पिछले तीन दशकों में भारत के लाखों घरों में एक ख़्वाब पला-बढ़ा है। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लेते ही एक अनकहा रोडमैप तय हो जाता है, अच्छे ग्रेड, एक कैंपस प्लेसमेंट, कुछ साल की मेहनत, और फिर एक दिन H-1B वीज़ा की लॉटरी में नाम निकलने का इंतज़ार। यह सिर्फ़ नौकरी का सपना नहीं है, यह एक पूरी सामाजिक व्यवस्था बन गया है जिसमें शादी के बाज़ार से लेकर मोहल्ले की इज़्ज़त तक सब कुछ इस एक वीज़ा स्टैम्प से जुड़ा हुआ है। अब उस सपने पर अमेरिका ने एक भारी टैक्स लगा दिया है, और यह टैक्स सिर्फ़ पैसों का नहीं, एक पूरी सोच पर सवाल है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने H-1B वीज़ा पर लगने वाली एक लाख डॉलर (लगभग 83-85 लाख रुपये) की अतिरिक्त फ़ीस को अब सितंबर 2027 तक बढ़ा दिया है। यह नियम अमेरिका के बाहर से आने वाले नए H-1B आवेदनों पर 21 सितंबर 2026 की मध्यरात्रि से प्रभावी हो रहा है, यानी ठीक आज से। अमेरिकी सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2024 में स्वीकृत H-1B वीज़ा में से 71 प्रतिशत भारतीय मूल के पेशेवरों को मिले थे। मतलब यह फ़ीस किसी और के लिए नहीं, सीधे भारत के लिए बनाई गई नीति जैसी दिखती है।
इस ख़बर पर भारत में जो प्रतिक्रिया हुई, वह दिलचस्प थी। कुछ ने इसे अमेरिका की “भारत विरोधी” चाल बताया, कुछ ने इसे टेक कंपनियों की समस्या मानकर टाल दिया। लेकिन असली सवाल कहीं गहरा है, और वह सिर्फ़ आईटी इंजीनियरों तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है, क्या भारत ने अपनी सबसे प्रतिभाशाली पीढ़ी को घर में ठहरने लायक कुछ देने की ज़िम्मेदारी दूसरे देशों पर डाल दी है? और अब जब वह दरवाज़ा महंगा और तंग हो रहा है, तो हमारे पास प्लान बी है या नहीं?
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना ज़रूरी है। 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने जिस चीज़ में सबसे तेज़ी से दुनिया में जगह बनाई, वह सॉफ़्टवेयर सेवाएं थीं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे शहर आईटी हब बने, लेकिन इस उद्योग का मॉडल शुरू से ही “सेवा निर्यात” और “प्रतिभा निर्यात” पर टिका रहा। हमने दुनिया को सस्ते और कुशल इंजीनियर दिए, और बदले में डॉलर और भेजा गया पैसा (रेमिटेंस) पाया। भारत आज दुनिया में सबसे ज़्यादा विदेशी रेमिटेंस पाने वाला देश है, हाल के वर्षों में यह रकम हर साल सौ अरब डॉलर से भी ज़्यादा रही है, और इसका एक बड़ा हिस्सा अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों से आता है। यह मॉडल दशकों तक कामयाब रहा, लेकिन इसकी बुनियाद हमेशा दूसरे देश की वीज़ा नीति पर निर्भर रही, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।
अब आंकड़ों की तरफ़ आते हैं। अमेरिका हर साल लगभग 85,000 नए H-1B वीज़ा जारी करता है, और इनमें भारतीयों की हिस्सेदारी तीन-चौथाई के आसपास रहती है। एक लाख डॉलर की फ़ीस का मतलब है कि किसी भी अमेरिकी कंपनी के लिए एक नए भारतीय इंजीनियर को बाहर से बुलाना, स्थानीय अमेरिकी कर्मचारी को रखने से कहीं ज़्यादा महंगा हो जाएगा। ज़ाहिर है, कंपनियां अब नई भर्तियों में या तो अमेरिका में मौजूद भारतीय स्नातकों को प्राथमिकता देंगी, या फिर उन कामों को भारत में ही अपने ऑफ़शोर सेंटर के ज़रिए करवाना पसंद करेंगी। यानी यह सिर्फ़ वीज़ा चाहने वालों की समस्या नहीं, भारत के करोड़ों डॉलर के आउटसोर्सिंग उद्योग की रणनीति को भी बदल सकता है।
लेकिन यह मामला जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। एक तरफ़ यह फ़ीस भारतीय युवाओं के लिए एक झटका है, दूसरी तरफ़ कुछ अर्थशास्त्री इसे भारत के लिए एक मौक़े की तरह भी देखते हैं। दलील यह है कि जब सबसे अच्छे दिमाग़ बाहर जाने के बजाय देश में रुकेंगे, तो वे यहीं स्टार्टअप बनाएंगे, यहीं नई तकनीक पर काम करेंगे, और भारत के अपने AI और डीपटेक इकोसिस्टम को मज़बूत करेंगे। बेंगलुरु का स्टार्टअप बूम बड़े हिस्से में उन्हीं लोगों की वजह से हुआ जो अमेरिका जाकर लौटे और अपना अनुभव यहां लगाया। तो क्या यह नीति उलटे तरीक़े से हमें अपने ऊपर निवेश करने पर मजबूर कर रही है?
यह भी सच है कि H-1B सिर्फ़ ब्रेन ड्रेन का ज़रिया नहीं रहा, यह एक तरह का सुरक्षा वाल्व भी था। भारत हर साल लाखों इंजीनियर तैयार करता है, लेकिन घरेलू अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से उस स्तर की नौकरियां नहीं बना पा रही। जब बाहर के दरवाज़े थोड़े तंग होते हैं, तो यह दबाव सीधे घरेलू नौकरी बाज़ार पर आता है, जहां प्रतिस्पर्धा पहले से ही बहुत ज़्यादा है। एक ऐसे देश में जहां हर साल करोड़ों युवा नौकरी बाज़ार में उतरते हैं, वहां “बाहर जाने का विकल्प कम होना” तुरंत खुशी की बात नहीं बन सकती, यह एक सामाजिक चुनौती भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
तो निष्कर्ष क्या है? मेरी नज़र में असली समस्या ट्रम्प की फ़ीस नहीं है, समस्या यह है कि भारत ने दशकों तक अपनी सबसे होनहार पीढ़ी के भविष्य को दूसरे देशों की नीतियों के भरोसे छोड़ दिया। कोई भी देश जब अपनी सबसे बड़ी संपत्ति, यानी अपने पढ़े-लिखे युवा, को सिर्फ़ निर्यात की चीज़ मानकर चलता है, तो वह अपने ही भविष्य में निवेश करने से चूक जाता है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अमेरिका ने वीज़ा महंगा क्यों किया, सवाल यह होना चाहिए कि भारत में उस स्तर की तनख़्वाह, वह शोध का माहौल, वह करियर की गुणवत्ता आज तक क्यों नहीं बन पाई कि एक होनहार इंजीनियर यहीं रुकने का फ़ैसला ख़ुशी से ले सके, मजबूरी में नहीं।
आगे का असर व्यापक होगा। अगर अमेरिका की यह सख़्ती लंबे समय तक चली, तो भारत के आईटी उद्योग को अपने बिज़नेस मॉडल पर फिर से सोचना होगा, कॉलेजों को अपने कोर्स ढांचे पर, और सरकार को स्टार्टअप, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग में असली रोज़गार बनाने की गति पर। यह सिर्फ़ आईटी सेक्टर का मसला नहीं रहेगा, आगे चलकर यह तय करेगा कि भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों के लिए सफलता की परिभाषा कैसे बदलता है।
शायद यही वह पल है जब हर उस घर में, जहां एक बच्चा रात-दिन “विदेश जाने” की तैयारी में लगा है, यह सवाल भी उठना चाहिए कि क्या हम उसे सिर्फ़ जाने का सपना दे रहे हैं, या यहां रुकने की कोई ठोस वजह भी। जब तक यह जवाब नहीं मिलता, हर नई वीज़ा नीति, चाहे वह कहीं की भी हो, भारत के लाखों घरों की नींद उड़ाती रहेगी।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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