
मुंबई के पवई इलाके में आईआईटी बॉम्बे का कैंपस देश के सबसे चमकदार सपनों का पता माना जाता है। बारहवीं की परीक्षा देने वाले लाखों बच्चे रात-रात भर जागकर बस यही एक पता पाने की कोशिश करते हैं। इसी कैंपस के एक हॉस्टल कमरे में 18 सितंबर की रात 22 साल के साहिल वाकोडे का शव पंखे से लटका मिला। यह इस कैंपस में सात महीनों के भीतर तीसरी छात्र आत्महत्या है। और हर बार की तरह इस बार भी वही पुराना, बेचैन करने वाला सवाल लौट आया है, क्या भारत के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान सचमुच मेरिट की मूर्ति हैं, या वहां भी जाति चुपचाप अपना काम करती रहती है।
पुलिस के मुताबिक साहिल को परीक्षा हॉल में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते पकड़ा गया था, आरोप है कि वह प्रश्नपत्र चैटजीपीटी पर अपलोड करके जवाब खोजने की कोशिश कर रहा था। इसके कुछ ही घंटों बाद उसने जान दे दी। लेकिन साहिल के पिता की शिकायत ने मामले को एक अलग दिशा दे दी। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला पिछले तीन महीनों से उनके बेटे को जातिसूचक गालियां देते रहे, उसे बार-बार अपमानित करते रहे, और झूठे मामले में फंसाने की धमकी तक दे डाली। पवई पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 यानी आत्महत्या के लिए उकसाने के साथ-साथ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं में भी मामला दर्ज किया है, और अब जांच मुंबई क्राइम ब्रांच के हवाले है (द वीक की रिपोर्ट)।
असली सवाल यह नहीं है कि यह एक अकेली, दुखद घटना है या नहीं। असली सवाल यह है कि आईआईटी जैसे संस्थान, जो देश में मेरिट और समान अवसर के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं, बार-बार एक ही ढांचागत विफलता में क्यों फंसे रहते हैं। हर बार जांच होती है, हर बार कमेटी बनती है, हर बार माफी या स्पष्टीकरण आता है, और कुछ महीनों बाद कोई और कमरा, कोई और पंखा, कोई और परिवार अपनी लड़ाई लेकर सामने खड़ा हो जाता है।
यह पहली बार नहीं है, और इंजीनियरिंग शिक्षा की चमक के पीछे की सच्चाई पर हम पहले भी इस कॉलम में लिख चुके हैं। 2019 में आईआईटी मद्रास की फातिमा लतीफ ने जान दी थी, उनके परिवार ने एक प्रोफेसर पर धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया था। 2023 में आईआईटी बॉम्बे के ही दर्शन सोलंकी की मौत के बाद पूरे देश में यह बहस तेज हुई थी कि क्या दलित और आदिवासी छात्रों के लिए कैंपस की हवा में ही कुछ जहरीला है। सोलंकी ने मरने से पहले अपनी मां को फोन पर बताया था कि जैसे ही सहपाठियों को उसकी जाति का पता चला, उनका व्यवहार बदल गया। हर बार जांच कमेटी बनी, हर बार सिफारिशें आईं, लेकिन ढांचागत बदलाव की गति उतनी ही धीमी रही जितनी शुरुआत में थी।
आंकड़े इस पैटर्न की पुष्टि करते हैं। 2019 से 2023 के बीच देश के विभिन्न आईआईटी में 31 छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें से करीब 55 फीसदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यक समुदाय से आते थे, जबकि इन संस्थानों में इन वर्गों की संख्या अनुपातिक रूप से कहीं कम है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट को जो आंकड़े सौंपे, उनके मुताबिक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 2019-20 से 2023-24 के बीच लगभग सवा गुना बढ़ गईं। यह बढ़ोतरी अकेले भेदभाव के बढ़ने की कहानी नहीं है, इसका एक हिस्सा यह भी है कि अब छात्र चुप रहने की बजाय शिकायत दर्ज कराने लगे हैं। लेकिन दोनों ही सच एक साथ खड़े होकर बताते हैं कि समस्या न छोटी है, न इक्का-दुक्का।
फिर भी इस पूरे मामले को सिर्फ काले और सफेद में देखना ईमानदार नहीं होगा। साहिल के मामले में एक जटिलता खुद परीक्षा में मोबाइल के इस्तेमाल और चैटजीपीटी से जुड़ी है, जो आज हर बड़े कैंपस की सच्चाई बन चुकी है। कड़े अनुशासनात्मक कदम और जातिगत उत्पीड़न को एक ही घटना में गूंथ देना जांच को उलझा भी सकता है और साफ भी कर सकता है, यह अभी जांच पर निर्भर है। आरोपी प्रोफेसर का पक्ष अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, और किसी भी सभ्य समाज में यह जरूरी है कि आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, जांच पूरी होने तक अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से बचा जाए। कैंपस के भीतर की भाषा, हैरेसमेंट और अकादमिक दबाव के बीच की रेखा हमेशा उतनी साफ नहीं होती जितनी बाहर से लगती है।
एक तबका यह भी मानता है कि आईआईटी जैसे संस्थानों को हर बार सिर्फ जाति के चश्मे से देखना गलत है। उनकी दलील है कि इन संस्थानों में हर साल हजारों छात्र आते हैं, अकादमिक दबाव बेइंतहा है, अधिकतर विद्यार्थी पहली बार घर से दूर पूरी तरह प्रतिस्पर्धी माहौल में आते हैं, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हर मौत को जातिगत भेदभाव से जोड़ देना जांच से पहले ही एक तरफ का फैसला सुनाने जैसा है। यह तर्क पूरी तरह खारिज करने लायक नहीं है, क्योंकि हर आत्महत्या के पीछे कई परतें हो सकती हैं, अकेले जाति नहीं। लेकिन यही तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब आंकड़े बार-बार, संस्थान-दर-संस्थान, यही दिखाते हैं कि हाशिये के समुदायों के छात्र असंगत रूप से ज्यादा मरते हैं।
मुझे लगता है कि असली संकट जांच में नहीं, जवाबदेही में है। भारत के हर बड़े संस्थान के पास आज शिकायत तंत्र मौजूद है, समिति है, नियमावली है। कमी नियमों की नहीं, नीयत की है। जब तक किसी प्रोफेसर या वरिष्ठ अधिकारी पर आरोप लगने के बाद संस्थान की पहली प्रतिक्रिया अपनी प्रतिष्ठा बचाना होती है, न कि सच सामने लाना, तब तक कोई भी नई गाइडलाइन सिर्फ कागज पर सुंदर रहेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के जातिगत भेदभाव विरोधी नियमों पर पिछले साल सुप्रीम कोर्ट को खुद कहना पड़ा था कि ये महज प्रतीकात्मक न रह जाएं, यह टिप्पणी अपने आप में बताती है कि अदालत को भी संस्थानों की मंशा पर पूरा भरोसा नहीं है (सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी यहां पढ़ें)।
इसका असर सिर्फ उन परिवारों तक सीमित नहीं है जो अपने बच्चों को खो चुके हैं। हर ऐसी मौत के बाद देश भर के हाशिये के परिवारों के मन में एक नया डर बैठ जाता है, कि आईआईटी जैसी जगह पहुंचना सिर्फ आधी लड़ाई है, असली लड़ाई वहां पहुंचने के बाद शुरू होती है। जिस मेरिटोक्रेसी के सहारे भारत अपनी सबसे प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने का दावा करता है, वह मेरिटोक्रेसी तभी टिकेगी जब कैंपस के भीतर भी बराबरी का भरोसा बचा रहे। नहीं तो प्रवेश परीक्षा में मिली बराबरी, हॉस्टल के कमरे में पहुंचते ही खत्म हो जाएगी, और भारत के युवाओं के अपने ही देश में मौका पाने के सवाल पर हमने पहले भी विस्तार से लिखा है।
साहिल वाकोडे की जांच पूरी होने में महीनों लगेंगे, शायद सच पूरी तरह कभी सामने भी न आए। लेकिन जो सवाल इस मौत ने फिर खड़ा किया है, उसका जवाब किसी एक जांच रिपोर्ट में नहीं मिलेगा। वह सवाल हर उस कैंपस के हर उस गलियारे में घूमता रहेगा, जहां कोई छात्र अपनी जाति, अपने धर्म या अपनी पहचान की वजह से खुद को अकेला महसूस करता है, और यह तय करने की कोशिश करता है कि उस अकेलेपन को आख़िर किससे कहे।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

