आठ करोड़ सत्तर लाख। यह अकेला एक आंकड़ा है, पर इसके भीतर एक पूरी पीढ़ी की बेचैनी छिपी है। नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि पंद्रह से उनतीस साल के बीच के इतने युवा भारत में ऐसे हैं जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न किसी काम में लगे हैं, न ही किसी हुनर को सीखने की ट्रेनिंग में। न स्कूल, न कॉलेज, न नौकरी, न प्रशिक्षण। बस इंतज़ार। और यह इंतज़ार किसी छोटे शहर के किसी कोने तक सीमित नहीं, यह देश भर में फैला हुआ है।
यही रिपोर्ट, जिसका नाम है “रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत @2047”, एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने रखती है। भारत में सिर्फ 8.25 फ़ीसदी स्नातक ऐसे हैं जिन्हें अपनी योग्यता के मुताबिक काम मिल पाता है। बाकी या तो बेरोज़गार बैठे हैं, या फिर किसी ऐसी नौकरी में हैं जिसका उनकी डिग्री से कोई नाता ही नहीं। कोई इंजीनियरिंग करके डिलीवरी ऐप चला रहा है, कोई एमबीए करके किसी दुकान का हिसाब-किताब देख रहा है, कोई परास्नातक करके किसी कोचिंग सेंटर में पार्ट-टाइम पढ़ा रहा है। डिग्री की फ्रेम दीवार पर टंगी है, पर उसका काम से कोई रिश्ता नहीं बचा।
यह ख़बर पहली नज़र में एक सांख्यिकीय विवरण लगती है, आंकड़ों की एक और फ़ाइल जो हर साल आती है और अगले हफ्ते तक भुला दी जाती है। पर इसके भीतर एक सवाल दबा है, जो भारत के भविष्य से सीधे जुड़ता है, क्या हम अपनी सबसे बड़ी ताकत, अपनी युवा आबादी को, बिना इस्तेमाल किए गंवा रहे हैं?
बरसों से भारत को एक ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ वाला देश बताया जाता रहा है, यानी दुनिया के मुक़ाबले हमारे पास काम करने लायक उम्र के लोगों का अनुपात सबसे ज़्यादा है। नीतियों में, भाषणों में, निवेशकों के सामने यह आंकड़ा गर्व से पेश किया जाता रहा है। पर एक जनसंख्या तभी ‘दिविडेंड’ बनती है जब उसके पास काम हो, हुनर हो, और वह हुनर बाज़ार की मांग से मेल खाता हो। अगर यह मेल न बैठे, तो वही आबादी बोझ में बदल जाती है, चाहे उसकी उम्र कितनी भी कम क्यों न हो।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है। समस्या डिग्री की कमी की नहीं है, भारत हर साल लाखों स्नातक पैदा करता है। समस्या यह है कि यह डिग्रियां किसी काम की तैयारी नहीं कराती। रिपोर्ट के मुताबिक करीब अस्सी फ़ीसदी छात्रों ने माना कि उनके पास व्यावहारिक अनुभव और इंडस्ट्री एक्सपोजर की भारी कमी है। चौंतीस फ़ीसदी ने सीधे तौर पर स्किल गैप को अपनी सबसे बड़ी दिक्कत बताया। अठारह फ़ीसदी को इंटरव्यू देने की तैयारी तक नहीं आती। यानी तीन अलग-अलग मोर्चों पर, शिक्षा व्यवस्था अपने ही छात्रों को असफल कर रही है, न वह उन्हें काम सिखा रही है, न उन्हें बाज़ार से जोड़ पा रही है, न ही उस आख़िरी क़दम, यानी इंटरव्यू और नौकरी पाने की प्रक्रिया के लिए तैयार कर पा रही है।
इसका एक और पहलू है, जो इस समस्या को और गहरा बनाता है। जब बाज़ार में निजी क्षेत्र की नौकरियां भरोसेमंद नहीं लगतीं, तो हर कोई सरकारी नौकरी की तरफ़ भागता है। नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच सिर्फ पचपन हज़ार सरकारी पदों के लिए एक करोड़ छियासी लाख आवेदन आए, यानी लगभग तीन सौ आवेदकों में एक पद। यह सिर्फ़ एक प्रतियोगिता परीक्षा का आंकड़ा नहीं, यह इस बात का सबूत है कि निजी क्षेत्र में युवाओं का भरोसा कितना कमज़ोर पड़ चुका है। जिस अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप, टेक कंपनियां, मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र लगातार बढ़ने का दावा करते हैं, वहां इतने युवा सिर्फ़ एक क्लर्क की सरकारी कुर्सी के लिए इतनी बेताबी से क्यों जूझ रहे हैं, यह सवाल किसी को गंभीरता से पूछना चाहिए। दो साल पहले ‘वादे बूम, नौकरी गुम’ में इसी अंतर पर बात हुई थी, तब भी यही सवाल उठा था कि आर्थिक विकास के दावों और असली रोज़गार सृजन के बीच का फ़ासला कब पटेगा। वह फ़ासला आज और चौड़ा दिखता है।
बेशक, इस तस्वीर का एक दूसरा पक्ष भी है, और उसे नज़रअंदाज़ करना ईमानदारी नहीं होगी। सरकार की तरफ से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि बेरोज़गारी दर में सुधार हो रहा है, हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बताया कि विभिन्न योजनाओं की वजह से बेरोज़गारी दर घटकर 3.2 फ़ीसदी तक आ गई है। स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, नई शिक्षा नीति के तहत मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट और स्किल आधारित पढ़ाई जैसे प्रयास भी हो रहे हैं। यह दावे झूठे नहीं हैं, इनमें से कई योजनाएं कागज़ पर सही दिशा में हैं। पर एक सरकारी आंकड़ा और ज़मीन पर मौजूद निराशा के बीच जो खाई है, वही असली कहानी बताती है। अगर बेरोज़गारी दर सच में इतनी कम है, तो साढ़े आठ करोड़ युवा किसी काम या पढ़ाई से बाहर क्यों बैठे हैं? यह विरोधाभास आंकड़ों की परिभाषा में उलझा हो सकता है, पर आम आदमी के लिए यह विरोधाभास नहीं, रोज़मर्रा की सचाई है।
यह मामला इसलिए भी सीधा नहीं है क्योंकि इसका कोई एक खलनायक नहीं है। कॉलेज कहते हैं कि उद्योग उन्हें बताए कि किस स्किल की ज़रूरत है, तभी वे पाठ्यक्रम बदल सकते हैं। उद्योग कहता है कि कॉलेज पुराने ढांचे से बाहर ही नहीं निकलना चाहते, और हर साल वही घिसी-पिटी डिग्री बांटते रहते हैं। सरकार कहती है कि उसने योजनाएं बना दी हैं, अब लागू करना राज्यों और संस्थानों का काम है। और परिवार, जो अब भी डिग्री को सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं, बच्चों को कॉलेज भेजना बंद नहीं कर सकते, भले ही वह डिग्री किसी काम की न हो। हर पक्ष के पास अपनी दलील है, और हर दलील में कुछ सच्चाई भी है। यही वजह है कि यह समस्या दशकों से बनी हुई है, कोई एक सुधार, कोई एक योजना इसे रातों-रात ठीक नहीं कर सकती।
फिर भी, अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी शिक्षा व्यवस्था की बनती है। क्योंकि बाक़ी सब पक्ष, बाज़ार हो, परिवार हो या सरकार, वे उसी ढांचे के भीतर प्रतिक्रिया दे रहे हैं जो शिक्षा व्यवस्था ने दशकों से बनाया है। जब तक डिग्री पाना ही अपने आप में लक्ष्य बना रहेगा, न कि कोई हुनर सीखना, तब तक कॉलेज सिर्फ़ प्रमाणपत्र बांटने की फैक्ट्री बने रहेंगे। नई शिक्षा नीति के तहत जो बदलाव हो रहे हैं, वे दिशा में सही हो सकते हैं, पर उनकी रफ़्तार और उनका ज़मीनी क्रियान्वयन, दोनों उस गति से नहीं चल रहे जिस गति से हर साल नए स्नातक बाज़ार में उतर रहे हैं। यह दौड़ एकतरफ़ा है, और अभी शिक्षा व्यवस्था इसमें पीछे है।
अगर यही रुझान चलता रहा, तो इसका असर सिर्फ़ बेरोज़गारी के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। एक पूरी पीढ़ी, जिसने बरसों किताबों में सिर झुकाकर डिग्री हासिल की, जब उसे बाज़ार में जगह नहीं मिलेगी, तो उसका असंतोष कहीं और रास्ता खोजेगा। कभी वह राजनीतिक गुस्से के रूप में सामने आएगा, कभी सामाजिक तनाव के रूप में, कभी पलायन के रूप में, जहां प्रतिभाशाली युवा देश छोड़कर बाहर जाने का रास्ता चुनेंगे, एक रुझान जिस पर मैंने ‘सपनों पर लगा टैक्स’ में विस्तार से लिखा था। और सबसे चिंताजनक यह कि जिस ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ का हवाला दशकों से दिया जाता रहा, वही अगर सही समय पर काम में नहीं ढल पाया, तो वह अपने आप एक डेमोग्राफिक बोझ में बदल जाएगा, ऐसा बोझ जिसे संभालना अगले दशकों में बेहद मुश्किल होगा।
इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए एक बात बार-बार मन में आती है। हमने अपने बच्चों को यह सिखाया कि डिग्री हासिल करना ही सफलता है, कि किताबी नंबर ही भविष्य तय करते हैं। पर हमने उन्हें यह नहीं सिखाया कि असली दुनिया में टिकने के लिए क्या चाहिए, अनुभव, अनुकूलन की क्षमता, और वह हुनर जो किसी परीक्षा में नहीं, बल्कि काम की जगह पर परखा जाता है। जब तक यह फ़र्क़ समझ में नहीं आएगा, तब तक डिग्रियों का ढेर बढ़ता रहेगा, और नौकरियों की कतार में खड़े युवाओं की उदासी भी।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243


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