुलाई 2026
समीक्षक: नूपेंद्र अभिषेक नृप
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243

