अनुकरण की संस्कृति गढ़ने की ढाई हज़ार साल पुरानी भारतीय तरकीब
एक लड़का जंगल में मिट्टी की एक मूर्ति बनाता है। सामने कोई गुरु नहीं होता, कोई मार्गदर्शन नहीं, बस एक अस्वीकृति का घाव और उसे मिटाने की ज़िद। वर्षों की तपस्या के बाद वह उस राजकुमार से बेहतर धनुर्धर बन जाता है, जिसके लिए गुरु ने उसे भगा दिया था और जब गुरु को यह पता चलता है, तो वह शिष्य न मानते हुए भी उससे दक्षिणा मांग लेता है -उसका दाहिना अंगूठा। एकलव्य बिना एक पल गंवाए अपना अंगूठा काट देता है।
हमें सदियों से यह सिखाया गया है कि यह भक्ति की पराकाष्ठा है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए कि अगर द्रोणाचार्य को सच में लगा था कि अर्जुन पिछड़ रहा है, तो उन्हें अर्जुन को और तराशना चाहिए था पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसकी जगह उन्होंने प्रतियोगिता को ही जड़ से उखाड़ फेंका। यह किसी गुरु-भक्ति की कहानी नहीं है , यह सत्ता के उस डिज़ाइन की कहानी है, जिसने एक आम इंसान से उसका विवेक छीनकर उसे भेंट में बदल दिया और यहीं से वह सवाल शुरू होता है – क्या अंधभक्त पैदा होते हैं, या बनाए जाते हैं?
इतिहास इसका जवाब बहुत साफ़ देता है कि इन्हें गढ़ा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई शिल्पकार पत्थर को तराशता है। और इस शिल्प की सबसे पुरानी, सबसे बारीक और सबसे भयावह प्रयोगशाला भारत ही रही है।
मौर्य काल में कौटिल्य के अर्थशास्त्र को पढ़िए। उस समय में वहां राजा कोई देवता नहीं होता था , एक कर्मचारी होता था जो प्रजा से अन्न और व्यापार का कर वसूलता था और बदले में सुरक्षा देता था । यह एक तरह का नौकरी का अनुबंध था, इसमें किसी गरिमा का दावा नहीं होता था । मगर कुछ ही पीढ़ियों बाद मनुस्मृति के सातवें अध्याय में यही राजा अचानक इंद्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्र और कुबेर – इन आठ देवताओं के अंश से बना हुआ घोषित कर दिया जाता है। एक ही सभ्यता, दो बिल्कुल उलट पाठ। फ़र्क सिर्फ़ शब्दों का नहीं था , फ़र्क यह था कि जिस दिन राजा को देवांश घोषित किया गया, उस दिन उसकी आलोचना राजद्रोह नहीं, ईश-निंदा बन गई। यह भारतीय राजनीति में अंधभक्ति का पहला बड़ा संस्करण था।
कौटिल्य तो खुद इस तरकीब के सबसे बेशर्म दस्तावेज़ छोड़ गए हैं। वे एक पूरा अध्याय इस बात पर लिखते हैं कि जब कभी यदि राजकोष खाली हो जाए, तो राजा जनता के अंधविश्वास का दोहन कैसे करे। सलाह यह थी कि रात के अंधेरे में किसी वृक्ष, गुफा या मंदिर में चुपचाप एक मूर्ति स्थापित करवा दो। फिर गुप्तचरों को भेजो, जो मूर्ति के पीछे छिपकर आवाज़ें निकालें और चमत्कार की अफ़वाह फैलाएं। जब भीड़ उमड़े और चढ़ावा चढ़ाए, तो वह सारा धन सीधे राजकोष में डाल दो। ध्यान दीजिए – यह श्रद्धा नहीं थी। यह राज्य द्वारा इंजीनियर की गई अंधभक्ति थी, जहां जनता की भावनाओं को सीधे सरकारी राजस्व मॉडल में बदल दिया गया था।
चौथी शताब्दी आते-आते यह शिल्प और परिष्कृत हो जाता है। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने इलाहाबाद स्तंभ (प्रयाग प्रशस्ति) पर जो लिखा, वह भाषा के स्तर पर एक नई हद पार करता है यहां वे समुद्रगुप्त को साधारण राजा नहीं, “अचिन्त्य पुरुष” कहते हैं, यानी ‘वह अस्तित्व जिसे सोचा ही नहीं जा सकता’ और ‘लोकातीत’ कहकर न केवल उनकी प्रशंसा की, बल्कि राजा को देवत्व का रूप देकर आम जनता की तार्किक चेतना को पूरी तरह से विस्थापित कर दिया। इसका मनोवैज्ञानिक असर गहरा था, जब नेता आम बुद्धि की पहुंच से बाहर घोषित कर दिया जाए, तो प्रजा उसकी नीतियों पर सवाल कैसे उठाए? नीति असफल भी हो, तो भी बड़ा तबका यही मान लेता है कि यह किसी दुर्बोध मास्टरस्ट्रोक का हिस्सा रहा होगा जो हमारी समझ से परे है । जब किसी शासक की छवि को सामान्य मानवीय सीमाओं से ऊपर उठा दिया जाता है, तो राज्य और प्रजा के बीच एक ऐसा मनोवैज्ञानिक ढांचा तैयार होता है जो आज के दौर में भी प्रासंगिक है: कि इस तरह सवाल उठाने की गुंजाइश का अंत कर दिया जाता है इस तरह जब प्रजा यह मान लेती है कि राजा की बुद्धि उनकी समझ से बहुत ऊपर है, तो उसकी नीतियों पर सवाल उठाना ‘देशद्रोह’ या ‘पाप’ जैसा महसूस होने लगता है।
तेरहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत का शासक ग़यासुद्दीन बलबन एक कदम और आगे जाता है। उसे डर था कि दरबार के रईस उसे अपने बराबर समझते हैं, और बराबरी की यह भावना कभी भी तख्तापलट में बदल सकती है। इसका तोड़ उसने एक फ़ारसी उपाधि में खोजा — “ज़िल्ल-ए-इलाही”, यानी ‘धरती पर ईश्वर की छाया’। दरबार में उसने दो नियम सख़्ती से लागू किए पहल सिज़दा, यानी ज़मीन पर लेटकर प्रणाम, और दूसरा पैबोस, यानी ‘राजा के चरण चूमना’। यह कोई सांस्कृतिक शिष्टाचार नहीं था। जब एक शक्तिशाली सामंत या सेनापति सबके सामने पेट के बल लेटकर एक इंसान के जूते चूमता है, तो उसका स्वाभिमान और उसकी स्वतंत्र सोच वहीं कुचल दी जाती है। अंधभक्ति को यहां देह पर उतारा जा रहा था।
पर इस पूरी यात्रा की सबसे चौंकाने वाली मंज़िल दक्षिण भारत में मिलती है। मध्यकालीन कर्नाटक के राष्ट्रकूट और होयसल साम्राज्यों में एक व्यवस्था चलती थी, जिसे “वेल्वली” कहा जाता था इसमें राजा के निजी अंगरक्षकों का एक दल, जिनकी शपथ रोंगटे खड़े कर देती है: “जिस दिन राजा की सांस थमेगी, उस दिन मेरी भी थमेगी।” जो अंगरक्षक राजा की मृत्यु पर प्राण त्यागता, उसके परिवार को गांव में सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा और भूमि दान मिलती। आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य में यह व्यवस्था एक विधिवत संस्था बन गई, जिसे “गरुड़” कहा गया। सोलहवीं सदी में पुर्तगाली यात्री फ़र्नांडिस ने अपनी आंखों जो देखा, वह दर्ज किया कि यदि राजा युद्ध में नहीं, महल में किसी साधारण बीमारी से भी मरे, तो चिता जलने के दिन ये अंगरक्षक भीड़ के सामने अपने ही हाथों अपना गला काट लेते या ख़ुद को अग्नि में झोंक देते। कर्नाटक के मैवंडी और हळेबीडु में आज भी खड़े स्मारक-पत्थर– “वीरगल्लु”1 उन गुमनाम सैनिकों की गवाही देते हैं, जिन्होंने बिना कोई सवाल पूछे अपना अस्तित्व मिटा दिया।
इतिहासकार बताते हैं कि इन अंगरक्षकों की वफ़ादारी और सती प्रथा को उस दौर के ग्रंथों में बिल्कुल एक जैसी भाषा में वर्णित किया गया है। यानी दोनों को एक ही श्रेणी में रखा गया था। यह भक्ति नहीं थी – यह राजा की सबसे पुख़्ता जीवन-बीमा पॉलिसी थी, जिसमें राज्य ने अपने ही रक्षकों के मस्तिष्क को इस तरह ढाल दिया था कि राजा पर हमले का मतलब उनकी अपनी मृत्यु बन जाए। एक सत्ता ने अपने अनुयायियों की आत्महत्या को शौर्य और पौरुष का तमगा पहनाकर अपना अस्तित्व सुरक्षित किया।
आज शारीरिक आत्महत्या शायद इतिहास के पन्नों में दब चुकी है, लेकिन बौद्धिक आत्महत्या का यह सिलसिला रुका नहीं है। बस तलवार की जगह अब सूक्ष्मतर औज़ार आ गए हैं। इतिहासकार रूथ बेन-घियात इसे “पीड़ित-उद्धारक विरोधाभास” (Victim-Savior Paradox) कहती है , जो अधिनायकवादी (authoritarian) और लोकलुभावन (populist) नेताओं द्वारा सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने की एक बेहद सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है। जिसमें वे कहती हैं — एक सशक्त नेता ख़ुद को एक साथ दो रूपों में पेश करता है: वह अपराजेय उद्धारक भी है, जो अकेले देश बचा रहा है, और साथ ही वह पीड़ित भी है, जिसके ख़िलाफ़ मीडिया और पिछली सत्ताएं साज़िश रच रही हैं। यह मानी हुई पीड़ितता- अनुयायियों के भीतर एक रक्षात्मक भाव जगा देती है – उन्हें लगने लगता है कि नेता उनके लिए त्याग कर रहा है, इसलिए उसे अंधाधुंध कोशिशें कर बचाना उनका फ़र्ज़ है। अंधभक्ति की यह पारिस्थितिकी वहीं जन्म लेती है, जहां आम नागरिक ख़ुद को नेता का अंगरक्षक मान बैठता है।
इस मोह-जाल में सबसे ज़्यादा फंसने वाला तबका वह नहीं, जिसे हम आमतौर पर सोचते हैं – यानी सबसे कम पढ़ा-लिखा या हाशिए का वर्ग। पुलित्ज़र-विजेता लेखिका ऐन ऐप्लबाम अपनी प्रसिद्ध किताब Twilight of Democracy: The Seductive Lure of Authoritarianism में दिखाती हैं कि सबसे ख़तरनाक चाटुकार शिक्षित वर्ग से आते हैं – वकील, पत्रकार, बुद्धिजीवी। वे सच जानते हुए भी चुप रहते हैं, क्योंकि सत्ता के क़रीब बने रहना उनके करियर के लिए ज़रूरी होता है। जब समाज का सबसे पढ़ा-लिखा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने की जगह उसका जनसंपर्क विभाग बन जाए, तो समझ लीजिए बीमारी अपनी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी है।
फ़्रैंक डिकॉटर ने बीसवीं सदी के सबसे बड़े तानाशाहों का अध्ययन करके एक बुनियादी सच उजागर किया कि डर और पुलिस-बल से सत्ता क़ायम की जा सकती है, पर लंबे समय तक नहीं चलाई जा सकती। इसीलिए हर सत्तावादी व्यवस्था एक व्यक्ति-पूजा का पंथ रचती है, जहां लोग सिर्फ़ डरें नहीं, सार्वजनिक रूप से ताली भी बजाएं। और जब भीड़ से लेकर बुद्धिजीवी तक सब यह पूजा-नाटक करने लगते हैं, तो व्यवस्था के भीतर से विरोध की हर संभावना ख़त्म हो जाती है।
पर यहीं इतिहास एक विडंबना भी छोड़ जाता है। अर्थशास्त्री रोनाल्ड विंट्रोब (Ronald Wintrobe) ने 1998 में अपनी किताब The Political Economy of Dictatorship में “तानाशाह की दुविधा” (The Dictator’s Dilemma) नाम की एक अवधारणा दी । यह अवधारणा बताती है कि असीमित शक्ति हासिल करने के बाद एक तानाशाह कैसे खुद ही अपने बनाए जाल में फंस जाता है। इस दुविधा का मुख्य सार यह है कि एक शासक जितनी ज़्यादा भक्ति और भय की मांग करता है, उतनी ही तेज़ी से उसके इर्द-गिर्द चाटुकारिता की दीवारें खड़ी होने लगती हैं और उसे सच दिखना बंद हो जाता है। लोग सच बोलने की सज़ा से बचने के लिए झूठी तालियां बजाने लगते हैं, और धीरे-धीरे नेता तक बुरी ख़बरें, ज़मीनी हक़ीक़त और जनता का असंतोष पहुंचना ही बंद हो जाता है। वह इतिहास के सबसे ख़तरनाक सूचना-शून्य में क़ैद हो जाता है, जहां उसे लगता है सब कुछ ठीक चल रहा है, जबकि नींव भीतर ही भीतर खोखली हो चुकी होती है।
1975 में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द ठीक यही घेरा बन गया था – उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियां और सरकारी तंत्र उन्हें यक़ीन दिला चुके थे कि देश उनके इस क़दम से ख़ुश है। नतीजा 1977 में एक ऐतिहासिक हार के रूप में सामने आया, जिसमें वे ख़ुद अपनी सीट तक हार गईं। उनके अनुयायियों की झूठी तारीफ़ ने ही उनका पतन तय कर दिया था।
लेकिन जिस धरती ने अंधभक्ति गढ़ने की यह पूरी तकनीक विकसित की, उसी धरती ने इसका सबसे पुराना प्रतिरोध भी रचा है। ढाई हज़ार साल पहले बुद्ध केशपुत्र गांव पहुंचते हैं, जहां के निवासी – जिन्हें कालाम कहा जाता था – एक व्यावहारिक सवाल पूछते हैं: हर नया गुरु यही दावा करता है कि सिर्फ़ उसकी बात सच है, तो हम किस पर भरोसा करें? बुद्ध का उत्तर, जिसे कालाम सूत्र के नाम से जाना जाता है, भारतीय बौद्धिक इतिहास की सबसे बड़ी क्रांतियों में गिना जाता है कि किसी बात को केवल इसलिए सच मत मानो कि वह परंपरा है, किसी ग्रंथ में लिखी है, या तुम्हारे अपने गुरु ने कही है। उसे अपने तर्क और अनुभव की कसौटी पर परखो। इसके साथ ही चार्वाक और लोकायत जैसी विचारधाराएं थीं, जो प्रत्यक्ष प्रमाण और तर्क को ही सत्य की एकमात्र कसौटी मानती थीं – चाहे उसके विरुद्ध कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न बोल रहा हो।
इस प्रतिरोध का सबसे मार्मिक रूप मध्यकाल में मिलता है। हमने भक्ति और अंधभक्ति को एक समझने की भूल कर ली है, जबकि दोनों में मूल फ़र्क यही है – भक्ति आपको किसी सत्य, किसी सिद्धांत के प्रति निष्ठावान बनाती है; अंधभक्ति उस निष्ठा को सिद्धांत से हटाकर एक व्यक्ति पर टिका देती है। कबीर अपने गुरु के प्रति समर्पित थे, पर अंधे नहीं – उन्होंने साफ़ लिखा: “जाका गुरु है अंधला, चेला खरा निरंध। अंधे अंधा ठेलिया, दोनों कूप पड़ंत।” बारहवीं सदी के कर्नाटक में बसवन्ना ने भी स्थापित पुरोहितवाद और अधिकार पर सीधा प्रहार किया था।
आधुनिक भारत में यह बहस दो घटनाओं से हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है। 1937 में कोलकाता की पत्रिका मॉडर्न रिव्यू में “चाणक्य” के छद्म नाम से एक लेख छपता है – “द राष्ट्रपति” – जो उस दौर के सबसे लोकप्रिय जननेता जवाहरलाल नेहरू पर तीखा प्रहार करता है, यह चेतावनी देते हुए कि भीड़ उन्हें विजयी सीज़र की तरह देख रही है और थोड़ा मौक़ा मिलते ही वे तानाशाह बन सकते हैं। सबसे बड़ा मोड़ यह था कि यह लेख किसी विरोधी ने नहीं, ख़ुद नेहरू ने चाणक्य छद्म नाम से अपने ही ख़िलाफ़ लिखा था – इस डर से कि जनता का अंधा प्रेम उन्हें कहीं सत्तावादी न बना दे। ठीक बारह साल बाद, 25 नवंबर 1949 को, संविधान अपनाए जाने से एक दिन पहले, संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने अंतिम भाषण में जो कहा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है – “भक्ति धर्म में आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, पर राजनीति में भक्ति और नायक-पूजा पतन और अंततः तानाशाही की ओर जाने वाला निश्चित मार्ग है।”
तो पूरी यह यात्रा – एकलव्य के कटे अंगूठे से लेकर संविधान सभा के उस अंतिम भाषण तक – हमें एक ही जगह लाकर छोड़ती है। भारत अंधभक्ति गढ़ने की तकनीक का जनक भी है, और उसे चुनौती देने वाली सबसे पुरानी परंपरा का भी। सवाल बस इतना है कि इनमें से हम किस विरासत को अपनाना चाहते हैं – वेल्वली के उस अंगरक्षक की, जो अपने नेता के भ्रम को बचाए रखने के लिए अपनी जान दे देता है, या उस नागरिक की, जो कालाम सूत्र और अंबेडकर की तरह नेता की आंखों में देखकर सवाल पूछने का साहस रखता है। नेता आते रहेंगे, जाते रहेंगे – यह चुनाव हमेशा हमारा ही रहेगा।
आज जब मैं यह सब लिख रहा हूं, तो यह किसी इतिहास की किताब का बंद अध्याय नहीं लगता – यह आज के भारत का आईना बनकर सामने खड़ा हो जाता है। टीवी के वे पैनल जो हर शाम एक ही सुर में तालियां बजाते हैं, व्हाट्सऐप पर घूमते वे संदेश जो सुबह उठते ही श्रद्धा बांट देते हैं, सोशल मीडिया की वे भीड़ें जो असहमति को पलक झपकते देशद्रोह घोषित कर देती हैं – यह सब उन्हीं पुराने औज़ारों के नए संस्करण भर हैं, जिनका ज़िक्र हमने कौटिल्य की गुप्त मूर्ति और बलबन के दरबार में किया। फ़र्क बस इतना है कि अब मूर्ति के पीछे छिपा गुप्तचर एक ट्रेंडिंग हैशटैग बन चुका है, और सिज़दा स्क्रीन के सामने बैठकर ठोंकी गई पांच तालियों में बदल गया है। रूथ बेन-घियात का पीड़ित-उद्धारक विरोधाभास, ऐन ऐप्लबाम का बौद्धिक समर्पण और विंट्रोब की तानाशाह की दुविधा – ये अब किताबी सिद्धांत नहीं रहे, हमारे समय की जीती-जागती सच्चाई बन चुके हैं। जिस दिन समाज का सबसे पढ़ा-लिखा और रसूखदार वर्ग सत्ता का जनसंपर्क विभाग बन जाता है, और आलोचना को देशद्रोह की तरह दबा दिया जाता है, उस दिन लोकतंत्र भीतर ही भीतर अपनी आत्मा खोने लगता है। नेहरू का ख़ुद “चाणक्य” बनकर अपनी ही लोकप्रियता के विरुद्ध चेतावनी लिखना आज किसी दूर के सपने जैसा लगता है, क्योंकि आज की राजनीति आत्म-मंथन से नहीं, चाटुकारिता और अंधी निष्ठा से चलाई जा रही है। हर पीढ़ी यह मान बैठती है कि वह पिछली पीढ़ी से ज़्यादा जागरूक है, और हर पीढ़ी अपने ही नए एकलव्य गढ़ती हुई पकड़ी जाती है – क्योंकि जब नागरिक सवाल पूछना छोड़कर केवल भक्तों की भीड़ बन जाते हैं, तो वे न सिर्फ़ अपनी आज़ादी गंवाते हैं, बल्कि अपने मसीहा को भी उसी अंधेपन और पतन की ओर धकेल देते हैं जिसका अंजाम इतिहास में हमेशा एक-सा रहा है। लोकतंत्र की रक्षा न कोई मसीहा कर सकता है, न भय – इसकी एकमात्र गारंटी नागरिक चेतना में और सत्ता से लगातार तीखे सवाल पूछने के साहस में ही छिपी है। सवाल आज भी वही है, जो ढाई हज़ार साल पहले केशपुत्र गांव में कालामों ने बुद्ध से पूछा था – हम किस पर, और आख़िर क्यों भरोसा कर रहे हैं?
रविकान्त राऊत जबलपुर, मध्यप्रदेश 9425611243
- वीरगल्लु – पत्थरों पर उकेरी गई तीन मंजिला नियति
एक विशिष्ट वीरगल्लु पत्थरों पर तीन या चार हिस्सों (panels) में बंटा होता है, जो उस दौर के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को दर्शाता है: निचला हिस्सा: सैनिक को युद्ध के मैदान में या पशुधन (cattle raids) की रक्षा करते हुए लड़ते हुए दिखाता है। मध्यम हिस्सा: स्वर्ग की अप्सराओं या देवदूतों को उस शहीद सैनिक को पालकी में उठाकर आकाश की ओर ले जाते हुए दिखाता है। ऊपरी हिस्सा: वह सैनिक अपने आराध्य देव (जैसे शिव लिंग) के सामने हाथ जोड़कर मोक्ष प्राप्त कर चुका होता है।
यह दृश्य कला आम सैनिक के मन में यह विश्वास पैदा करने के लिए काफी थी कि “राजा या राज्य के लिए प्राण देना, विचार या सवाल करने से कहीं ऊपर मोक्ष का सीधा रास्ता है।”
- ये सैनिक केवल जीवित रहते हुए राजा की रक्षा नहीं करते थे, बल्कि राजा की मृत्यु होने पर उनके साथ खुद का जीवन समाप्त करने की प्रतिज्ञा (मरण कनक) लेते थे।
- हळेबीडु की गवाही (कुवर लक्ष्मण का बलिदान): हळेबीडु के होयसलेश्वर मंदिर परिसर में एक प्रसिद्ध ‘गरुड़ स्तंभ’ है। जब होयसल राजा वीर बल्लाल द्वितीय की मृत्यु हुई, तो उनके सेनापति और मुख्य गरुड़ कुवर लक्ष्मण ने अपनी पत्नी, परिवार और एक हज़ार वफादार सैनिकों के साथ सामूहिक रूप से अपने प्राण दे दिए। इस स्तंभ पर उनके कटे हुए सिरों और आत्मोत्सर्ग के दृश्यों को बेहद बारीक कला के साथ उकेरा गया है।
मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह वफादारी किसी डर से पैदा नहीं हुई थी। व्यवस्था ने ‘राजा और सेवक’ के रिश्ते को ‘आत्मा और देह’ का रिश्ता बना दिया था। जब देह (राजा) ही नहीं रही, तो परछाई (सैनिक) का क्या काम?
समकालीन भारत में इस “बलिदान की यात्रा” का सबसे प्रत्यक्ष और कड़वा अनुभव तब हुआ जब 2016 की नोटबंदी को काले धन के खिलाफ एक ‘महान राष्ट्रीय यज्ञ’ की तरह प्रस्तुत किया गया। कड़कड़ाती धूप और ठंड में बैंकों की कतारों में खड़ी आम जनता से कहा गया कि सीमा पर जवान खड़े हैं, तो क्या नागरिक देश के लिए कुछ दिन की परेशानी का ‘बलिदान’ नहीं दे सकते? नीतिगत खामियों और प्रशासनिक तैयारी के अभाव को ‘राष्ट्रहित के त्याग’ का जामा पहना दिया गया। ठीक इसी तरह, कोविड-19 के पहले लॉकडाउन के दौरान जब लाखों प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे हजारों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हुए, तब व्यवस्था की विफलता पर सवाल उठाने के बजाय उस अमानवीय त्रासदी को ‘संकल्प और सामूहिक त्याग’ की गाथा के रूप में प्रचारित किया गया।


शानदार आलेख। अंध भक्ति भारत ही नहीं कई अन्य देशों में भी ऐतिहासिक रूप से प्रचलित है।असल में यह मानव प्रजाति की एक विशिष्ट प्रकृति है।
आपके इस प्रोत्साहन का हृदय से आभार।
परंपराओं से अर्जित ज्ञान एवं ज्ञान पर आधारित परंपराओं में मूलभूत अंतर विवेक एवं विश्लेषण का होता है। श्रुति के आधार पर किसी रीति – नीति का अनुसरण करना अंधभक्ति है किंतु; अनुभव के आधार पर उसका परिमार्जन कर अपनाना भक्ति। आपका आलेख समग्र मानवता, उसकी तथाकथिक अवधारणाओं, उसके किताबी संदेशों में छुपे अंतर्निहित भाव का नीर क्षीर विवेचन करता है।जब श्रृद्धा भेड़ बन जाए तो रेवड़ को हांकना सरल है। विश्वास को परखते हुए आगे बढ़ना ही मानव विकास की अहम प्राथमिकता होनी चाहिए।
बहुत-बहुत साधुवाद आपको भाई साहब।